माँ अवंतिका और हनुमान जी का प्रसंग

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​‘शक्ति स्वरूपा माँ अवंतिका’ के महात्म्य का विस्तृत वर्णन वीर हनुमान की उपस्थिति और उनके प्रसंगों के बिना अधूरा है। जब हम माँ के शक्ति स्वरूप का चिंतन करते हैं, तो हनुमान जी उनके परम सेवक और रक्षक के रूप में स्वाभाविक तौर पर जुड़ जाते हैं।
​इस विषय को निम्नलिखित महत्वपूर्ण संदर्भों और प्रसंगों के माध्यम से समझा जा सकता है:
​1. रक्षक और द्वारपाल का स्वरूप (आहार, बुलंदशहर का ऐतिहासिक संदर्भ)
गंगा तट पर स्थित महाभारत कालीन माँ अवंतिका देवी मंदिर (जहाँ देवी रुक्मिणी ने भगवान श्रीकृष्ण को वर रूप में पाने के लिए आराधना की थी) में माँ भगवती के ठीक बराबर में साक्षात वीर बजरंगबली की प्राचीन मूर्ति विराजमान है। यहाँ हनुमान जी माँ के परम रक्षक और द्वारपाल के रूप में पूजे जाते हैं। शाक्त परंपरा में यह मान्यता है कि देवी के शक्ति स्वरूप के दर्शन का पूर्ण फल तभी मिलता है, जब उनके रक्षक की भी वंदना की जाए।
​2. स्कंद पुराण का ‘अवंतिका खंड’ और क्षेत्र रक्षक
प्राचीन अवंतिका नगरी (उज्जैन), जो महाकाल और माँ हरसिद्धि (अवंतिका शक्तिपीठ) की भूमि है, वहाँ हनुमान जी का अत्यंत गहरा प्रभाव है। स्कंद पुराण के ‘अवंतिका खंड’ के अनुसार, इस पवित्र शक्ति और शिव नगरी की दसों दिशाओं से रक्षा का भार स्वयं एकादश रुद्रावतार हनुमान जी पर है। इसी कारण से अवंतिका नगरी में हनुमान जी के 108 प्राचीन और सिद्ध मंदिर स्थापित हैं। यह उन दुर्लभ स्थानों में से है जहाँ ‘हनुमान अष्टमी’ का भव्य पर्व विशेष रूप से मनाया जाता है, जो देवी की नगरी में उनके रक्षक होने का एक बड़ा पौराणिक प्रमाण है।
​3. शक्ति और भक्ति का अद्वितीय समन्वय
माँ अवंतिका विशुद्ध ‘शक्ति’ की प्रतीक हैं, जबकि हनुमान जी उस शक्ति को धारण करने वाली ‘भक्ति’ और ‘समर्पण’ के प्रतीक हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से यह प्रसंग महत्वपूर्ण है कि बिना हनुमान जी (भक्ति) की कृपा के माँ अवंतिका (शक्ति) की पूर्ण सिद्धि प्राप्त नहीं की जा सकती। देवी जागरण और अनुष्ठानों में हमेशा “आगे-आगे हनुमान चलत हैं…” का उद्घोष देवी और उनके इस परम सेवक के इसी शाश्वत संबंध को दर्शाता है।
​4. रुद्रावतार और देवी का अविभाज्य संबंध
माँ अवंतिका जहाँ साक्षात आदि शक्ति का स्वरूप हैं, वहीं हनुमान जी भगवान शिव के अंश (रुद्रावतार) हैं। शिव और शक्ति के इसी अविभाज्य संबंध के कारण, जहाँ भी शक्ति स्वरूपा माँ विराजमान होती हैं, वहाँ हनुमान जी उनके दिव्य कार्यों में सहायता के लिए ‘अगुआ’ या ‘कोतवाल’ के रूप में अवश्य उपस्थित रहते हैं।