टांडा रेंज में ‘किलर’ हाथी का खूनी आतंक: 72 घंटे में तीसरी मौत, लकड़ी बीनने गई बुजुर्ग महिला को कुचला
लालकुआं: टांडा वन क्षेत्र में एक बार फिर मौत का साया मंडरा रहा है। महज 72 घंटे के भीतर दो लोगों की जान लेने वाले एक आक्रामक टस्कर (नर) हाथी ने आज एक 60 वर्षीय बुजुर्ग महिला को बेरहमी से कुचल कर मौत के घाट उतार दिया। इस हृदयविदारक घटना से पूरे इलाके में दहशत और शोक का माहौल है।
घटना का विवरण:
यह दर्दनाक हादसा शाह पठानी गांव से पंतनगर जाने वाले मार्ग पर हुआ। मृतका की पहचान झा कॉलोनी, पंतनगर निवासी 60 वर्षीया मैना देवी (पत्नी स्व. बाबू लाल) के रूप में हुई है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, मैना देवी दो अन्य महिलाओं के साथ जंगल के रास्ते में सूखी लकड़ियां बीनने गई थीं। तभी अचानक एक टूटे दांत वाले आक्रामक टस्कर हाथी ने उन पर हमला बोल दिया।
जान बचाने की जद्दोजहद और दर्दनाक मौत:
हाथी को अपनी ओर दौड़ता देख महिलाओं में चीख-पुकार मच गई और वे जान बचाने के लिए जंगल की ओर भागने लगीं। इसी आपाधापी में हाथी ने मैना देवी को पकड़ लिया और उन्हें अपनी सूंड से उठाकर जमीन पर पटक दिया, जिसके बाद उन्हें पैरों तले रौंद कर उनकी निर्मम हत्या कर दी।
प्रशासनिक कार्रवाई और खौफ का माहौल:
मैना देवी के साथ गई अन्य महिलाएं किसी तरह अपनी जान बचाकर बदहवास हालत में कॉलोनी पहुंचीं और ग्रामीणों को घटना की जानकारी दी। जब तक ग्रामीण मौके पर पहुंचते, मैना देवी दम तोड़ चुकी थीं और हाथी घने जंगल की ओर लौट चुका था। मृतका के परिवार में दो बेटियां और एक बेटा है, जिनका रो-रोकर बुरा हाल है।
सूचना मिलते ही लालकुआं कोतवाली के प्रभारी निरीक्षक ब्रजमोहन सिंह राणा और टांडा रेंज के वन क्षेत्राधिकारी रूप नारायण गौतम भारी पुलिस बल और वनकर्मियों के साथ मौके पर पहुंचे और जांच शुरू कर दी।
लगातार हो रहे हमलों से दहशत:
गौरतलब है कि पिछले दो दिनों के भीतर इस क्षेत्र में यह दूसरी बड़ी और जानलेवा घटना है। इसी हाथी ने दो दिन पूर्व सांप पठानी क्षेत्र के एक खेत में सो रहे दो लोगों को भी मार दिया था, जिनमें से एक की शिनाख्त अब तक नहीं हो सकी है। लगातार हो रहे इन हमलों से क्षेत्रवासियों में वन विभाग के प्रति आक्रोश और अपनी सुरक्षा को लेकर भारी खौफ व्याप्त है।
विशेष आलेख: वन्यजीव-मानव संघर्ष – एक गंभीर और बढ़ती चुनौती
टांडा रेंज में घटी यह त्रासदी कोई इकलौती घटना नहीं है, बल्कि यह देश भर में बढ़ते
मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict)** का एक भयावह उदाहरण है। जैसे-जैसे इंसानी आबादी बढ़ रही है और विकास के नाम पर जंगलों का दायरा सिकुड़ रहा है, मनुष्य और जंगली जानवरों के बीच टकराव एक गंभीर संकट बन चुका है।
संघर्ष के प्रमुख कारण:
प्राकृतिक आवासों का सिकुड़ना (Habitat Loss):
वनों की अंधाधुंध कटाई और जंगलों के किनारों पर मानवीय बस्तियों (Encroachment) के विस्तार ने जंगली जानवरों के घर छीन लिए हैं।
भोजन और पानी की तलाश: जब जंगलों के अंदर प्राकृतिक भोजन और पानी के स्रोत कम हो जाते हैं, तो हाथी, बाघ और तेंदुए जैसे जानवर ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों का रुख करने को मजबूर हो जाते हैं।
एलिफेंट कॉरिडोर (हाथी गलियारे) में बाधा:
हाथी एक घुमक्कड़ प्राणी है जो पीढ़ियों से तय रास्तों (कॉरिडोर) पर यात्रा करता है। इन रास्तों पर रेलवे लाइन, हाइवे या बस्तियां बन जाने से उनके प्राकृतिक मार्ग बाधित होते हैं, जिससे उनका इंसानों से सीधा सामना होता है।
संसाधनों के लिए जंगलों पर मानवीय निर्भरता:
आज भी ग्रामीण इलाकों में लोग जलावन की लकड़ी, चारे और अन्य वनोपज के लिए सीधे तौर पर जंगलों पर निर्भर हैं, जो उन्हें खतरे के सीधे संपर्क में लाता है।
संघर्ष के भयानक परिणाम:
इस टकराव की कीमत दोनों पक्षों को चुकानी पड़ती है। एक तरफ जहाँ इंसानों की जान जाती है, फसलें और संपत्तियां नष्ट होती हैं, वहीं दूसरी ओर प्रतिशोध की भावना (Retaliatory Killings) में ग्रामीण जहर देकर या करंट लगाकर जंगली जानवरों को मार देते हैं। यह पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के लिए एक अपूरणीय क्षति है।
संभावित समाधान और बचाव के उपाय:
1. वन्यजीव गलियारों का संरक्षण:जानवरों के पारंपरिक मार्गों को चिन्हित कर उन्हें अतिक्रमण मुक्त रखना सबसे जरूरी है।
2. तकनीक और पूर्व चेतावनी प्रणाली (Early Warning System):*जंगलों के किनारे सेंसर और ड्रोन का उपयोग करके जानवरों की हलचल पर नजर रखी जानी चाहिए ताकि समय रहते ग्रामीणों को अलर्ट किया जा सके।
3.समुदाय की जागरूकता और प्रशिक्षण: वन क्षेत्रों के आसपास रहने वाले लोगों को जानवरों के व्यवहार और आमना-सामना होने पर बचाव के तरीकों के बारे में प्रशिक्षित करना चाहिए।
4. त्वरित मुआवजा: फसलों के नुकसान या जनहानि की स्थिति में पीड़ित परिवारों को बिना लालफीताशाही के तुरंत और उचित मुआवजा मिलना चाहिए, ताकि जानवरों के प्रति बदले की भावना न पनपे।
5. आजीविका के वैकल्पिक साधन:जंगलों पर निर्भरता कम करने के लिए ग्रामीणों को ईंधन (जैसे उज्ज्वला योजना के तहत गैस) और रोजगार के वैकल्पिक साधन उपलब्ध कराने होंगे।
मनुष्य और वन्यजीव दोनों का इस धरती पर समान अधिकार है। इस संघर्ष को रोकने के लिए हमें सह-अस्तित्व (Co-existence) की भावना को अपनाते हुए विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच एक नाजुक संतुलन बनाना होगा।
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