​स्कंद पुराण के मानस खंड में वर्णित ‘महादेवी वृन्दा’ ही हैं अल्मोड़ा की जाग्रत शक्तिपीठ ‘माँ बानड़ी देवी’

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स्कंद पुराण के मानस खंड में वर्णित ‘महादेवी वृन्दा’ ही हैं अल्मोड़ा की जाग्रत शक्तिपीठ ‘माँ बानड़ी देवी’
​लेखक: रमाकान्त पन्त
​देवभूमि उत्तराखंड के कण-कण में देवताओं का वास है। यहाँ के ऊँचे पर्वत शिखर और घने वन सदियों से ऋषियों-मुनियों की तपस्थली रहे हैं। इन्हीं पावन शिखरों में से एक है अल्मोड़ा जिले के लमगड़ा ब्लॉक में स्थित ‘माँ बानड़ी देवी’ (या बाणड़ी देवी) का मंदिर। समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर अष्टकोणीय शैली में बना यह मंदिर केवल एक आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध हमारे प्राचीन ग्रंथों, विशेषकर स्कंद पुराण के ‘मानस खंड’ से है।
​लोक परंपरा में जो माता आज ‘बानड़ी देवी’ के नाम से पूजी जा रही हैं, वे पुराणों में वर्णित महादेवी ‘वृन्दा’ ही हैं।
​मानस खंड में महादेवी वृन्दा का श्लोक और प्रमाण
​स्कंद पुराण के मानस खंड के अध्याय ५६ (‘कपिलाश्रम माहात्म्य’) में महर्षि व्यास और ऋषियों के संवाद में इस पावन क्षेत्र का बहुत ही सुंदर वर्णन मिलता है। व्यास जी पवित्र कौशिकी (कोसी) नदी के वाम भाग में स्थित एक अत्यंत पवित्र और रहस्यमयी पर्वत शिखर का वर्णन करते हुए कहते हैं:
​”वामे तस्य महाभागा: पुण्यो वृन्दगिरि: स्मृत:।
यत्र वृन्दा महादेवी पूज्यते गणनायकै:।।१।।”
​अर्थात: “कौशिकी के वाम भाग में पवित्र ‘वृन्द’ पर्वत है। वहाँ शिवजी के प्रमुख गणों द्वारा ‘वृन्दा-देवी’ का पूजन किया जाता है।”
​इस श्लोक का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मानस खंड के इसी पृष्ठ (अध्याय ५६) के फुटनोट में स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि पौराणिक ‘वृन्दा देवी’ का ही प्रचलित नाम ‘बानणी देवी’ है। यह ऐतिहासिक और पौराणिक प्रमाण इस मंदिर की दिव्यता को कई गुना बढ़ा देता है, क्योंकि यहाँ साक्षात महादेवी वृन्दा विराजमान हैं जिनकी वंदना स्वयं नंदी, भृंगी आदि शिवगण करते हैं।

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साक्षात विंध्यवासिनी और बाराही शक्ति का स्वरूप

मानस खंड में वर्णित ‘वृन्दा देवी’ और कूर्मांचल की लोक परंपरा में पूजित ‘बानड़ी देवी’ वास्तव में माता विंध्यवासिनी का ही जाग्रत और परम कल्याणकारी रूप हैं। मंदिर के गर्भगृह में मुख्य रूप से माता विंध्यवासिनी की ही पिंडी स्थापित है, जिनकी आराधना भक्तगण अत्यंत श्रद्धाभाव से करते हैं।
​इसके साथ ही, लोक आस्था के अनुसार माता को कुमाऊं की अत्यंत शक्तिशाली देवी ‘माँ बाराही’ के अंश के रूप में भी पूजा जाता है। विंध्यवासिनी और बाराही महाशक्ति का यह समन्वित रूप इस शक्तिपीठ की आध्यात्मिक ऊर्जा को और भी अधिक शक्तिशाली बना देता है।

पापनाशक और सिद्धियों का क्षेत्र: कपिल-क्षेत्र

मानस खंड के ५७वें अध्याय के अनुसार, यह क्षेत्र दारुकानन और वृन्द पर्वत के मध्य स्थित ‘कपिल-क्षेत्र’ का हिस्सा है। महर्षि व्यास जी बताते हैं कि इस वृन्द पर्वत के दर्शन मात्र से प्राणी के जन्म-जन्मांतर के पाप विनष्ट हो जाते हैं। यहाँ कपिला और शरावती नदियों का पवित्र संगम है।
​यह क्षेत्र योगियों और सांख्य-योग के मनीषियों की सिद्धभूमि रहा है। यहाँ विराजमान कपिलेश्वर महादेव योग के परम ज्ञानी हैं। कथा यह भी है कि वासुकि आदि नागों ने जब कपिल मुनि से पापों से मुक्ति का मार्ग पूछा, तो उन्होंने इसी क्षेत्र में कपिलेश्वर महादेव की आराधना का उपदेश दिया था। यह क्षेत्र नंदी, स्कंद, गणेश तथा सोलह मातृकाओं से सुरक्षित है, जिसकी अधिष्ठात्री स्वयं वृन्दा (बानड़ी) देवी हैं।

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इतिहास और वास्तुकला का अद्भुत संगम

पौराणिक मान्यताओं के साथ-साथ यह स्थान ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध है:
​चंद वंशीय धरोहर: माना जाता है कि वर्तमान मंदिर १५वीं सदी में चंद राजाओं के शासनकाल में अपने मौजूदा स्वरूप में आया।
​अष्टकोणीय वास्तुकला: यह प्राचीन वैष्णवी शक्तिपीठ अष्टकोणीय  शैली में निर्मित है, जो इसे कुमाऊं की अन्य मंदिर शैलियों से थोड़ा अलग और विशेष बनाता है।
​विष्णु की दुर्लभ प्रतिमा: मंदिर परिसर में शेषनाग पर विराजमान भगवान विष्णु की एक अत्यंत प्राचीन और दुर्लभ प्रतिमा भी मौजूद है।
​अखंड ज्योति की अनोखी परंपरा
​बानड़ी देवी के दरबार में मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। यहाँ की एक अनोखी मान्यता है कि जब किसी भक्त की मन्नत पूरी हो जाती है, तो वह कृतज्ञता स्वरूप मंदिर में लगातार नौ दिनों तक ‘अखंड ज्योति’ (अखंड दीपक) प्रज्वलित करता है। नवरात्रि के समय यहाँ भक्तों का विशेष तांता लगता है और संपूर्ण हिमालयी क्षेत्र माता के जयकारों से गूंज उठता है।

लालकुआँ के भक्तों की अटूट आस्था: एक दिव्य अनुभव

लालकुआँ से माँ बानड़ी देवी के दर्शन के लिए आए भक्त श्री नारायण सिंह बिष्ट, श्री दीवान सिंह बिष्ट, श्रीमती कविता बिष्ट और श्रीमती चंपा बिष्ट ने मंदिर परिसर में “अखंड ज्योति” प्रज्वलित की और माता का आशीर्वाद लिया। उन्होंने अपने इस अनुभव को “अविस्मरणीय और दिव्य” बताया।
​भक्तों ने साझा किया कि जैसे ही उन्होंने मंदिर परिसर में प्रवेश किया, उन्हें एक अलौकिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का अहसास हुआ। अष्टकोणीय मंदिर की वास्तुकला और चारों ओर के घने जंगलों के शांत वातावरण ने उन्हें मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने कहा, “माँ विंध्यवासिनी के पिंडी रूप के दर्शन पाकर हमारी आत्मा तृप्त हो गई। अखंड ज्योति की लौ में हमें माता की उपस्थिति और उनकी असीम कृपा का प्रत्यक्ष अनुभव हुआ। यह यात्रा हमारे लिए केवल एक दर्शन नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक कायाकल्प थी।” उन्होंने माँ बानड़ी देवी के प्रति अपनी अटूट आस्था व्यक्त की और कहा कि यह अनुभव उनके जीवन भर एक दिव्य स्मृति के रूप में संजोकर रखा जाएगा।
​कैसे पहुँचें माँ के दरबार?
​अल्मोड़ा से लगभग २६-३४ किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह मंदिर घने जंगलों से घिरा है, जहाँ से हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों का विहंगम दृश्य दिखाई देता है।
​सड़क मार्ग: अल्मोड़ा से टैक्सी या बस द्वारा लमगड़ा के रास्ते यहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है।
​निकटतम रेलवे स्टेशन: काठगोदाम (लगभग ९० किमी)।
​निकटतम हवाई अड्डा: पंतनगर (१२७ किमी)।
​स्कंद पुराण के पन्नों से लेकर आज के आधुनिक युग तक, वृन्द पर्वत की अधिष्ठात्री वृन्दा देवी यानी माँ बानड़ी देवी निरंतर अपने भक्तों का कल्याण कर रही हैं। यह क्षेत्र केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि योग, शांति और शक्ति का एक जाग्रत प्रकाश-स्तंभ है।

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