हनुमान जी सहित नागराजों ने भी की आराधना कुमाँऊ की दिव्य त्रिपुरा सुन्दरी शक्ति पीठ की अद्भूत महिमां

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हनुमान जी सहित नागराजों ने भी की आराधना कुमाँऊ की दिव्य त्रिपुरा सुन्दरी शक्ति पीठ की अद्भूत महिमां

बेरीनाग/​श्री हनुमान जी की तपोभूमि बेरीनाग में विराजित शक्तिशिरोमणि माँ त्रिपुर सुन्दरी और भगवान मूलनारायण की महिमा

​आध्यात्मिक दृष्टिकोण से उत्तराखंड स्थित बेरीनाग (नाग भूमि) का क्षेत्र अत्यंत समृद्ध और अलौकिक है। झर-झर बहते झरने, कल-कल करती नदियाँ, हिमालय की उत्तुंग चोटियाँ और देवदार, बांज, बुरांश के मनोहारी वन इस भूमि की शोभा बढ़ाते हैं। इसी पावन देवभूमि में, राईआगर से बेरीनाग जाने वाले मार्ग पर स्थित है महान आस्था का केंद्र माँ त्रिपुर सुन्दरी (त्रिपुरा देवी) का दरबार।

​शक्तिपीठों में शिरोमणि यह दरबार सदियों से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करता आ रहा है। यह तीर्थ न केवल नाग देवताओं की परम आराध्या का स्थान है, बल्कि इसका सीधा संबंध रामायण काल और भगवान श्री विष्णु से भी है।
​जगतपालक भगवान विष्णु की चिंताहरिणी और ब्रह्मांड की जननी
​दस महाविद्याओं में से एक माता त्रिपुरा देवी के विषय में उपनिषदों में अद्भुत वर्णन मिलता है। सृष्टि के पूर्व केवल माँ त्रिपुरा ही विद्यमान थीं और उन्होंने ही इस ब्रह्मांड की रचना की।

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​सृजन की देवी: इन्हीं से ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और समस्त देवी-देवता, गंधर्व, अप्सराएं और प्राणी उत्पन्न हुए।

​भगवान विष्णु की तपस्या: मान्यता है कि जगत के पालनहार भगवान विष्णु ने दस हजार वर्षों तक माँ की आराधना की और वरदान स्वरूप उनसे यह सुंदर रूप प्राप्त किया। इसीलिए माँ को ‘विष्णु चिंताहरिणी’ भी कहा जाता है।

​श्री यंत्र और सिद्धियां: यहाँ माँ के श्री चक्र (श्री यंत्र) की पूजा होती है। श्याम वर्ण में ‘काली’ और गौर वर्ण में ‘राज राजेश्वरी’ कहलाने वाली यह देवी सौंदर्य, स्वास्थ्य और ऐश्वर्य प्रदान करती हैं। विश्व रक्षा हेतु इन्होंने ही माँ पीताम्बरी (बगलामुखी) का रूप धारण किया था।

​श्री हनुमान जी की तपस्या और सुग्रीव का उद्धार

​स्कंद पुराण के मानस खंड के ८४वें अध्याय (नारायणी महात्म्य) में इस पवित्र भूमि का एक अत्यंत रोचक और महत्वपूर्ण प्रसंग मिलता है।

​हनुमान जी और बाली की तपोभूमि:

पुराणों के अनुसार, इन्हीं नाग पर्वतों में वानरराज बाली और श्री हनुमान जी ने कठोर तपस्या की थी।
​सुग्रीव को राज्य प्राप्ति: महादेव-प्रिया माँ मूलनारायणी (त्रिपुरा देवी) की आराधना और कृपा से ही सुग्रीव को प्रभु श्री राम का सानिध्य प्राप्त हुआ और वे बाली के अधिकार से अपना राज्य वापस पाने में सफल हुए।

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​भगवान मूलनारायण और नागकुल की परम आराध्या

​बेरीनाग क्षेत्र नाग मंदिरों की श्रृंखला के लिए विख्यात है। नाग पर्वतों में नाग प्रमुख के रूप में पूजे जाने वाले ‘भगवान मूलनारायण’ ने इसी स्थान पर महावैभव प्राप्त किया था।
​पूर्व जन्म के तप के प्रताप से उन्होंने भगवान विष्णु की अचल भक्ति की। प्रसन्न होकर श्री हरि ने उन्हें दर्शन दिए, अजर-अमर देह का वरदान दिया और अपना सर्वपापहारी ‘नारायण’ नाम प्रदान किया।
​भगवान विष्णु की ही प्रेरणा से मूलनारायण जी ने माँ त्रिपुर सुन्दरी की कठोर तपस्या की।
​प्रसन्न होकर माँ त्रिपुरा ने उन्हें दर्शन दिए और एक अत्यंत विशाल (दस योजन लंबी और बारह योजन चौड़ी) व दिव्य गुफा तथा अपनी शेषनाग सेवित नगरी के दर्शन कराए।
​यहीं मूलनारायण जी ने समस्त नागकुल के साथ माँ भगवती का पूजन किया, जिसके बाद यह क्षेत्र ‘मूलनारायणी’ नाम से भी प्रसिद्ध हुआ।
​महर्षि वेदव्यास जी ने स्कंद पुराण में लिखा है:
“सर्वे नागा महात्मानों देवीं त्रिभुवनेश्वरीम”
(अर्थात, नाग पर्वत पर विराजमान सभी नागगण माता त्रिपुर सुन्दरी की उपासना कर स्वयं को धन्य करते हैं।)
​क्षेत्रीय आस्था और पूजा विधान
​जनपद पिथोरागढ़ के राईआगर और बेरीनाग के बीच स्थित यह शक्तिपीठ साधना की दृष्टि से सर्वोत्तम माना जाता है:
​कुण्डलिनी जागरण: यहाँ देवी की साधना से साधक की कुण्डलिनी शक्ति जागृत होती है। यहाँ माँ के साथ ‘बाला त्रिपुर सुन्दरी’ की भी पूजा की जाती है।
​शुभ कार्यों का श्रीगणेश: स्थानीय लोग किसी भी नए कार्य का शुभारंभ माँ महामाया त्रिपुर सुन्दरी का स्मरण करके ही करते हैं।
​नवरात्रि महोत्सव: नवरात्रि के पावन अवसर पर यहाँ भक्तों का भारी तांता लगा रहता है।
​क्षेत्रपाल बाण देवता: मंदिर परिसर में क्षेत्रपाल के रूप में ‘बाण देवता’ की पूजा की जाती है, जिन्हें विशेष रूप से खिचड़ी का भोग लगाया जाता है।
​”पूज्य याति परां सिद्वि मानवो मुनिसत्तमाः”
माँ त्रिपुरा देवी की अलौकिक आभा और पूजन से भक्तों को अभीष्ट सिद्धियों की प्राप्ति सहज ही हो जाती है।
​(मूल आलेख: रमाकांत पन्त)