कहीं आपका ‘पुण्य’ पर्यावरण के लिए ‘पाप’ तो नहीं?

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कहीं आपका ‘पुण्य’ पर्यावरण के लिए ‘पाप’ तो नहीं?
ठंडे शरबत की आड़ में सड़कों पर बिछती प्लास्टिक की चादरें
मई-जून की भीषण गर्मी में भारत की सड़कों पर राहगीरों को ठंडा शरबत और पानी बांटना सनातन धर्म की एक अत्यंत प्राचीन और नेक परंपरा है। एक समय था जब परिवहन के सीमित साधनों के बीच लंबी यात्राएं करने वालों के लिए सड़क किनारे प्याऊ लगाए जाते थे। इस सेवा-भाव को सिख और जैन समाज सहित सभी ने पूरी श्रद्धा से आगे बढ़ाया है।
लेकिन आज के आधुनिक दौर में आस्था और पुण्य कमाने की यह होड़ जाने-अनजाने में हमारे पर्यावरण का गला घोंट रही है।
बदलती परंपरा और अनावश्यक वितरण
आजकल चौराहों पर टेंट लगाकर शरबत पिलाने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। लोगों की आस्था का पूरा सम्मान है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन आयोजनों में असल जरूरतमंद (जैसे धूप में पसीना बहाने वाले मजदूर) मात्र 10-20% ही होते हैं। बाकी राह चलते वाहनों, कारों और ऑटो में बैठे लोगों को जबरन रोककर गिलासों में शरबत पकड़ा दिया जाता है। लोग पीते-पीते आगे बढ़ते हैं और खाली गिलास वहीं सड़क पर फेंक देते हैं।
सड़कें बन रही हैं कूड़ाघर
शरबत के अलावा जगह-जगह छोले-पूरी और हलवे के भंडारे भी लगाए जाते हैं। आयोजकों की भावना पवित्र हो सकती है, लेकिन इसके जो परिणाम सामने आ रहे हैं, वे बेहद चिंताजनक हैं:
सिंगल यूज़ प्लास्टिक का कहर: इन सभी कार्यक्रमों में धड़ल्ले से प्लास्टिक या प्लास्टिक-कोटेड पेपर के गिलास, कटोरियां और चम्मच इस्तेमाल होते हैं।
गंदगी का अंबार: आयोजन शुरू होने के चंद घंटों के भीतर ही सड़कों पर आधा-एक किलोमीटर दूर तक जूठे गिलासों और कटोरियों का ढेर लग जाता है।
नागरिकों की लापरवाही: स्टॉल के पास एक-दो डस्टबिन रखे होने के बावजूद लोग सड़क पर ही कूड़ा फेंकना अपनी शान समझते हैं। इस कदर फैले कचरे को पूरी तरह से साफ करना लगभग नामुमकिन हो जाता है।
बरसात में भुगतने पड़ते हैं भयानक नतीजे
मई-जून के ठीक बाद मानसून दस्तक देता है। सड़कों पर लापरवाही से फेंके गए ये प्लास्टिक के गिलास और कटोरियां नालियों में बहकर उन्हें पूरी तरह चोक (जाम) कर देते हैं। यही कचरा शहरों में जलभराव और सड़कों पर गंदा पानी फैलने का मुख्य कारण बनता है।
क्या हैं पर्यावरण-हितैषी समाधान?
यदि हम थोड़ी सी समझदारी दिखाएं, तो आस्था और पर्यावरण दोनों को बचाया जा सकता है:
पुन: उपयोग वाले बर्तन: हर स्टॉल पर सिंगल-यूज प्लास्टिक की जगह 25-30 स्टील या कांच के गिलास-कटोरी रखे जाएं और उन्हें धो-धोकर खिलाया-पिलाया जाए।
सफाई की जिम्मेदारी: जो संस्थाएं या लोग आयोजन कर रहे हैं, उन्हें अपना ‘पुण्य’ पूरा करने के साथ-साथ वहां की सफाई की शत-प्रतिशत जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
स्थायी प्याऊ या वॉटर कूलर: एक-दो दिन शरबत बांटने से मजदूर वर्ग की रोज की प्यास नहीं बुझती। बेहतर होगा कि आयोजक सार्वजनिक स्थानों पर स्थायी वॉटर कूलर या प्याऊ लगवाएं। इससे जरूरतमंदों को रोज पानी मिलेगा और प्लास्टिक प्रदूषण भी नहीं होगा।
“पुण्य कमाइए, लेकिन प्रकृति की कीमत पर नहीं। आइए, आस्था को प्रदूषण मुक्त बनाएं और इस संदेश को जनहित में अधिक से अधिक साझा करें।”
लेखक:
डॉ. आशुतोष पन्त
पूर्व जिला आयुर्वेद अधिकारी एवं पर्यावरणविद

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