श्रीमद् देवी भागवत कथा के नौवें दिन बही भक्ति की बयार, गंगा अवतरण व शंखचूर्ण वध की कथा सुन भाव-विभोर हुए श्रद्धालु

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​बिन्दुखत्ता/इन्द्रानगर हाटाग्राम: बिन्दुखत्ता के इन्द्रानगर हाटाग्राम क्षेत्र में वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता श्री गोविन्द भट्ट जी के आवास पर आयोजित संगीतमय ‘श्रीमद् देवी भागवत नवाह ज्ञान यज्ञ’ के नौवें दिन भक्ति और श्रद्धा का अद्भुत संगम देखने को मिला। आयोजन के नवम दिवस पर सुप्रसिद्ध कथावाचक डॉ. नवीन चन्द्र जोशी ने अपनी ओजस्वी और मधुर वाणी से देवी के विभिन्न पावन चरित्रों का अत्यंत सुंदर और मार्मिक वर्णन किया, जिसे सुनकर उपस्थित विशाल श्रद्धालु समुदाय भाव-विभोर हो उठा।

नौवें दिन की कथा के दौरान मुख्य रूप से ‘गंगा अवतरण’ और ‘शंखचूर्ण (शंखचूड़) वध’ के प्रसंगों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। कथा पंडाल माता के जयकारों से गुंजायमान रहा और श्रद्धालुओं ने कथा के साथ-साथ भजनों का भी भरपूर आनंद लिया।
​नौवें दिन की कथा में वर्णित देवी का पावन और अलौकिक चरित्र
​कथावाचक डॉ. नवीन चन्द्र जोशी ने नौवें दिन देवी के जिस स्वरूप और चरित्र का वर्णन किया, वह करुणा, वात्सल्य और दुष्ट-संहार के अद्भुत संतुलन को दर्शाता है। कथा के आधार पर देवी के पावन चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार रहीं:
करुणा और मोक्ष की प्रदायिनी (गंगा अवतरण के संदर्भ में)
देवी केवल अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली शक्ति ही नहीं हैं, बल्कि वे जल स्वरूप में साक्षात करुणा की बहती हुई धारा हैं। गंगा अवतरण की कथा के माध्यम से व्यासपीठ ने बताया कि कैसे माता पृथ्वी के जीवों के उद्धार और सगर के साठ हजार पुत्रों को मोक्ष प्रदान करने के लिए स्वर्ग से धरातल पर अवतरित हुईं। देवी का यह चरित्र दर्शाता है कि परम सत्ता अपने भक्तों के कल्याण और उनके पापों को धोने के लिए किसी भी सीमा तक जाकर अपनी करुणा बरसाती है। उनका यह रूप शीतलता, पवित्रता और नवजीवन का प्रतीक है।
धर्म की रक्षक और अहंकार की संहारक (शंखचूर्ण वध के संदर्भ में)
जब संसार में अत्याचार और अभिमान अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है, तब देवी दुष्टों का संहार करने के लिए अपनी शक्ति का प्रहार करती हैं। शंखचूर्ण (जो पूर्व जन्म में श्रीकृष्ण का सखा सुदामा था और श्रापवश दानव बना) अत्यंत बलशाली और अजेय हो गया था। उसके अहंकार ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया था। देवी का चरित्र यहाँ यह संदेश देता है कि जब किसी शक्ति या वरदान का दुरुपयोग होने लगता है, तो आदिशक्ति भगवान शिव और अन्य देवताओं के माध्यम से उस अधर्म का अंत सुनिश्चित करती हैं। वे ब्रह्मांड के संतुलन को बनाए रखने वाली सर्वोच्च नियंत्रक हैं।
मातृभाव और रौद्र रूप का अद्भुत समन्वय
कथा में यह स्पष्ट किया गया कि भगवती का हृदय अपनी संतानों (भक्तों) के लिए अत्यंत कोमल है, लेकिन जब बात सृष्टि की रक्षा की आती है, तो वे पापियों का विनाश करने में तनिक भी संकोच नहीं करतीं। वे एक ही समय में जन्मदात्री भी हैं और संहारकर्ता भी।
​भक्तिमय रहा आयोजन का वातावरण
​कथा के दौरान डॉ. जोशी ने श्रोताओं को बताया कि श्रीमद् देवी भागवत कथा श्रवण मात्र से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं और जीवन में सुख-शांति का वास होता है। शंखचूर्ण के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने समाज को यह संदेश भी दिया कि मनुष्य को कभी भी अपनी शक्ति, धन या पद का अहंकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि अहंकार का नाश अंततः ईश्वर के हाथों ही होता है।
​कथा के समापन पर मुख्य यजमान श्री गोविन्द भट्ट जी के परिवार द्वारा महाआरती की गई। तदुपरांत प्रसाद वितरण का आयोजन हुआ, जिसमें क्षेत्र के गणमान्य नागरिकों सहित भारी संख्या में मातृशक्ति और श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण कर माता रानी का आशीर्वाद प्राप्त किया।

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