अलाव में झलकता अपनापन
लालकुआँ/हल्द्वानी।
तराई क्षेत्र में कड़ाके की ठण्ड के बीच जगह–जगह जलते अलाव अब केवल सर्दी से बचाव का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक अपनत्व और मानवीय संवेदनाओं का प्रतीक बनते जा रहे हैं। बाज़ारों, मोहल्लों, चौराहों और मंदिर प्रांगणों में जल रहे अलाव लोगों को एक-दूसरे के करीब ला रहे हैं।
सुबह की धुंध से लेकर देर रात तक अलाव के चारों ओर खड़े लोग ठण्ड से राहत पाते दिखाई दे रहे हैं। कोई श्रमिक दिनभर की मेहनत के बाद हाथ तापता है, तो कोई बुज़ुर्ग बीते दिनों की यादें साझा करता है। मंदिरों में दर्शन को पहुँचे श्रद्धालु भी अलाव के पास कुछ पल रुककर सर्द हवाओं से निजात पा रहे हैं।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि अलाव के पास खड़े होकर लोग एक-दूसरे से बातचीत करते हैं, हालचाल पूछते हैं और सहयोग की भावना स्वतः ही जन्म लेती है। कोई लकड़ी डाल देता है तो कोई चाय का गिलास आगे बढ़ा देता है—यही छोटे-छोटे क्षण समाज में आपसी भाईचारे को मज़बूत कर रहे हैं।
ठण्ड के इस मौसम में जलते अलाव यह संदेश दे रहे हैं कि जब तापमान गिरता है, तब इंसानियत की गर्माहट ही सबसे बड़ा सहारा बनती है।
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