योगेश पंत को मातृ शोक; वात्सल्य, संघर्ष और निष्ठा की प्रतिमूर्ति श्रीमती जानकी देवी का देवलोकगमन
गाजियाबाद/वैशाली। दुनिया में माँ के आंचल से सघन और शीतल कोई छांव नहीं होती, और जब यह छांव सिर से उठ जाती है, तो मानों इंसान के सिर से पूरा आसमान ही छिन जाता है। बागेश्वर माँ भद्रकाली मंदिर के मुख्य संरक्षक एवं आचार्य व गायत्री एयरकॉन प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी के निदेशक श्री योगेश पंत जी के जीवन में आज ऐसा ही एक वज्रपात हुआ है। उनकी पूजनीय माताजी, ममता और करुणा की साक्षात मूरत, श्रीमती जानकी देवी जी (76 वर्ष) का आज रविवार दोपहर तीन बजे वैशाली, गाजियाबाद स्थित उनके आवास पर निधन हो गया है। इस दुखद समाचार के मिलते ही हर जानने वाले की आंखें छलक उठी हैं।
पर्वतीय संस्कृति की संवाहक और संघर्षों की अलौकिक गाथा
मूल रूप से देवभूमि के खंतोली कुचौली की माटी से जुड़ीं श्रीमती जानकी देवी जी का पूरा जीवन संघर्षों की एक ऐसी अलौकिक गाथा रहा है, जो हर किसी के लिए एक मौन प्रेरणा है। वर्तमान में वे वैशाली (गाजियाबाद) में अपने पुत्रों के साथ रह रही थीं। वे अपने पीछे दो पुत्र, तीन पुत्रियों और नाती-पोतों पड़नातियों से भरा-पूरा, सुसंस्कारित परिवार रोता-बिलखता छोड़ गई हैं।
वे केवल एक माँ नहीं थीं, बल्कि मानवीय गुणों की एक अद्भुत मिसाल थीं। अपने जीवन के कठिन से कठिन मोड़ पर भी उन्होंने धैर्य नहीं खोया। देवभूमि की पर्वतीय संस्कृति से उनका स्नेह इतना गहरा था कि महानगर में रहने के बावजूद पहाड़ की माटी की महक उनके आचार-विचार में हमेशा रची-बसी रही।
माँ भद्रकाली के प्रति अगाध निष्ठा और पारिवारिक विरासत
जानकी देवी जी के हृदय में माँ भद्रकाली के प्रति जो गहरी निष्ठा और समर्पण था, वह अंतिम सांस तक उनके रोम-रोम में बसा रहा। भक्ति और समर्पण की यह विरासत इस परिवार की नींव रही है। उनके दिवंगत पति स्व० पूरन चन्द्र पन्त जी भी माँ भद्रकाली के परम उपासक थे। सांस्कृतिक कार्यक्रमों और विशेषकर श्री रामलीला के मंचनों में स्व० पंत जी का वह कुशल निर्देशन आज भी लोगों की स्मृतियों में जीवित है, जिसे याद कर लोग आज भी भावुक हो जाते हैं।
आज जब जानकी देवी जी ने अपनी जीवन यात्रा को विराम दिया, तो मानों वात्सल्य के एक युग का अंत हो गया। उनका जाना घर के उस मुख्य स्तंभ का गिरना है, जिसने पूरे परिवार को एक डोर में बांध कर रखा था। उनके जाने से सूने हुए आंगन की पीड़ा शब्दों में बयां नहीं की जा सकती।
कुल मिलाकर वे मानवीय गुणों की अद्भुत मिसाल थीं। सादगी, ममता, त्याग और संस्कारों से परिपूर्ण उनका जीवन हर किसी के लिए प्रेरणास्रोत रहा। पर्वतीय संस्कृति के प्रति उनका गहरा लगाव और माँ भद्रकाली के प्रति अटूट श्रद्धा उनके व्यक्तित्व की विशेष पहचान थी। जानकी देवी का जाना केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की अपूरणीय क्षति है। उनके स्नेहिल स्वभाव, मधुर व्यवहार और आशीर्वाद भरे शब्द अब केवल स्मृतियों में ही रह जाएंगे।
परमपिता परमेश्वर और माँ भद्रकाली से यही करबद्ध प्रार्थना है कि वे इस पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में सर्वोच्च स्थान दें और शोक संतप्त पंत परिवार को इस असीम दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करें।
ॐ शांति!
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