उत्तरायण काल में माँ अवंतिका के पूजन का महत्व (शास्त्र-सम्मत आलेख)
भारतीय सनातन परम्परा में उत्तरायण उस काल को कहा जाता है जब सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश कर उत्तर की ओर गमन करते हैं। इसे देवयान मार्ग, उत्तरायण काल, उदीच्य गति आदि नामों से भी जाना जाता है। शास्त्रों में इसे देवताओं का दिन एवं पुण्य-संचय का श्रेष्ठ अवसर कहा गया है। इसी शुभ काल में माँ अवंतिका के पूजन का विशेष महत्व बताया गया है। अवंतिका–क्षेत्र प्राचीन काल से सिद्ध पीठ, तीर्थ-राज एवं मोक्ष–दायिनी भूमि मानी गई है।

1. उत्तरायण का दार्शनिक व आध्यात्मिक महत्व
वेद–पुराणों में उत्तरायण को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि कहा गया है। भगवद्गीता (अध्याय 8) में श्रीकृष्ण ने देवयान मार्ग का वर्णन करते हुए कहा है कि इस काल में साधना, जप, तप और त्याग से स्थायी पुण्य फल व ऊर्ध्वगति प्राप्त होती है। इसीलिए मकर संक्रांति से शुरू होने वाला उत्तरायण शुभ कर्मों की सिद्धि का काल माना जाता है।
2. माँ अवंतिका – तीर्थ–राज की अधिष्ठात्री शक्ति
अवंतिका शब्द का अर्थ है :जो समस्त लोकों का आवरण करे और रक्षा करे। पुराणों में अवंतिका–क्षेत्र (उज्जयिनी) को सिद्ध भूमि, मोक्ष–प्रद भूमि एवं काल–विजयी तीर्थ बताया गया है। स्कंद–पुराण के अवंतिका–खण्ड, पद्म–पुराण तथा अन्य पुराणों के तीर्थ–वर्णन में अवंतिका–क्षेत्र की महिमा आती है। यही क्षेत्र माँ अवंतिका की अधिष्ठात्री शक्ति से अभिभूत माना गया है।
माँ अवंतिका को भूमि–शक्ति, नगर–देवी और मुक्तिदायिनी शक्ति के रूप में पूजा जाता है। महाकाल–वन में स्थित यह शक्ति काल–तत्व पर आधिपत्य का भी प्रतीक मानी गई है।
3. उत्तरायण में देवी–पूजन क्यों विशेष फलदायी?
शास्त्रों में कहा गया है :
उत्तरायण में सूर्य–शक्ति प्रबल होती है
तमो–गुण का क्षय और सत्त्व–गुण की वृद्धि होती है
देवताओं की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है
देवी–भागवत, कालिका–पुराण और तंत्र–शास्त्र में यह प्रतिपादित है कि जब सौर ऊर्जा उत्तर गमन से विकसित होती है तो दुर्गा–शक्ति का आविर्भाव अधिक सुग्राह्य हो जाता है। अतः इस काल में भगवती के जप, हवन, ध्यान और पूजन का फल कई गुना बताया गया है।
4. माँ अवंतिका के पूजन के प्रमुख शास्त्रीय फल
उत्तरायण के दौरान माँ अवंतिका के पूजन से
*पितृ–ऋण से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है
*चित्त की स्थिरता व साधना में उन्नति होती है
*दैहिक, दैविक व भौतिक पीड़ाओं का शमन होता है
*गृहस्थ जीवन में सौभाग्य, समृद्धि व मंगल की वृद्धि होती है
*यात्रा, व्यापार, शिक्षा व आराधना में सिद्धि का वरदान मिलता है
*तंत्र–साधना परम्परा में भी उत्तरायण को शक्ति–आराधना का श्रेष्ठ मुहूर्त माना गया है।
5. पूजा–विधि का शास्त्रीय संकेत
उत्तरायण काल में माँ अवंतिका के चरणों में
दीप, धूप, अक्षत, पुष्प अर्पण
श्वेत एवं पीले पुष्पों की प्रस्तुति
“ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” अथवा “ॐ दुं दुर्गायै नमः” का जप
तिलदान, गुड़, अन्न व वस्त्र का दान
नदियों में स्नान व सूर्य को अर्घ्य
विशेष रूप से फलदायी बताए गए हैं।
6. उत्तरायण काल और काल–क्षेत्र का अद्भुत संगम
अवंतिका–क्षेत्र स्वयं काल–तत्व का केंद्र मानी जाती है और उत्तरायण सूर्य–काल का उदय है। जब काल–क्षेत्र और काल–उदय का संगम होता है, तब यहाँ की देवी–आराधना विलक्षण फल देने वाली मानी गई है। यही कारण है कि उत्तरायण में महाकाल–क्षेत्र की यात्रा, माँ अवंतिका का पूजन और जप–तप को विशेष पुण्यकारी कहा गया है।
7. विशेष
उत्तरायण केवल खगोलीय परिवर्तन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नयन का शुभ अवसर है। इस काल में माँ अवंतिका के पूजन से मनुष्य के भीतर स्थित शक्ति का जागरण होता है, कर्म–बंधन शिथिल होते हैं और जीवन में दिव्य सौभाग्य का संचार होता है। शास्त्रों का मत स्पष्ट है कि देवयान मार्ग में की गई देवी–आराधना मोक्ष–मार्ग की ओर अग्रसर करती है।
8. लालकुआँ अवंतिका मन्दिर – लोक आस्था का जाग्रत शक्ति–पीठ
कुमाऊँ की पावन धरती पर स्थित लालकुआँ अवंतिका मंदिर को लोक–आस्था का जीवंत केंद्र माना जाता है। इस मंदिर में प्रतिष्ठित माँ अवंतिका की विग्रह–मूर्ति क्षेत्र–पालक शक्ति के रूप में मानी जाती है। स्थानीय जनश्रुति के अनुसार माँ अवंतिका यहाँ धरा की अधिष्ठात्री, नगर–रक्षिका और संकट–मोचिनी शक्ति के रूप में विराजमान हैं।
लालकुआँ क्षेत्र में रहने वाले भक्तों के साथ–साथ दूरदराज के श्रद्धालु भी उत्तरायण के आरंभ पर यहाँ उपस्थित होकर तिल, गुड़, खिचड़ी का दान, दीपदान और देवी–जप करते हैं। यहाँ उत्तरायण के अवसर पर विशेष पूजा–अर्चना, हवन और भंडारे की परम्परा भी प्रचलित है। श्रद्धालु मानते हैं कि इस मंदिर में की गई आराधना से—
पारिवारिक क्लेश का शमन
संतान–सुख की प्राप्ति
व्यापार और रोजगार में उन्नति
रोग–शोक से रक्षा
मनोवांछित सिद्धि
की प्राप्ति होती है।
इस मंदिर की विशेषता यह भी है कि यहाँ शक्ति–आराधना और लोक–संस्कृति का अद्भुत संगम दिखाई देता है। झोड़ा–चांचरी, भजन–कीर्तन और दुर्गा–स्तुति के स्वर वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देते हैं। उत्तरायण के दौरान यहाँ सूर्य–अर्घ्य और माँ अवंतिका का संयुक्त पूजन अत्यंत फलप्रद माना जाता है, क्योंकि इसी समय देवी–शक्ति और सूर्य–ऊर्जा का सामंजस्य सर्वोच्च स्थिति में होता है।
लालकुआँ अवंतिका मंदिर केवल उपासना–स्थल नहीं, बल्कि यह न्याय, संरक्षण और मातृ–करुणा का जीवंत प्रतीक है। भक्तों का विश्वास है कि माँ अवंतिका यहाँ अन्याय से रक्षा करती हैं और सत्कार्यों में सफलता प्रदान करती हैं। उत्तरायण में इस मंदिर का दर्शन एवं पूजन करना समस्त तीर्थों के दर्शन के समान फलदायी कहा गया है।
✍️ लेखक : रमाकान्त पन्त
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