नाग पंचमी विशेष: त्रिवेणी संगम में पावन डुबकी के बाद भी क्यों अधूरी मानी जाती है मुक्ति? जानिए प्रयाग के अमर रक्षक नाग वासुकी का वह रहस्यमयी देवस्थान जहाँ चमत्कारों के आगे थर्रा उठा था काल भी

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तीर्थराज प्रयाग की पुण्यभूमि पर जब कोई श्रद्धालु त्रिवेणी संगम में पावन डुबकी लगाता है, तो उसके अंतःकरण में संपूर्ण पापों से मुक्ति का भाव जाग उठता है, किंतु सनातन परंपरा की एक अत्यंत गूढ़ और रहस्यमयी मान्यता यह भी कहती है कि जब तक संगम के उत्तरी छोर पर विराजे उस दिव्य संरक्षक का आशीर्वाद न मिले, तब तक यह महायात्रा अपूर्ण ही मानी जाती है। वह अलौकिक सत्ता कोई और नहीं, बल्कि पाताल लोक के अधिपति और देवाधिदेव महादेव के परम आभूषण नागराज वासुकी हैं। प्रयागराज के ऐतिहासिक दारागंज में माँ गंगा के सुरम्य तट पर स्थित श्री नाग वासुकी मंदिर केवल एक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि युगों-युगों के रहस्यों, तपस्या और दिव्य चमत्कारों का साक्षात संगम है।
पौराणिक गाथाओं के अनुसार, जब देवों और दानवों ने अमरत्व प्राप्ति हेतु क्षीरसागर का मंथन किया था, तब सुमेरु व मंदराचल पर्वत को मथानी तथा नागराज वासुकी को मथने की रज्जु यानी रस्सी बनाया गया था। उस महामंथन की प्रचंड रगड़ और हलाहल विष की ज्वाला से जब नागराज का संपूर्ण शरीर अत्यंत तप्त और क्षत-विक्षत हो गया, तब भगवान श्रीहरि विष्णु के निर्देश पर वे अपनी तीव्र वेदना को शांत करने तीर्थराज प्रयाग पहुंचे। माँ भागीरथी की शीतल धारा में स्नान कर उन्होंने अपनी पीड़ा से मुक्ति पाई और भगवान विष्णु के अनुग्रह पर इस पुण्य नगरी के अविनाशी रक्षक बनकर यहीं विश्राम किया।
पद्म पुराण और स्कंद पुराण में नौ प्रमुख नागों का स्मरण समस्त भय और संकटों से मुक्ति प्रदाता कहा गया है, जिसमें वासुकी नाग का स्थान सर्वोपरि है—
अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम्।
शङ्खपालं धार्तराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा॥
एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्।
सायङ्काले पठेन्नित्यं प्रातःकाले विशेषतः।
तस्य दर्पभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्॥
महर्षि कश्यप और माता कद्रू के तेजस्वी पुत्र नागराज वासुकी का व्यक्तित्व त्याग और पराक्रम की अनुपम मिसाल है। इनकी धर्मपत्नी का नाम शतशीर्षा है तथा इनके प्रतापी पुत्र महर्षि आस्तीक ने ही महाराज जनमेजय के महाविनाशक सर्पयज्ञ को रोककर समस्त नाग कुल के प्राणों की रक्षा की थी। नागराज वासुकी केवल पाताल के अधिपति नहीं, अपितु भगवान नारायण के मत्स्य अवतार के समय नौका के बंधन बने थे। जब वसुदेव जी नवजात श्रीकृष्ण को कंस के कारागार से निकालकर उफनती यमुना पार करा रहे थे, तब मूसलाधार वर्षा से रक्षा करने वाले भी यही शेष-वासुकी स्वरूप थे। वहीं दूसरी ओर, महादेव शिव के कंठ का हार बनकर वे वैराग्य और भक्ति का अमर संदेश देते हैं—
नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नमः शिवाय॥
इस सिद्ध पीठ के साथ एक अत्यंत विस्मयकारी और रोंगटे खड़े कर देने वाला ऐतिहासिक चमत्कार भी जुड़ा है। जनश्रुतियों के अनुसार, जब मुगल आक्रांता औरंगजेब भारतवर्ष के पावन मंदिरों को ध्वस्त करता हुआ प्रयाग पहुँचा, तो उसने इस प्राचीन मंदिर की दिव्यता को खंडित करने के उद्देश्य से नाग देवता की प्रतिमा पर अपने भाले से प्रहार किया। उसी क्षण उस पाषाण विग्रह से दूध की ऐसी प्रचंड और दिव्य धारा फूटी, जिसने औरंगजेब को स्तब्ध कर दिया। उस दुग्ध धारा का वेग और तेज इतना विकराल था कि वह विधर्मी आक्रांता वहीं मूर्छित होकर गिर पड़ा और परास्त होकर उल्टे पाँव भागने पर विवश हो गया।
ज्योतिष और धर्म शास्त्रों में नाग वासुकी की उपासना को अमोघ माना गया है। जिन जातकों की कुंडली में कालसर्प दोष, राहु-केतु जनित बाधाएं अथवा अज्ञात भय रहता है, वे यदि महाकुंभ, नागपंचमी अथवा महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर यहाँ मत्था टेकते हैं, तो उनकी समस्त व्याधियां पल भर में भस्म हो जाती हैं। गर्भगृह में विराजित श्यामवर्ण पाषाण की पंचमुखी और चार कुंडल वाली यह अद्वितीय प्रतिमा भक्तों के सभी महापातकों का नाश कर मनोवांछित फल प्रदान करती है। मंदिर परिसर में देवाधिदेव महादेव, माता पार्वती, विघ्नहर्ता गणेश तथा गंगापुत्र भीष्म पितामह के पावन विग्रह भी सुशोभित हैं।
सुरक्षा, शक्ति, आरोग्य और आध्यात्मिक सिद्धि के लिए वासुकी गायत्री मंत्र का उच्चारण साधक के जीवन में दिव्य सुरक्षा कवच का निर्माण करता है—
ॐ सर्पराजाय विद्महे पद्म हस्ताय धीमहि।
तन्नो वासुकिः प्रचोदयात्॥
तीर्थराज प्रयाग की यह पुण्यधरा सदियों से नागराज के इस अभय वरदान से आलोकित है। नागपंचमी के इस परम पावन अवसर पर और जब भी त्रिवेणी का संकल्प लें, दारागंज के इस पावन प्रांगण में शीश नवाना न भूलें, क्योंकि यहाँ साक्षात नागराज वासुकी की कृपा से ही जीव की आध्यात्मिक यात्रा पूर्णता और मोक्ष को प्राप्त होती है।
@ रमाकान्त पन्त

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