रहस्य और आस्था का संगम: देवभूमि का ‘मुंडकटिया मंदिर’, जहाँ बिना सिर के पूजे जाते हैं विघ्नहर्ता
देवभूमि का रहस्य: जहाँ बिना सिर के विराजे हैं गणेश
: रहस्यमयी मुंडकटिया: इकलौता मंदिर जहाँ होती है भगवान गणेश के ‘धड़’ की पूजा
व रहस्य: शिव के क्रोध का गवाह, बिना सिर वाले गणेश का मंदिर
रुद्रप्रयाग/भारत में भगवान गणेश के हजारों मंदिर हैं, जहाँ भक्त उनके गजमुख (हाथी के सिर वाले) रूप की आराधना करते हैं। लेकिन, ‘देवभूमि’ उत्तराखंड की शांत और पवित्र वादियों में एक ऐसा अनोखा मंदिर भी छिपा है, जिसके बारे में जानकर आप हैरान रह जाएंगे। यह दुनिया का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहाँ भगवान गणेश की पूजा बिना सिर (धड़) के रूप में की जाती है।
इस अद्भुत और रहस्यमयी मंदिर का नाम है मुंडकटिया मंदिर
कहाँ स्थित है यह अनोखा मंदिर?
यह मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में केदारनाथ यात्रा मार्ग पर स्थित है। केदार घाटी में सोनप्रयाग से गौरीकुंड की तरफ जाते समय, सोनप्रयाग से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर यह पवित्र स्थल मौजूद है।
पौराणिक कथा: क्यों पूजे जाते हैं यहाँ ‘बिना सिर’ वाले गणेश?
इस मंदिर का इतिहास सीधे ‘शिव पुराण’ की उस प्रसिद्ध कथा से जुड़ता है, जिसे हम सभी बचपन से सुनते आ रहे हैं:
बालक गणेश की उत्पत्ति: कथा के अनुसार, माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन (मैल) से एक बालक की मूर्ति बनाई और उसमें प्राण फूंक दिए। उन्होंने उस बालक को अपना द्वारपाल नियुक्त किया और आदेश दिया कि जब तक वे स्नान कर रही हैं, कोई भी अंदर प्रवेश न करे।
भगवान शिव का आगमन और क्रोध: कुछ समय बाद जब भगवान शिव वहाँ पहुँचे, तो बालक गणेश ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। अनजान शिव ने बालक को समझाने का प्रयास किया, लेकिन अपनी माता के आदेश का पालन कर रहे गणेश टस-से-मस नहीं हुए।
सिर धड़ से हुआ अलग: अंततः क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से बालक गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया। पुराणों के अनुसार, यह वही सटीक स्थान है जहाँ यह घटना घटी थी। ‘मुंड’ का अर्थ होता है ‘सिर’ और ‘कटिया’ का अर्थ है ‘कटा हुआ’। इसीलिए इस स्थान और मंदिर का नाम मुंडकटिया पड़ा। बाद में जब माता पार्वती ने विलाप किया, तो भगवान शिव ने एक गज (हाथी) का सिर लाकर गणेश जी के धड़ से जोड़ दिया था।
मंदिर का महत्व और यात्रा
प्राचीन पैदल मार्ग:पुराने समय में जब केदारनाथ की यात्रा मुख्य रूप से पैदल ही की जाती थी, तो भक्त इसी मार्ग से होकर गुजरते थे। शिव के दर्शन करने से पहले, वे यहाँ रुककर विघ्नहर्ता गणेश से अपनी निर्विघ्न यात्रा का आशीर्वाद लेते थे।
असीम शांति: मुख्य सड़क से थोड़ा अलग होने के कारण यहाँ की शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा भक्तों का मन मोह लेती है। यहाँ दर्शन करने मात्र से मन को एक अद्भुत सुकून मिलता है।
कैसे पहुंचें?
हवाई मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा देहरादून का जौलीग्रांट है (लगभग 226 किमी)।
सड़क मार्ग: ऋषिकेश या हरिद्वार से बस/टैक्सी के माध्यम से आप सोनप्रयाग पहुँच सकते हैं। सोनप्रयाग से कुछ ही दूरी तय करके इस मंदिर तक आसानी से पहुँचा जा सकता है।
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