बुरा न मानो, होली है!
होली का मौसम आते ही देश में दो चीजें स्वतः सक्रिय हो जाती हैं—एक रंगों की पिचकारी और दूसरी बहानों की फुलझड़ी। जैसे ही किसी ने किसी पर रंग डाला, जवाब तैयार“अरे बुरा न मानो, होली है!”
होली के दिन यह वाक्य मानो राष्ट्रीय माफी-पत्र बन जाता है। साल भर जो पड़ोसी नमस्ते का जवाब सिर हिलाकर देते थे, वे भी इस दिन पूरी बाल्टी लेकर दरवाजे पर खड़े मिलते हैं। और अगर आपने दरवाजा न खोला तो अगले दिन मोहल्ले में चर्चा “बहुत घमंड है, रंग तक नहीं लगवाया!”
दफ्तरों में भी कमाल होता है। जो बॉस साल भर फाइलों में रंग भरवाते हैं, होली पर कहते हैं “आज खुलकर खेलो!” कर्मचारी मन ही मन सोचते हैं—“सर, appraisal में भी थोड़ा रंग भर दीजिए।”
राजनीति में तो होली बारहों महीने चलती है। आरोपों के रंग, वादों की गुलाल, और बयानबाज़ी की पिचकारी। फर्क बस इतना है कि वहां कोई नहीं कहता “बुरा न मानो”, क्योंकि सब पहले से ही मानकर बैठे होते हैं।
सोशल मीडिया की होली भी निराली है। लोग फोटो में ऐसे रंगे दिखते हैं जैसे सीधे विज्ञापन से निकलकर आए हों, और कैप्शन में लिखते हैं—“सिंपल सेलिब्रेशन।” हकीकत में आधा दिन फोटो एडिट करने में चला जाता है।
होली का असली मज़ा तब है जब हंसी में अपनापन हो, शरारत में सीमा हो और रंगों में सम्मान घुला हो। वरना “बुरा न मानो होली है” कहकर किसी की भावना पर कीचड़ उछालना तो कोई उत्सव नहीं, बस बहाना है।
इसलिए इस बार होली पर रंग जरूर उड़ाइए, ठहाके भी लगाइए, व्यंग्य भी कीजिए—पर याद रखिए, सामने वाला भी इंसान है, पेंट की दीवार नहीं।
बाकी…
अगर लेख में कुछ चुभ गया हो तो—
बुरा न मानो, होली है!
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