​महामंत्र ‘ॐ नमः शिवाय’: सदा पवित्र, सदा सिद्ध और सम्पूर्ण मानवता का अधिकार

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संपादक की कलम से…
​प्रिय पाठकों,
​सनातन धर्म असीम ज्ञान, गूढ़ रहस्यों और परंपराओं का महासागर है। अक्सर हम पूजा-पाठ और अनुष्ठानों के कड़े नियमों, दिशा-काल, दीक्षा और सूतक-पातक के बंधनों में उलझकर ईश्वर से अपनी दूरी मान बैठते हैं। मन में यह संशय उठता है कि क्या देवों के देव महादेव का प्रेम और उनकी कृपा किसी विशेष कर्मकांड या पांडित्य की मोहताज है?
​इसी जिज्ञासा का समाधान खोजते हुए हमने पुराणों, वेदों, उपनिषदों, देवी भागवत और महाकाव्यों का गहन अध्ययन किया। इस मंथन से जो सत्य सामने आया, वह न केवल अद्भुत है बल्कि समाज के हर वर्ग—चाहे वह स्त्री हो, वंचित हो या कर्मकांडों से अनभिज्ञ कोई साधारण मनुष्य—सभी को परब्रह्म के समक्ष पूर्ण और समान अधिकार देता है।
​प्रस्तुत आलेख मात्र एक लेख नहीं, बल्कि सनातन धर्म के सर्वोच्च ग्रंथों का वह प्रामाणिक और शोधपरक सार है, जो यह सिद्ध करता है कि ‘ॐ नमः शिवाय’ केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि साक्षात् शिव का स्वरूप है। जिस महामंत्र का जप स्वयं प्रभु श्रीराम, योगेश्वर श्रीकृष्ण, रुद्रावतार हनुमान और आदिशक्ति जगदम्बा करती हैं, उस पर दिशा, काल, स्थान या किसी दीक्षा का कोई सांसारिक बंधन लागू नहीं होता।
​आशा है, ‘शैल शक्ति’ के इस धर्म-अध्यात्म विशेषांक का यह आलेख आपके आध्यात्मिक चिंतन को एक नई, मुक्त और विशाल दिशा देगा। यह आपको महादेव की उस विराट करुणा से परिचित कराएगा जहाँ पहुँचने के लिए किसी बिचौलिए की नहीं, बल्कि केवल ‘भाव’ और ‘श्रद्धा’ की आवश्यकता है।
​हर हर महादेव!

राजेंद्र पंत ‘रमाकांत’ संपादक, शैल शक्ति

 

​महामंत्र ‘ॐ नमः शिवाय’: सदा पवित्र, सदा सिद्ध और सम्पूर्ण मानवता का अधिकार

​सनातन धर्म के विस्तृत वांग्मय में मंत्रों और अनुष्ठानों की एक विशाल परंपरा है। अधिकांश वैदिक और तांत्रिक मंत्रों के जप के लिए दिशा, काल, स्थान, शारीरिक पवित्रता और विधिवत गुरु-दीक्षा के कड़े नियम निर्धारित हैं। परंतु, देवों के देव महादेव की करुणा इन सभी कर्मकांडीय सीमाओं से कहीं ऊपर है। भगवान शिव का पंचाक्षर मंत्र ‘नमः शिवाय’ (या प्रणव युक्त षडाक्षर ‘ॐ नमः शिवाय’) एक ऐसा स्वयंसिद्ध, कालजयी और सार्वभौमिक महामंत्र है, जिस पर सृष्टि के प्रत्येक प्राणी का समान रूप से अधिकार है।

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स्कंद पुराण (केदार खण्ड) का अद्भुत रहस्य: जब मंत्र ही ‘नाम’ बन गया

स्कंद पुराण के ‘केदार खण्ड’ में देवर्षि नारद द्वारा कृत ‘शिव सहस्रनाम’ (भगवान शिव के 1000 नामों का स्तोत्र) का एक अत्यंत विलक्षण और गूढ़ रहस्य वर्णित है। सामान्यतः स्तोत्रों में भगवान के गुणवाचक या लीला आधारित नाम होते हैं, परंतु नारद जी द्वारा स्तुत इस शिव सहस्रनाम में ‘ॐ नमः शिवाय’ को केवल एक मंत्र के रूप में नहीं, बल्कि साक्षात् भगवान शिव के एक ‘नाम’ के रूप में ही समाहित किया गया है। जब देवर्षि नारद जैसे परम ज्ञानी शिव के हजार नामों की स्तुति करते हैं, तो वे इस पंचाक्षर मंत्र को शिव के साक्षात् स्वरूप के रूप में पूजते हैं। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि नाम और नामी में रत्ती भर भी भेद नहीं है। यह मंत्र ही शिव है, और शिव ही यह मंत्र हैं।

ॐ ही नमः शिवाय है और नमः शिवाय ही ॐ

शिव पुराण की ‘विद्येश्वर संहिता’ में यह स्पष्ट किया गया है कि प्रणव (ॐ) और पंचाक्षर (नमः शिवाय) में कोई भेद नहीं है। ‘ॐ’ बीज है और ‘नमः शिवाय’ उसका विस्तार। ‘ॐ’ साक्षात् शिव का नाद स्वरूप है। जिस प्रकार वृक्ष बीज में और बीज वृक्ष में समाहित होता है, उसी प्रकार ॐ ही नमः शिवाय है और नमः शिवाय ही ॐ है। ### राम और ॐ नमः शिवाय में अभेदता: दोनों ही तारक मंत्र
शास्त्रों में यह रहस्य उद्घाटित किया गया है कि भगवान राम का नाम और शिव का पंचाक्षर मंत्र—दोनों में रत्ती भर भी भेद नहीं है। ‘राम’ महामंत्र का निर्माण ही ‘ॐ नमो नारायणाय’ के ‘रा’ और ‘ॐ नमः शिवाय’ के ‘म’ (मकार) से मिलकर हुआ है। जो ‘ॐ नमः शिवाय’ है, वही साक्षात् राम है; और जो ‘राम’ है, वही साक्षात् शिव है।

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​गणेश, कार्तिकेय, सूर्य, माता पार्वती व दस महाविद्याओं का ईष्ट मंत्र

माता पार्वती और शिव परिवार: प्रथम पूज्य श्री गणेश, देव सेनापति भगवान कार्तिकेय और स्वयं आदिशक्ति माता पार्वती का मूल ईष्ट मंत्र और ध्यान का केंद्र ‘ॐ नमः शिवाय’ ही है।
​सूर्य भगवान और दस महाविद्याएं: प्रत्यक्ष देवता सूर्यदेव परब्रह्म शिव के इसी नाद का ध्यान करते हैं। शक्ति की सर्वोच्च स्वरूपा दस महाविद्याओं (काली, तारा, बगलामुखी आदि) की उग्र साधनाओं का अंतिम शिखर भी ‘ॐ नमः शिवाय’ के नाद में ही विलीन होता है।

देवी भागवत पुराण: शिव-शक्ति की अभेदता और पंचाक्षर की महिमा

​’देवी भागवत पुराण’ मुख्य रूप से भगवती आदिशक्ति की महिमा का गान करता है, परंतु यह शिव और शक्ति की अभेदता (एकत्व) का परम प्रमाण भी देता है। देवी भागवत के एकादश स्कन्ध (11वें स्कन्ध) में स्पष्ट किया गया है कि जो भक्त ‘ॐ नमः शिवाय’ का उच्चारण करते हुए भस्म धारण करता है, उस पर साक्षात् भगवती जगदम्बा और महादेव दोनों की असीम कृपा होती है। भगवती उसी भक्त से सर्वाधिक प्रसन्न होती हैं, जिसके मुख पर महादेव का पंचाक्षर मंत्र होता है। अतः शाक्तों के लिए भी शिव का पंचाक्षर मंत्र परम कल्याणकारी माना गया है।

​भगवान राम, कृष्ण और रुद्रावतार हनुमान का आश्रय

भगवान राम: रामेश्वरम की स्थापना करते हुए प्रभु राम ने शिव की अराधना की थी। गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है “शिव द्रोही मम दास कहावा, सो नर मोहि सपनेहुँ नहिं पावा।”
​श्री हनुमान जी: एकादश रुद्रावतार श्री हनुमान जी की अनंत शक्तियों का मूल स्रोत भी शिव का ‘ॐ नमः शिवाय’ ही है।
​श्रीकृष्ण: भगवान श्रीकृष्ण ने महर्षि उपमन्यु से विधिवत शिव-दीक्षा ग्रहण की थी। श्रीकृष्ण के लिए शिव परम आराध्य हैं और यह उनका ईष्ट मंत्र है।

शिव पुराण में ‘ॐ नमः शिवाय’ की अनंत महिमा

विद्येश्वर संहिता: इसका उद्घोष है: ‘अशुचिर्वा शुचिर्वापि गच्छंस्तिष्ठन्स्वपन्नपि’ अर्थात् मनुष्य पवित्र हो या अपवित्र, चलते-फिरते या सोते हुए भी निरंतर इस पंचाक्षर मंत्र का जप कर सकता है।
​वायवीय संहिता: कलियुग में समाज के अंतिम व्यक्ति और भटके हुए व्यक्ति के लिए भी यह मंत्र कभी निष्फल नहीं होता।
​रुद्र संहिता: ‘नमः शिवाय’ के पांच अक्षर संपूर्ण ब्रह्मांड के पांच तत्वों को नियंत्रित करते हैं।

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नारद पुराण: देश, काल और सूतक-पातक के दोषों से पूर्णतः मुक्त

नारद पुराण में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ‘ॐ नमः शिवाय’ जैसे महामंत्र के जप के लिए दिशा, समय या स्थान का कोई बंधन नहीं है (न काल नियमो यत्र न देश नियमस्तथा)। जन्म या मृत्यु के कारण लगने वाले ‘सूतक’ या ‘पातक’ की अवस्था में भी शिव के नाम का मानसिक जप नहीं रुकना चाहिए।
​वेदों, उपनिषदों और अन्य पुराणों का निर्विवाद उद्घोष
​वेद और उपनिषद: इसका उद्गम ‘कृष्ण यजुर्वेद’ में है: “नमः शिवाय च शिवतराय च”। अथर्ववेद का ‘व्रात्य काण्ड’ स्पष्ट करता है कि शिव आराधना के लिए ‘उपनयन’ जैसे कर्मकांड की आवश्यकता नहीं है। श्वेताश्वतर और कैवल्य उपनिषद इसे परम ‘तारक मंत्र’ मानते हैं।
​स्कंद पुराण: ब्रह्मोत्तर खण्ड उद्घोष करता है : “नास्य दीक्षा न होमश्च न संस्कारो न तर्पणम्।” अर्थात्, इस पंचाक्षर मंत्र को धारण करने के लिए न दीक्षा चाहिए, न हवन, न कोई शुभ मुहूर्त।
​लिंग और मत्स्य पुराण: लिंग पुराण इसे वेदों का सार बताता है, और मत्स्य पुराण इसी मंत्र से शिव पूजन का विधान बताता है। विष्णु पुराण कलियुग में नाम-संकीर्तन मात्र से मोक्ष की प्राप्ति का विधान बताता है।
​कुल मिलाकर ॐ नमः शिवाय 
​वेद, उपनिषद, इतिहास और पुराणों का यह सम्मिलित स्वर सनातन धर्म की उस परम उदारता को दर्शाता है, जहाँ ईश्वर तक पहुँचने के लिए किसी बिचौलिए या जटिल प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं है। ‘ॐ नमः शिवाय’ वह महामंत्र और नाम है जिसे जपने वाले पर स्वयं देवी भागवत की जगदम्बा, गणेश, सूर्य, दस महाविद्याएं, राम, कृष्ण और हनुमान भी स्वतः प्रसन्न हो जाते हैं। जो भी जीव सच्चे हृदय से इस सदा पवित्र मंत्र को पुकारता है, सदाशिव उसके लिए उसी क्षण सुलभ हो जाते हैं।

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