स्व. जानकी पंत के निधन पर शोक: स्वामी मोहनाचार्य और लालकुआँ प्रेस क्लब अध्यक्ष सहित गणमान्य लोगों ने दी श्रद्धांजलि, स्वामी जी ने दिया आत्मा की अमरता का संदेश

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​वैशाली/गाजियाबाद:

गायत्री एयरकॉन प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक एवं माँ भद्रकाली मंदिर के आचार्य श्री योगेश पंत की पूजनीय माताजी, स्व. श्रीमती जानकी पंत का गत रविवार को दुखद निधन हो गया था। उनके गोलोकवासी होने पर शोक की इस घड़ी में परिवार को ढांढस बंधाने के लिए गाजियाबाद के वैशाली स्थित उनके आवास पर गणमान्य लोगों, साधु-संतों और समाजसेवियों का तांता लगा रहा।गुरुवार को शोकग्रस्त परिवार से भेंट कर अपनी गहरी संवेदनाएं प्रकट करने वालों में कई प्रमुख हस्तियां शामिल रहीं।

गणमान्य लोगों ने बंधाया ढांढस

स्व. जानकी पंत जी को श्रद्धांजलि अर्पित करने और पंत परिवार को सांत्वना देने हेतु विशेष रूप से संत शिरोमणि स्वामी डॉ. मोहनाचार्य, लालकुआँ प्रेस क्लब के अध्यक्ष श्री बी. सी. भट्ट और कालाढूंगी के प्रमुख समाजसेवी श्री पंकज रखोलिया सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित हुए। सभी ने परिवार के इस अपूरणीय दुख में सहभागी बनते हुए दिवंगत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की।

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​आत्मा अजर-अमर है: स्वामी डॉ. मोहनाचार्य का आध्यात्मिक संदेश

​इस शोक सभा के दौरान संत शिरोमणि स्वामी डॉ. मोहनाचार्य जी ने उपस्थित लोगों को ‘आत्मा की अमरता’ और ‘जीवन-मृत्यु के शाश्वत सत्य’ पर एक अत्यंत सुंदर और मर्मस्पर्शी संदेश दिया।

​नश्वर शरीर और अमर आत्मा:

स्वामी जी ने गीता के श्लोकों का स्मरण कराते हुए कहा कि जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार यह अजर-अमर आत्मा एक जीर्ण शरीर को छोड़कर नई देह में प्रवेश करती है। मृत्यु केवल इस भौतिक शरीर का अंत है, लेकिन आत्मा शाश्वत है; उसे न शस्त्र काट सकते हैं, न आग जला सकती है। इसलिए ज्ञानी जन कभी मृत्यु पर शोक नहीं मनाते।

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पूर्वजों के निमित्त कर्मकांडों का विशेष महत्व:

स्वामी जी ने सनातन परंपरा में मृत्यु के उपरांत पूर्वजों के निमित्त की जाने वाली क्रियाओं (श्राद्ध और तर्पण) के गहरे महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया:

​सद्गति और मोक्ष: मृत्यु के पश्चात किए जाने वाले शास्त्र-सम्मत कर्मकांड और तर्पण दिवंगत आत्मा को परलोक में शांति और सद्गति प्रदान करने में सहायक होते हैं।

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​पितृ ऋण से मुक्ति: पूर्वजों के निमित्त किए गए कर्म हमारे पितृ ऋण को चुकाने का साधन हैं। यह उनके द्वारा दिए गए जीवन और संस्कारों के प्रति हमारी कृतज्ञता को दर्शाता है।

​कुल में सुख-शांति: जब हम पूरे विधि-विधान और श्रद्धा भाव से अपने पूर्वजों के लिए प्रार्थना और दान-पुण्य करते हैं, तो उनकी आत्मा तृप्त होती है और वे अपने वंशजों को सुख, समृद्धि और शांति का आशीर्वाद देते हैं।

 उपस्थित सभी लोगों ने स्व. श्रीमती जानकी पंत जी को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की और परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना की कि वे पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में उच्च स्थान प्रदान करें।

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