रंगों का त्योहार होली। चारों ओर उमंग और उत्साह की लहरें दौड़ती हैं, बच्चे, युवा और बुजुर्ग सब मिलकर गुलाल और अबीर की छटा में डूब जाते हैं। मंदिरों, गलियों और बगिचों में संगीत, ढोल और गीतों की गूंज होती है। यह त्योहार केवल रंगों का नहीं, बल्कि प्रेम, मेल-जोल और मानवीय भावनाओं का भी प्रतीक है।
और फिर एक दिन यह रंगीन उत्सव धीरे-धीरे अपनी विदाई लेने लगता है। गलियों में बची थोड़ी-सी हलचल, घरों में बिखरे अबीर के धब्बे, और लोगों के चेहरों पर सुकून भरी मुस्कान—यह संकेत है कि होली हुई विदा।
होली के रंग, जो हृदयों में उमंग भरते हैं, अब धीरे-धीरे स्मृतियों में बदल जाते हैं। बच्चों की किलकारियाँ, पड़ोसियों के साथ मिलकर खेला गया खेल, पुराने मित्रों की हँसी—सभी कुछ मन के कोने में संजो लिया जाता है। यह विदाई केवल रंगों की नहीं, बल्कि एक अनुभव, एक यादगार पल, और जीवन के खूबसूरत अध्याय की है।
विदाई का यह क्षण कुछ उदासीनता लेकर आता है, लेकिन साथ ही नई उम्मीद और तैयारी भी। अगले वर्ष फिर वही रंग, वही उमंग, वही उत्सव लौटेगा। यही होली की खूबसूरती है अल्पकालिकता में स्थायित्व। हर विदाई के पीछे एक नए मिलन का वादा छिपा होता है।
होली ने विदा ली, लेकिन उसकी यादें, उसका उल्लास, और उसका संदेश हमारे दिलों में हमेशा जीवित रहेगा संग, सौहार्द और संवेदनाओं का पर्व कभी न समाप्त होने वाला रंग।
“रंगों ने बिखेरा प्रेम, हँसी और यादें;
आज विदा हो रही होली, पर खुशियाँ रहें हमेशा हमारे संग।”
होली के रंगीन उत्सव ने विदा ली, लेकिन पर्व का उमंग और श्रद्धा अभी भी लोगों के हृदय में जीवित है। शहर और गांवों के मन्दिरों में आज भण्डारे का आयोजन हुआ, जहाँ भक्तों ने सामूहिक सेवा और भक्ति के साथ होली की खुशियाँ बाँटी।
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