नाग पंचमी विशेष: देवदार के अभिशप्त वनों के बीच छुपा है कौन सा रहस्य? जहाँ नागराज स्वयं करते हैं भगवान श्री हरि की पहरेदारी, जानिए डोल के अलौकिक विष्णु धाम की अनसुलझी गाथा

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स्थान: डोल (अल्मोड़ा)
देवभूमि उत्तराखण्ड के कुमाऊँ अंचल स्थित जनपद अल्मोड़ा का सुरम्य डोल क्षेत्र केवल अपनी प्राकृतिक नीरवता के लिए ही नहीं, बल्कि एक ऐसे रहस्यमयी आध्यात्मिक विस्मय के लिए जाना जाता है जो सदियों से आस्थावानों को रोमांचित करता आ रहा है। घने, गगनचुंबी देवदार के जंगलों के आंचल में स्थित भगवान विष्णु का यह पौराणिक धाम देश के गिने-चुने और अति दुर्लभ विष्णु मंदिरों में शुमार है। स्थानीय जनमानस में इसे श्री हरि विष्णु देव नागराज मंदिर के पावन नाम से जाना जाता है। यह पावन तपोभूमि जगत के पालनहार श्री हरि और पाताल के अधिपति नागराज की युगल साधना का एक अलौकिक महासंगम है।

यहाँ की सुरम्य वादियों में खड़े सदियों पुराने देवदार के वृक्ष केवल प्रकृति का श्रृंगार नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष देवत्व का स्वरूप माने जाते हैं। लोक मान्यताओं के अनुसार इन जंगलों की रक्षा का भार स्वयं नाग देवता संभालते हैं। यहाँ का एक नियम आज भी विस्मयकारी है कि कोई भी व्यक्ति इन वनों से सूखी लकड़ी तक अपने घर ले जाने का दुस्साहस नहीं करता। जनश्रुति है कि यदि कोई भूलवश भी यहाँ की लकड़ी अपने भवन में ले जाता है, तो उसके घर में विषधरों और नागों का निरंतर आवागमन शुरू हो जाता है। यही कारण है कि स्थानीय लोग इन वृक्षों को साक्षात् देवता मानकर पूजते हैं। प्राचीन दंतकथाओं में उल्लेख मिलता है कि पुरातन काल में भगवान विष्णु का नित्य अभिषेक इन्हीं देवदार वृक्षों से स्वतः निकलने वाले दिव्य दुग्ध से किया जाता था। वह चमत्कारी वृक्ष आज भी मंदिर के प्रांगण में अपनी अलौकिक उपस्थिति दर्ज कराता है।
मंदिर परिसर में वैष्णव, शैव और शाक्त परंपरा का दुर्लभ समन्वय देखने को मिलता है। श्री हरि विष्णु के साथ-साथ यहाँ देवाधिदेव महादेव का प्राचीन शिवालय और अनेक देवी-देवताओं के पवित्र थान स्थापित हैं। मंदिर की शक्ति स्थली के समीप एक अत्यंत पवित्र नौला (प्राकृतिक जलस्रोत) स्थित है, जिसकी शुचिता का नियम अत्यंत कठोर है। केवल मुख्य पुजारी ही पूर्ण पवित्रता के साथ नौले में प्रवेश कर भगवान के अभिषेक हेतु जल लाते हैं। इस तीर्थ का एक चमत्कारी पहलू यह भी है कि जब भी समूचे क्षेत्र में भीषण अनावृष्टि या सूखा पड़ता है, तो ग्रामीण इस नौले के पवित्र जल से भगवान विष्णु का सहस्त्रधारा अभिषेक करते हैं, जिसके तुरंत बाद घनघोर वर्षा होकर धरती तृप्त हो जाती है। परिसर में स्थित एक संकरी प्राकृतिक गुफा के भीतर भगवती की दिव्य प्रतिमा विराजमान है, जो साधकों के लिए गूढ़ तांत्रिक व आध्यात्मिक साधना का केंद्र रही है।

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महर्षि वेदव्यास रचित स्कंद पुराण के मानसखण्ड में इस पावन क्षेत्र का महात्म्य अत्यंत विस्तार से वर्णित है। मानसखण्ड के अनुसार, भगवान श्री हरि पद्मनाभ के चरण कमलों से जिस अमृतमयी नदी का प्राकट्य हुआ, उसे पुराणों में पर्णपत्रा कहा गया है, जो आज लोकजीवन में पनार नदी के नाम से विख्यात है। मान्यता है कि इस पावन नदी के उद्गम स्थल से एक रत्ती स्वर्ण का निरंतर प्रवाह होता था। उद्गम स्थल के समीप स्थित दिव्य सूर्य कुण्ड में यज्ञोपवीत संस्कार के उपरांत स्नान करने की सनातन परंपरा आज भी जीवित है। आगे चलकर यही पर्णपत्रा नदी प्रसिद्ध तीर्थ रामेश्वर में सरयू के साथ एकाकार होती है, जहाँ संगम तट पर विराजमान पत्रेश महादेव के दर्शन और तर्पण से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
जगतनियंता श्री हरि को डोल नाम अत्यंत प्रिय है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाने वाला डोल ग्यारस (पद्मा एकादशी) पर्व यहाँ अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है। पुराणों में वर्णित है कि डोल एकादशी और नाग पंचमी के पावन अवसर पर डोल स्थित इस धाम में दीपदान व श्री हरि-नागराज का संयुक्त अर्चन करने से मनुष्य के जीवन से कालसर्प दोष, भय, दारिद्र्य और असाध्य कष्टों का समूल नाश हो जाता है तथा उसे अक्षय यश, वैभव और शांति की प्राप्ति होती है। डोल का यह प्राचीन धाम आज भी रहस्य, तपस्या और प्रत्यक्ष ईश्वरीय अनुभूति की जीवंत धरोहर बना हुआ है।

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