देवभूमि उत्तराखंड के बागेश्वर जनपद में काण्डा के समीप पवित्र पहाड़ी पर स्थित धपोला सेरा क्षेत्र प्रकृति की एक ऐसी अनुपम कृति है, जहाँ की सुरम्य वादियों में कदम रखते ही मन किसी अज्ञात आनंद से भर उठता है। चारों ओर लहलहाते हरी-भरी उपत्यकाओं के सेरे (खेत), भद्रावती नदी की कलकल बहती निर्मल धारा और यहाँ के घने रहस्यमयी जंगलों से निकलती शीतल जलधाराएँ इस पूरे भूभाग को अलौकिक सौंदर्य प्रदान करती हैं। किन्तु धपोला सेरा का आकर्षण केवल इसके शांत और मनमोहक दृश्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि इस दिव्य स्थान के कण-कण में युगों-युगों पुराना एक ऐसा गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य समाया हुआ है, जिसका वर्णन स्कन्दपुराण के मानसखण्ड में मिलता है।
स्कन्दपुराण के अस्सीवें अध्याय के अनुसार, इस रमणीय क्षेत्र को प्राचीन काल में ‘नागगिरि’ कहा गया है और इसके पश्चिम दिशा में फैले विशाल वन को ‘गोपीवन’ के नाम से जाना जाता है। पौराणिक आख्यान के अनुसार, जब नैमिषारण्य में ऋषियों ने महर्षि व्यास से प्रश्न किया कि हे ब्रह्मर्षि! इस पृथ्वी पर ऐसा कौन सा पावन स्थान है जहाँ जाने मात्र से मनुष्य के पूर्वजन्मों के भयंकर पाप, स्वर्ण चोरी जैसे महापाप और पितृ-दोष नष्ट हो जाते हैं? तब महर्षि व्यास ने हिमालय के इस पावन तट पर बसे नागगिरि और गोपीवन का महिमागान किया।
महर्षि व्यास ने इस पावन भूमि का प्रभाव बताते हुए कहा:
कि न यान्ति नरास्तत्र पापलिप्तास्तपोधनाः।
विलीयन्ते च पापानि हिमवद्भास्करोदये॥
अर्थात् जिस प्रकार प्रात:काल सूर्य की रश्मियाँ पड़ते ही हिमालय पर जमा विशाल हिम स्वतः पिघलकर बह जाता है, ठीक उसी प्रकार गोपीवन क्षेत्र में प्रवेश करते ही मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के समस्त पाप तत्काल विलीन हो जाते हैं।
इतना ही नहीं, इस स्थान की सबसे अद्भुत महिमा यह बताई गई है कि यहाँ स्थित गोपीश्वर महादेव का उत्तम सुगंधित पुष्पों से पूजन करने पर व्यक्ति को संपूर्ण पृथ्वी की 21 बार परिक्रमा करने के बराबर महापुण्य फल प्राप्त होता है।
पुराण में इसका वर्णन श्लोक के रूप में मिलता है:
त्रिःसप्तकृत्वा सकलां धरित्रीं प्रक्रम्य यद्भाति महीतले वै।
तत्तत्र गोपीश्वरपूजनेन सम्पूज्य जातीकुसुमैः सुशोभनैः॥
इस पावन गोपीवन की रचना की कथा भी अत्यंत कौतूहलवर्धक है। प्राचीन काल में नागवंशियों ने नागपुर (वर्तमान नागदेव क्षेत्र) में रहकर पंद्रह वर्षों तक भगवती सुरभि (कामधेनु) की अनन्य निष्ठा से आराधना की। नागों की भक्ति से संतुष्ट होकर कामधेनु ने उन्हें वरदानस्वरूप अपार गो-धन प्रदान किया। उन दिव्य गायों के स्वच्छंद विचरण, संरक्षण और चराने के लिए नागों ने इस विशाल उपत्यका में ‘गोपीवन’ का निर्माण किया और उनकी सुरक्षा का भार नागकन्याओं को सौंप दिया।
एक दिन जब नागकन्याएँ इस गोपीवन में गायों को चराते हुए भगवान शिव के भजन और नृत्य में लीन थीं, तभी उनकी दृष्टि पर्वत के अग्रभाग पर स्थित एक अत्यंत गुप्त पाषाण गुफा पर पड़ी। यह गुफा महर्षि शण्डिल्य (जो महर्षि देवल के पुत्र और राजा दिलीप के पुरोहित थे) द्वारा प्रकाशित की गई थी। इस गुफा के द्वार पर ऋषियों द्वारा आहुत पावन ‘सरस्वती-गंगा’ की शीतल धारा बह रही थी।
जब नागकन्याओं ने गुफा के भीतर देखा, तो उन्हें पाषाण के बीच एक अत्यंत संकरा छिद्र दिखाई दिया, जिसे स्थानीय लोकबोली में ‘सान्योड्घार’ (संन्यारी गुफा) कहा जाता है। नागकन्याओं ने अपनी शिवभक्ति की परीक्षा लेने का विचार किया और कहा कि यदि हमारी महादेव के चरणों में निष्कपट भक्ति है, तो हम इस संकरे छिद्र मार्ग को पार कर जाएँगी। शिव नाम का स्मरण करते हुए वे उस अति-सूक्ष्म मार्ग से सकुशल गुफा के पार निकल गईं।
गुफा के दूसरी ओर पहुँचकर जब वे अपनी गायों को ढूँढते हुए वन के अंतिम छोर पर पहुँचीं, तो वहाँ का दृश्य देखकर आश्चर्यचकित रह गईं। हरी-भरी दूर्वा के बीच स्वयं भगवान शंकर एक परम ज्योतिर्मय शिवलिंग स्वरूप में विराजमान थे। उनकी देह से निकलती दिव्य कांति ऐसी थी मानो बारह सूर्य (द्वादश आदित्य) एक साथ चमक रहे हों, जिनके आगे गगन के सूर्य की चमक भी फीकी प्रतीत हो रही थी।
उस तेजोमय स्वरूप को देखकर नागकन्याएँ अश्रुपूर्ण नयनों से हाथ जोड़कर स्तुति करने लगीं:
नमो हरायामितभूषणाय चिताभस्मद्रुमविलेपनाय।
वृषध्वजाय सुविषप्रभाय शिवाय शान्ताय नमो नमस्ते॥
नमो विरूपाय कलाधराय षडर्धनेत्राय परावराय।
ऋषिस्तुतायापरिसेविताय नमो नमस्ते वृषवाहनाय॥
नागकन्याओं ने भावविभोर होकर कहा कि हे अनंत आभूषणों से सुशोभित, शरीर पर भस्म रमाए, मस्तक पर बालचंद्र धारण करने वाले शान्त स्वरूप महादेव! आपको हमारा बारंबार प्रणाम है। आपके चरणों के अतिरिक्त हमारा कोई अन्य आश्रय नहीं है।
नागकन्याओं की निष्छल और अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर उस ज्योतिर्मय शिवलिंग से एक महाज्वाला प्रकट हुई और स्वयं महादेव ने प्रकट होकर उन्हें अपने दिव्य स्वरूप में लीन कर लिया तथा उन्हें मोक्ष प्रदान किया।
आज भी काण्डा और धपोला सेरा का यह पावन क्षेत्र प्रकृति के अद्भुत सौंदर्य और शांति की तलाश करने वाले पर्यटकों के साथ-साथ अध्यात्म अनुरागी श्रद्धालुओं के लिए एक परम पावन धाम है। भद्रावती नदी के तट पर स्थित गोपीश्वर महादेव और पहाड़ियों की ओट में छिपी गुफाएं पूजनीय है यह पौराणिक गोपेश्वर महादेव का मंदिर आज भी उस युगों पुराने सत्य की साक्षी है, जहाँ एक बार के पूजन से 21 बार पूरी पृथ्वी की परिक्रमा का पुण्य फल प्राप्त होता है।
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