[माँ बगलामुखी जयंती पर विशेष रिपोर्ट]
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देवभूमि उत्तराखंड का कण-कण रहस्यों और चमत्कारों से भरा है। यहाँ की कुमाऊँ पहाड़ियों में स्थित बेरीनाग (नाग भूमि) का क्षेत्र अत्यंत समृद्ध और अलौकिक है। झर-झर बहते झरने, कल-कल करती नदियाँ, हिमालय की उत्तुंग चोटियाँ और देवदार व बांज के मनोहारी वनों के बीच, राईआगर से बेरीनाग जाने वाले मार्ग पर एक ऐसा रहस्यमयी और जागृत शक्तिपीठ स्थित है, जिसका नाता सीधे रामायण काल, नागराजों और सृष्टि के आरंभ से है। यह महान आस्था का केंद्र है— माँ त्रिपुर सुन्दरी (त्रिपुरा देवी) का दरबार।
माँ बगलामुखी जयंती के इस पावन अवसर पर, आइए जानते हैं शक्तिशिरोमणि माँ त्रिपुर सुन्दरी और भगवान मूलनारायण की महिमा के साथ वह परम रहस्य, जब भगवान विष्णु की पुकार पर माँ ने बगलामुखी रूप धारण किया था।
ब्रह्मांड की जननी और ‘माँ बगलामुखी’ के प्राकट्य का महा-रहस्य
दस महाविद्याओं में से एक माता त्रिपुरा देवी के विषय में उपनिषदों में अद्भुत वर्णन मिलता है। सृष्टि के पूर्व केवल माँ त्रिपुरा ही विद्यमान थीं और उन्होंने ही इस ब्रह्मांड की रचना की। इन्हीं से ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और समस्त देवी-देवता उत्पन्न हुए।
पुराणों के अत्यंत गूढ़ रहस्यों में यह वर्णित है कि जगत के पालनहार भगवान विष्णु ने सृष्टि की रक्षा और संकटों के नाश हेतु दस हजार वर्षों तक माँ त्रिपुरा सुन्दरी की कठोर आराधना की थी। भगवान विष्णु की इसी घोर तपस्या और आराधना से प्रसन्न होकर, विश्व रक्षा के उद्देश्य से माँ त्रिपुर सुन्दरी ने ही ‘माँ बगलामुखी’ (पीताम्बरी) के रूप में अवतार लिया था। अर्थात, श्रीहरि द्वारा माँ त्रिपुरा सुन्दरी की स्तुति करने पर ही शत्रुओं का स्तम्भन करने वाली महाशक्ति माँ बगलामुखी प्रकट हुई थीं। इसी कारण माँ को ‘विष्णु चिंताहरिणी’ भी कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने प्रकट होकर श्रीहरि की समस्त चिंताओं का हरण कर लिया था।
इस दरबार में माँ के श्री चक्र (श्री यंत्र) की पूजा होती है। श्याम वर्ण में ‘काली’ और गौर वर्ण में ‘राज राजेश्वरी’ कहलाने वाली यह देवी सौंदर्य, स्वास्थ्य और ऐश्वर्य प्रदान करती हैं।
महाबली हनुमान जी की तपोभूमि और सुग्रीव का उद्धार
स्कंद पुराण के मानस खंड के ८४वें अध्याय (नारायणी महात्म्य) में इस पवित्र भूमि का एक अत्यंत रोचक प्रसंग है, जो इसे सीधे त्रेतायुग से जोड़ता है।
वानरराज और मारुति नंदन का तप: पुराणों के अनुसार, इन्ही दुर्गम नाग पर्वतों में वानरराज बाली और स्वयं श्री हनुमान जी ने कठोर तपस्या की थी।
सुग्रीव को राज्य की प्राप्ति: महादेव-प्रिया माँ मूलनारायणी (त्रिपुरा देवी) की आराधना और उनकी असीम कृपा के फलस्वरूप ही सुग्रीव को प्रभु श्री राम का सानिध्य प्राप्त हुआ, जिससे वे बाली के अधिकार से अपना खोया हुआ राज्य वापस पाने में सफल हुए।
भगवान मूलनारायण और नागकुल की परम आराध्या
बेरीनाग क्षेत्र अपने रहस्यमयी नाग मंदिरों की श्रृंखला के लिए विश्वविख्यात है। नाग पर्वतों में नाग प्रमुख के रूप में पूजे जाने वाले ‘भगवान मूलनारायण’ ने इसी स्थान पर महावैभव प्राप्त किया था।
पूर्व जन्म के तप के प्रताप से उन्होंने भगवान विष्णु की अचल भक्ति की। प्रसन्न होकर श्री हरि ने उन्हें अजर-अमर देह का वरदान दिया और अपना सर्वपापहारी ‘नारायण’ नाम प्रदान किया। भगवान विष्णु की ही प्रेरणा से मूलनारायण जी ने माँ त्रिपुर सुन्दरी की कठोर तपस्या की। प्रसन्न होकर माँ त्रिपुरा ने उन्हें दर्शन दिए और एक अत्यंत विशाल (दस योजन लंबी और बारह योजन चौड़ी) रहस्यमयी दिव्य गुफा तथा अपनी शेषनाग सेवित नगरी के दर्शन कराए।
यहीं मूलनारायण जी ने समस्त नागकुल के साथ माँ भगवती का पूजन किया, जिसके बाद यह क्षेत्र ‘मूलनारायणी’ नाम से भी प्रसिद्ध हुआ। महर्षि वेदव्यास जी ने स्कंद पुराण में लिखा है:
”सर्वे नागा महात्मानों देवीं त्रिभुवनेश्वरीम”
(अर्थात, नाग पर्वत पर विराजमान सभी नागगण माता त्रिपुर सुन्दरी की उपासना कर स्वयं को धन्य करते हैं।)
शक्तिपीठ की क्षेत्रीय आस्था और रहस्यमयी पूजा विधान
जनपद पिथौरागढ़ के राईआगर और बेरीनाग के बीच स्थित यह शक्तिपीठ साधना और तंत्र-मंत्र की दृष्टि से सर्वोत्तम माना जाता है।
कुण्डलिनी जागरण का केंद्र: यहाँ देवी की सघन साधना से साधकों की कुण्डलिनी शक्ति जागृत होती है। यहाँ माँ के साथ ‘बाला त्रिपुर सुन्दरी’ की भी पूजा की जाती है।
क्षेत्रपाल ‘बाण देवता’: इस परम रहस्यमयी मंदिर परिसर में क्षेत्रपाल के रूप में ‘बाण देवता’ की पूजा की जाती है। सबसे अनूठी बात यह है कि इन्हें विशेष रूप से ‘खिचड़ी’ का भोग लगाया जाता है।
शुभ कार्यों का श्रीगणेश: स्थानीय लोग किसी भी नए कार्य का शुभारंभ माँ महामाया त्रिपुर सुन्दरी का स्मरण करके ही करते हैं।
नवरात्रि और माँ बगलामुखी जयंती के पावन अवसर पर यहाँ भक्तों का भारी तांता लगा रहता है। शास्त्रों का वचन है— “पूज्य याति परां सिद्वि मानवो मुनिसत्तमाः” अर्थात माँ त्रिपुरा देवी की अलौकिक आभा और पूजन से भक्तों को अभीष्ट सिद्धियों की प्राप्ति सहज ही हो जाती है।
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