“आमा लछिमा देवी को कोश्यारी जी की भावभीनी श्रद्धांजलि: खुरियाखत्ता में पहुंचकर किया भावपूर्ण नमन

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बिंदुखत्ता/खुरियाखत्ता।
पर्वतीय संस्कृति की सादगी, त्याग और अटूट आस्था की प्रतीक रही बिंदुखत्ता की ‘आमा’ के नाम से विख्यात लछिमा देवी को श्रद्धांजलि देने महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल एवं उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी खुरियाखत्ता पहुंचे। इस अवसर पर वातावरण भावुक हो उठा और गांव की पगडंडियों से लेकर आंगन तक आमा की स्मृतियाँ सजीव हो उठीं।
105 वर्ष की आयु में 9 फरवरी को लछिमा देवी ने अंतिम सांस ली। उनका जीवन संघर्ष, अनुशासन और संस्कृति संरक्षण का जीवंत उदाहरण था। कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने संस्कारों और परंपराओं को कभी नहीं छोड़ा। कहा जाता है कि वे आजीवन नियमपूर्वक व्रत-उपवास और पूजा-पाठ का पालन करती रहीं। पर्वतीय जीवन की कठिनाइयों के बीच भी उन्होंने अपने परिवार और समाज को संस्कारों की मजबूत डोर से बांधे रखा।
श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कोश्यारी जी ने कहा कि लछिमा देवी जैसी मातृशक्ति ही उत्तराखण्ड की असली पहचान हैं। “आमा का जीवन हमें यह सिखाता है कि संस्कृति और मूल्यों की रक्षा केवल शब्दों से नहीं, बल्कि आचरण से होती है। उनका स्नेह और आशीर्वाद मुझे सदैव प्राप्त होता रहा,” उन्होंने भावुक स्वर में कहा। कोश्यारी जी ने परिजनों को ढांढस बंधाते हुए कहा कि आमा का आदर्श जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बना रहेगा।
लछिमा देवी का परिवार सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय रहा है। उनके पुत्र हयात सिंह कोरंगा भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं, जबकि उनके नाती गौरव कोरंगा युवा समाजसेवी के रूप में क्षेत्र में अपनी पहचान रखते हैं। पूरे परिवार में सेवा और संस्कार की जो परंपरा दिखाई देती है, वह कहीं न कहीं आमा के जीवन मूल्यों का ही विस्तार है।
ग्रामीणों ने बताया कि आमा का आंगन हमेशा अतिथियों और जरूरतमंदों के लिए खुला रहता था। वे सरल स्वभाव, मधुर वाणी और गहरी आस्था के लिए जानी जाती थीं। लोकगीतों, पारंपरिक रीति-रिवाजों और पर्व-त्योहारों में उनकी सक्रिय भागीदारी उन्हें गांव की आत्मा बना देती थी।
खुरियाखत्ता में श्रद्धांजलि सभा के दौरान अनेक जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता और क्षेत्रवासी उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में कहा कि लछिमा देवी का जीवन पर्वतीय संस्कृति की जीवित धरोहर था।
बिंदुखत्ता की ‘आमा’ भले ही इस संसार से विदा हो गई हों, पर उनकी स्मृतियाँ, उनके संस्कार और उनका स्नेह सदैव इस पहाड़ी अंचल की आत्मा में जीवित रहेंगे।

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