दिल्ली के ‘एसी’ पंडालों में उमड़ रहा ‘पहाड़ी-प्रेम’, और असली पहाड़ों में दम तोड़ रहे सदियों पुराने मेले!

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दिल्ली के ‘एसी’ पंडालों में उमड़ रहा ‘पहाड़ी-प्रेम’, और असली पहाड़ों में दम तोड़ रहे सदियों पुराने मेले!

*विशेष रिपोर्ट*

देहरादून/हल्द्वानी:आजकल राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और एनसीआर के बड़े-बड़े मैदानों में ‘पहाड़ी कौथिग’ और ‘उत्तरायणी मेलों’ की बाढ़ सी आई हुई है। सप्ताहांत आते ही प्रवासी पहाड़ियों का हुजूम दिल्ली के इन मेलों में उमड़ पड़ता है। डीजे की तेज धुन पर बजते पहाड़ी गीतों पर नाचते लोग, ‘पहाड़ी’ टोपी पहनकर सेल्फी लेते युवा और स्टॉलों पर बिकती महंगी बाल मिठाई सब देखकर ऐसा लगता है मानो पूरा पहाड़ दिल्ली में ही उतर आया हो। लेकिन इस चकाचौंध के बीच एक कड़वा सच हमारी जड़ों पर हंस रहा है।

जिस पहाड़ की संस्कृति को बचाने का दावा दिल्ली के इन ‘एसी’ और टेंट वाले पंडालों में किया जा रहा है, उसी पहाड़ के असली गांवों में सदियों पुराने मेले आज सन्नाटे में दम तोड़ रहे हैं।

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पलायन का ‘जश्न’ या संस्कृति का ‘अंतिम संस्कार’?

यह कैसी विडंबना है कि जिन मेलों की शुरुआत गांवों के देवी-देवताओं के प्रांगण में, ढोल-दमाऊ की गूंज और सामूहिक मेल-मिलाप के लिए हुई थी, वे अब कंक्रीट के जंगलों का वीकेंड इवेंट बनकर रह गए हैं। जो प्रवासी लाखों रुपये चंदा इकट्ठा करके दिल्ली में पहाड़ बसाने की जिद पाले हुए हैं, वे अपने खाली पड़े गांवों की तरफ मुड़कर देखने को तैयार नहीं हैं।

 वीरान होते खलिहान: एक समय था जब पहाड़ों के थल मेले, गिंदी मेले, गोचर और देवीधुरा जैसे मेलों में पैर रखने की जगह नहीं होती थी। आज पलायन की मार झेल रहे गांवों (घोस्ट विलेज) में इन मेलों को आयोजित करने के लिए युवा तक नहीं बचे हैं।

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 नकली नॉस्टेल्जिया: दिल्ली के मेलों में झंगोरे की खीर और मंडुवे की रोटी खाकर संस्कृति बचाने का भ्रम पाला जा रहा है, जबकि पहाड़ों में खेती बंजर हो चुकी है।

असली समाधान: जड़ों की ओर लौटना

विशेषज्ञों और स्थानीय बुजुर्गों का मानना है कि दिल्ली में लाखों-करोड़ों फूंकने से पहाड़ की संस्कृति नहीं बचेगी। अगर सच में अपनी मिट्टी से प्रेम है, तो प्रवासियों को चाहिए कि वे अपने संसाधनों और ऊर्जा का इस्तेमाल अपने पैतृक गांवों के उन पुराने मेलों को पुनर्जीवित करने में लगाएं, जो अब इतिहास के पन्नों में सिमटते जा रहे हैं।

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अगर पहाड़ के मेले वापस पहाड़ों में लौटें, तो न सिर्फ वहां की मृतप्राय हो चुकी स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यटन को संजीवनी मिलेगी, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों का असली अहसास भी होगा।

महानगरों की चौंध में अपनी संस्कृति का ‘फैंसी ड्रेस कॉम्पिटिशन’ आयोजित करना आसान है, लेकिन बीहड़ पहाड़ों में अपनी जड़ों को सींचना मुश्किल। वक्त आ गया है कि दिल्ली में ‘पहाड़’ सजाने का यह दिखावा बंद हो, और असली पहाड़ को वीरान होने से बचाने के लिए कदम उठाए जाएं। क्योंकि जड़ें कटने के बाद, गमलों में लगे पेड़ सिर्फ सजावट के काम आते हैं, छांव नहीं देते।

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