मानसखण्ड का अनसुलझा रहस्य: शापित महालिंग
दारुकवन का रहस्य: शिव का खण्डित स्वरूप
देवभूमि का रहस्य: महालिंग का पतन
हिमालय की गुप्त गाथा: अनंत ज्योतिर्लिंग के खण्ड
कुमाऊँ का रहस्य: क्रोध, शाप और प्रथम शिवालय
सप्तर्षियों का रहस्यमयी शाप
पाताल भेदने वाले लिंग का रहस्य
शिव का वैराग्य, ऋषियों का शाप और महालिंग का रहस्य
जागेश्वर /उत्तराखंड के जनपद अल्मोड़ा में स्थित जागेश्वर धाम भगवान शिव का एक परम अलौकिक और रहस्यमयी धाम है। स्कन्द पुराण के मानसखण्ड की अनसुनी कथाओं के अनुसार, यही वह पवित्र ‘दारुकवन’ है जहाँ ऋषियों के शापवश महादेव का प्रथम ज्योतिर्लिंग पृथ्वी पर अवतरित हुआ था। सघन देवदार के प्राचीन वृक्षों और कल-कल बहती जटागंगा नदी के किनारे बसे इस धाम में आज भी भगवान शिव का अनंत तेज स्पंदित होता प्रतीत होता है। पौराणिक मान्यता है कि जब पृथ्वी उस महालिंग का असीम भार न सह सकी, तो विष्णु जी ने चक्र से उसका विभाजन कर यहीं से सम्पूर्ण भूमण्डल में शिवलिंगों का विस्तार किया था। अनादि काल से आस्था का केंद्र रहे जागेश्वर धाम के कण-कण में शिव के वैराग्य और महालिंग के अवतरण का वह गूढ़ रहस्य आज भी सुरक्षित है।
प्राचीन काल की बात है, जब दक्ष प्रजापति ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था। उस यज्ञ में उन्होंने सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, परन्तु अपने दामाद भगवान शंकर और पुत्री सती (काली) को निमंत्रण नहीं दिया। पिता के घर हो रहे इस आयोजन के बारे में सुनकर सती बिना बुलाए ही वहाँ चली गईं। परन्तु वहाँ पहुँचने पर उन्हें अपने पिता दक्ष द्वारा अपमानित होना पड़ा। अपने और अपने पति के इस घोर अपमान को सहन न कर पाने के कारण, माँ सती ने उसी यज्ञ वेदी की अग्नि में प्रवेश कर अपने प्राण त्याग दिए।
जब भूतभावन भगवान शिव को यह ज्ञात हुआ कि उनकी प्रिय सती भस्म हो गई हैं, तो उनका क्रोध ज्वाला बनकर फूट पड़ा। क्रोधित शिव ने दक्ष के यज्ञ को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया और यज्ञ-मण्डप उखाड़ फेंके।
सती के वियोग ने भगवान शिव को गहरे शोक में धकेल दिया। सती की स्मृति में डूबे, वैराग्य धारण कर शिव ने अपने मस्तक पर कपाल धारण किया और सब कुछ त्यागकर देवदार के वृक्षों से घिरे हिमालय के ‘दारुकवन’ (दारु वन) की ओर प्रस्थान किया। वहाँ वे भस्म रमाये, बाघाम्बर पहने, सर्पों की माला धारण किये हुए एक अवधूत के रूप में घोर तपस्या और ध्यान में लीन हो गए।
उसी दारुकवन में वशिष्ठ आदि कई महान ऋषि अपने परिवारों के साथ आश्रम बनाकर रहते थे। एक दिन उन ऋषियों की पत्नियाँ वन में समिधा (यज्ञ की लकड़ियाँ) और कुशा लेने के लिए गईं। वन में भटकते हुए उनकी दृष्टि असीम शांति और ध्यान में लीन, भस्म-रमाये भगवान शिव पर पड़ी। शिव के उस अद्भुत, अलौकिक और दिगम्बर स्वरूप को देखकर ऋषि-पत्नियां सुध-बुध खो बैठीं। वे उनके आकर्षण में इस कदर मोहित हो गईं कि उन्हें न तो भूख-प्यास की चिंता रही और न ही अपने घर लौटने की स्मृति।
जब रात होने लगी और पत्नियाँ आश्रम नहीं लौटीं, तो वशिष्ठ और अन्य ऋषि चिंतित हो उठे। वे अपनी पत्नियों को खोजते हुए वन में निकले। वहाँ उन्होंने देखा कि उनकी पत्नियाँ एक ध्यानमग्न तपस्वी (शिव) के चारों ओर मुग्ध होकर खड़ी हैं। अज्ञानतावश और क्रोध में आकर ऋषियों ने शिव को साधारण तपस्वी समझ लिया और बिना उनका वास्तविक स्वरूप जाने उन्हें शाप दे दिया कि *”हे तपस्वी! तुम्हारा लिंग कटकर इसी क्षण पृथ्वी पर गिर पड़े।”*
भगवान शिव ने अपनी आँखें खोलीं। वे निर्दोष थे और पूर्णतः ध्यानयोग में स्थित थे। उन्होंने ऋषियों से कहा, “हे मुनिजनों! तुमने मुझे बिना किसी अपराध के शाप दिया है। मैं ध्यान में था, फिर भी तुम्हारे वचनों का मान रखने के लिए मैं इस शाप को स्वीकार करता हूँ। परन्तु, इस निरपराध को शाप देने के कारण तुम सभी ऋषि अपनी पत्नियों सहित आकाश में ‘सप्तर्षि’ तारे बनकर लटकोगे।”
देखते ही देखते भगवान शिव का वह तेजोमय लिंग पृथ्वी पर गिर पड़ा। वह लिंग इतना विशाल और ऊर्जावान था कि वह सातों पातालों को भेदता हुआ पाताल लोक तक जा पहुँचा और ऊपर आकाश तक व्याप्त हो गया। उस महालिंग के भार और ताप से पूरी पृथ्वी कांपने लगी। पृथ्वी (वसुधा) ने गाय का रूप धारण किया और भयभीत होकर ब्रह्मा और विष्णु के पास सहायता के लिए पहुँची।
सभी देवता घबराकर पाताल लोक गए ताकि उस लिंग का अंत पा सकें, परन्तु उस ज्योतिर्मय महालिंग का न तो कोई आदि था और न ही कोई अंत। हारकर सभी देवता, ब्रह्मा, विष्णु और स्वयं पृथ्वी माता भगवान शिव की स्तुति करने लगे।
भगवान विष्णु ने शिव से प्रार्थना करते हुए कहा, “हे महादेव! आपके इस लिंग के भार से पृथ्वी रसातल को जा रही है। यह इस असीम भार को सहन करने में असमर्थ है। कृपया संसार की रक्षा के लिए कोई उपाय करें।”
तब करुणासिंधु भगवान शिव ने प्रसन्न होकर कहा, “हे विष्णु! मैं अपने लिंग के भार को कम करने के लिए इसे स्थिर कर दूँगा। तुम अपने सुदर्शन चक्र से इस महालिंग को खण्डित कर दो।”
शिव की आज्ञा पाकर भगवान विष्णु ने अपने चक्र से उस महालिंग को कई खण्डों में विभक्त कर दिया। जहाँ-जहाँ उस पवित्र महालिंग के टुकड़े गिरे, वहाँ-वहाँ वे संसार के कल्याण के लिए स्थिर हो गए। यही खण्डित अंश आगे चलकर पृथ्वी पर पवित्र ‘शिवलिंगों’ के रूप में पूजनीय हुए, जिनके दर्शन मात्र से देवगण और मनुष्य सभी मुक्ति को प्राप्त करते हैं।
इस प्रकार सती-विरह से उत्पन्न शिव का वैराग्य और ऋषियों का शाप अंततः संसार के लिए शिवलिंगों के रूप में एक महान वरदान बन गया।
महालिंग के असीम भार से जब पृथ्वी कांपने लगी और सभी देवताओं ने भगवान शिव से त्राहिमाम किया, तब करुणासागर शिव ने संसार के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया।
भगवान शिव ने श्रीहरि विष्णु को संबोधित करते हुए कहा, “हे विष्णु! पृथ्वी की रक्षा के लिए तुम अपने सुदर्शन चक्र से इस ज्योतिर्मय महालिंग का विभाजन कर दो। पृथ्वी पर जहाँ-जहाँ मैं अपने प्रिय नन्दी, कार्तिकेय (स्कन्द) और ब्रह्मा जी के साथ विचरण करूँगा, वहाँ-वहाँ मेरे ये शिवलिंग स्थापित हो जाएंगे।”
महादेव ने एक महान वरदान देते हुए आगे कहा, “हे नारायण! मेरी यह प्रबल इच्छा है कि उन सभी पवित्र स्थानों पर तुम और ब्रह्मा भी अपने-अपने अंशों और अन्य देवताओं के साथ सदैव विराजमान रहो। उन पावन स्थानों पर देवता, दानव, सिद्ध, नाग और मनुष्य—सभी समान रूप से मेरी भक्ति करेंगे और मुझे ‘महादेव’ के रूप में पूजेंगे। जहाँ तुम्हारे चरण पड़ेंगे, वे स्थान परम पावन तीर्थ बन जाएंगे।”
देवाधिदेव महादेव के इन कल्याणकारी वचनों को सुनकर लोकपावन भगवान विष्णु ने अपना अमोघ सुदर्शन चक्र उठाया। उन्होंने उस अनंत और विशाल महालिंग को काट कर करोड़ों खण्डों में विभक्त कर दिया। तदुपरान्त, भगवान विष्णु ने उन पवित्र शिवलिंगों को पृथ्वी के नौ खण्डों (नवखण्डों) में स्थापित कर दिया।
महालिंग के इन अंशों के स्थापित होने से यह सम्पूर्ण भूमण्डल परम पवित्र हो गया। पग-पग पर भगवान शिव के लिंग स्वरूप की स्थापना हुई। स्वयं भगवान विष्णु, ब्रह्मा जी और अन्य सभी देवताओं ने अपने अंशों के साथ उन तीर्थ स्थानों पर शिव की विधिवत पूजा-अर्चना आरम्भ की।
जब देवताओं, सिद्धों, नागों, दैत्यों, दानवों और साधारण मनुष्यों को यह ज्ञात हुआ कि पृथ्वी के विभिन्न खण्डों में स्थापित ये लिंग साक्षात् भगवान शिव के ही प्रतिरूप हैं, तो वे सभी असीम भक्ति-भाव से उनकी स्तुति और पूजा करने लगे। शिव की कृपा से पूरा संसार शिवमय हो गया।
महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित इस पावन आख्यान के अंत में सूत जी कहते हैं कि हे राजन्! इस प्रकार ऋषियों के शाप के कारण शिव के महालिंग का पतन हुआ, परन्तु भगवान शिव की असीम कृपा और विष्णु जी के सुदर्शन चक्र द्वारा उसी महालिंग के खण्डों से पूरी पृथ्वी पर पवित्र ‘शिवलिंगों’ की स्थापना हुई। आज भी इस भूमण्डल पर मनुष्य और देवता उन्हीं ऐश्वर्यशाली शिवलिंगों की पूर्ण श्रद्धा के साथ उपासना करते हैं।
*(यहाँ स्कन्द पुराण के मानसखण्ड के अंतर्गत ‘धरावर्णन’ नामक चतुर्थ अध्याय की यह अद्भुत कथा पूर्ण होती है।)*
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