दक्षिण का रामेश्वर सब जानते हैं, पर देवभूमि पिथौरागढ़ के इस ‘गुप्त रामेश्वर’ का रहस्य क्या है? जहाँ साक्षात कालरात्रि सी ब्रह्महत्या से थरथराते राजा को मिला मोक्ष और भगवान श्रीराम ने खोला था सदेह वैकुण्ठ का गुप्त द्वार!

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दक्षिण का रामेश्वर सब जानते हैं, पर देवभूमि पिथौरागढ़ के इस ‘गुप्त रामेश्वर’ का रहस्य क्या है? जहाँ साक्षात कालरात्रि सी ब्रह्महत्या से थरथराते राजा को मिला मोक्ष और भगवान श्रीराम ने खोला था सदेह वैकुण्ठ का गुप्त द्वार!

संसार भर में समुद्र तट पर अवस्थित तमिलनाडु के रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग की ख्याति है, किन्तु अधिकांश लोग इस विस्मयकारी पौराणिक सत्य से आज भी अनभिज्ञ हैं कि देवाधिदेव महादेव का एक अत्यंत गोपनीय और चमत्कारी ‘महा-रामेश्वर’ तीर्थ हिमालय की उपत्यकाओं में स्थित है। महाभारत युद्ध के उपरांत जब शरशय्या पर लेटे पितामह भीष्म ने देवर्षि नारद से जिज्ञासा प्रकट की कि भूतल पर वह कौन सा अद्वितीय क्षेत्र और देव हैं, जिनकी आराधना मात्र से प्राणी समस्त तीर्थों में भ्रमण किए बिना ही भवबंधन से मुक्त हो जाता है, तब नारद जी ने स्कन्दपुराण के मानसखण्ड (अध्याय 95) में निहित इस गूढ़ आख्यान को उद्घाटित किया:

किमेकं भूतले क्षेत्रं किं वाप्येकं शुभप्रदम्। किमेकं दैवतं ध्येयं पूज्य प्रापुर्नराः शुभम्॥

देवर्षि नारद ने बताया कि प्राचीन काल में ब्रह्म-सभा के भीतर महर्षि गौतम ने स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी से यही प्रश्न पूछा था कि घोर दुराचारियों को भी सहज मुक्ति प्रदान करने वाला वह परम क्षेत्र कौन सा है! तब ब्रह्मा जी ने स्पष्ट किया कि कूर्माचल (उत्तराखण्ड) की वादियों में स्थित ‘रामेश्वर तीर्थ’ की महिमा काशी से दस गुना और सेतुबन्ध रामेश्वर से सौ गुना अधिक फलदायी है:

तस्माद्दशगुणं पुण्यं पूज्य रामेश्वरं स्मृतम्। वैद्यनाथाच्छतगुणं सेतुबन्धात्तथैव च॥ प्राप्यते मुनिशार्दूल पूज्य रामेश्वरं हरम्॥

यह वह परम गोपनीय तपोभूमि है, जहाँ भगवान विष्णु के चरणों से उद्भूत मानसरोवर से प्रवाहित पुण्यतोया सरयू और भगवान परशुराम के तप से अवतरित पूर्वी रामगंगा का पावन संगम होता है। त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने अयोध्या का परित्याग करने के उपरांत इसी संगम पर अपने पूर्वजों के उद्धार हेतु अलौकिक शिवलिंग की प्रतिष्ठा की थी और यहीं से वे सशरीर वैकुण्ठ धाम पधारे थे:

सत्यागमनमाकाङ्क्ष्य यत्र सम्पूज्य शङ्करम्। स्वेनैव वपुषा पुत्र ययौ वैकुण्ठमन्दिरम्॥ लिङ्गं संस्थाप्य देवस्य स्वनाम्ना च कृतं शुभम्॥

पिथौरागढ़ का पावन रामेश्वर: तीन जनपदों की चौखट पर बसा त्रिवेणी तीर्थ

पौराणिक काल का यह गूढ़ क्षेत्र आधुनिक भूगोल में उत्तराखण्ड के सीमान्त जनपद पिथौरागढ़ में विद्यमान है। पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर, हरी-भरी सुरम्य पर्वतीय घाटियों के बीच सरयू और पूर्वी रामगंगा नदियों के इस पवित्र संगम को स्थानीय जनमानस ‘पनार संगम क्षेत्र’ के नाम से भी जानता है।

भौगोलिक बनावट की दृष्टि से यह धाम अत्यंत विलक्षण है, क्योंकि यह पिथौरागढ़, चम्पावत और अल्मोड़ा—इन तीनों पर्वतीय जनपदों की सीमाओं के मिलन-बिन्दु पर अवस्थित है। यहाँ भगवान शिव और भगवान श्रीराम के अति प्राचीन देवालय स्थापित हैं। लोकमान्यताओं और पौराणिक आख्यानों के अनुसार, प्रभु श्रीराम ने इस दिव्य शिवलिंग की स्थापना करने के साथ ही इसी पावन भूमि पर अपने पूज्य गुरुओं के सान्निध्य में उच्च अस्त्र-शस्त्र एवं धनुर्विद्या की गूढ़ शिक्षा प्राप्त की थी।

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स्कन्दपुराण के मानसखण्ड में स्पष्ट वर्णन है कि इस पवित्र संगम में एक बार डुबकी लगाने का पुण्य हरिद्वार में गंगा स्नान के समतुल्य प्राप्त होता है। यह क्षेत्र पितृ-तर्पण, पिंडदान और यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कारों के लिए समूचे उत्तराखण्ड में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा के महापर्व पर यहाँ आयोजित होने वाला सुप्रसिद्ध ‘माघ मेला’ इस पौराणिक भूमि की सनातन आस्था और समृद्ध लोकसंस्कृति का साक्षात प्रमाण है। यहाँ की महिमा का बखान करते हुए स्वयं ब्रह्मा जी ने कहा था कि बिना किसी कठिन तप, यज्ञ या दान के ही यह तीर्थ मनुष्य को महामुक्ति प्रदान कर देता है:

विना दानैर्विना पुण्यैर्विना तीर्थैस्तपोऽध्वरैः। यत्र याति महामुक्तिः पूज्य रामेश्वरं हरम्॥

जब पाप की छाया बनी विकराल कालरात्रि: राजा वेदसह का रोंगटे खड़े करने वाला सच

इस महातीर्थ की मुक्तिदायिनी शक्ति के पीछे उज्जयिनी के नहुषवंशी राजा वेदसह का एक भयानक आख्यान जुड़ा हुआ है। आखेट, विलासिता और परस्त्री-आसक्ति में डूबे राजा वेदसह ने ब्राह्मणों की आजीविका छीन ली थी। जब एक विद्वान ब्राह्मण ने अपनी पत्नी सहित राजा को उसके अधर्म का शाप दिया, तो क्रोधांध राजा ने उन दोनों का नृशंस वध कर दिया।

इस घोर पापकर्म के प्रभाव से राजा का सातों अंगों वाला वैभवशाली राज्य नष्ट-भ्रष्ट हो गया, शत्रुओं ने आक्रमण कर उसके पुत्रों, पत्नियों और अमात्यों को मौत के घाट उतार दिया और राजा दाने-दाने को मोहताज होकर घने जंगलों में भटकने लगा।

किन्तु राजा की असली दुर्गति तब प्रारंभ हुई, जब उस जघन्य ब्रह्महत्या ने साक्षात कालरात्रि जैसी विकराल काली छाया का रूप धारण कर लिया। राजा जिस भी पर्वत, गुफा या घने जंगल में जाता, वह भयानक ब्रह्महत्या परछाईं बनकर उसके पीछे दौड़ती दिखाई देती थी:

स हत्यां पृष्ठतो यान्तीं घोरां ब्रह्मवधोद्भवाम्। ददर्श मुनिशार्दूलाः कालरात्रिमिवापराम्॥

राजा ने अपनी बुद्धि को शुद्ध कर संसार के समस्त प्रसिद्ध तीर्थों, सरोवरों और नदियों में स्नान किया, किन्तु उस कालरात्रि रूपी ब्रह्महत्या ने उसका पीछा नहीं छोड़ा और राजा के अशांत मन को कहीं शांति नहीं मिली।

तपस्वी विप्र का साक्षात्कार: एक अनपढ़ वृद्धा और दिव्य पुष्पक विमान का कौतुक

भय और पश्चाताप की ज्वाला में जलता हुआ राजा वेदसह भटकते-भटकते हिमालय के हिममंडित शिखरों पर पहुँचा, जहाँ उसने एक परम तेजस्वी ब्राह्मण को तपस्यारत देखा। राजा ने अश्रुपूरित नेत्रों से उस तपस्वी के चरणों में गिरकर अपने समस्त पाप कह सुनाए और मुक्ति की भिक्षा मांगी। तब उस दयालु विप्र ने राजा को ढांढस बंधाते हुए पिथौरागढ़ स्थित रामेश्वर संगम जाने का मार्ग दिखाया:

व्रज रामेश्वरं सौम्य रुद्रकन्यानिषेवितम्। तत्र ते पातकाः सर्वे विलीयन्ते न संशयः॥

राजा के पूछने पर कि उस तीर्थ में ऐसा क्या अलौकिक रहस्य है, तपस्वी ब्राह्मण ने अपनी आँखों देखा एक सत्य वृत्तांत सुनाया। ब्राह्मण ने बताया कि जब भगवान श्रीराम इस धराधाम से वैकुण्ठ पधारे, तो अयोध्या की प्रजा उनके पीछे-पीछे इसी सरयू-रामगंगा संगम पर आई थी। उस समय चतुर्दशी के दिन एक अत्यंत दीन-हीन, वृद्ध ब्राह्मणी वहाँ आई, जो पूजा-पाठ के विधि-विधानों और आचार-लक्षणों से सर्वथा अनभिज्ञ थी। वह मंदिर के भीतर प्रवेश भी न कर सकी, किन्तु संगम तट पर बैठकर उसने केवल शांत मन से भगवान शंकर का स्मरण किया और अपने प्राण त्याग दिए।

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उसी क्षण आकाश से दिव्य विमान उतरा और शिवगण उस आचारहीन वृद्धा को ससम्मान विमान में बैठाकर सीधे शिवलोक ले गए:

स्मरन्ती शङ्करं शान्तं पञ्चत्वमगमत् ततः। मृता शिवपुरं नीता विमानमधिरोप्य वै॥ आचारलक्षणैर्हीना प्राप शिवपुरं महत्। भक्त्या ये शंकरं शान्तं रामेण स्थापितं शुभम्॥

कूर्माचल के गुप्त उपतीर्थों की परिक्रमा: जहाँ एक तर्पण से तर जाते हैं 101 कुल

स्कन्दपुराण के मानसखण्ड में रामेश्वर क्षेत्र को केवल एक देवालय नहीं, अपितु अनेक पावन उपतीर्थों की एक सुव्यवस्थित दिव्य शृंखला बताया गया है:

  • प्रवेश द्वार (पनार संगम): कूर्माचल (काली-कुमाऊँ) में भगवान विष्णु के चरणों से उद्भूत ‘पर्णपत्रा’ (वर्तमान पनार नदी) जहाँ सरयू से मिलती है, वहीं ‘पत्रेश महादेव’ और ‘सुपत्रा देवी’ के अर्चन से इस महाक्षेत्र में प्रवेश का विधान है:

    पर्णपत्रेति विख्याता नदी कूर्माचलोद्भवा। पद्मनाभपदोद्भूता सरयूसंगमं गता॥ प्रवेशस्तत्र विज्ञेयः क्षेत्रे रामेश्वराह्वये॥

  • शेषांग एवं वाराहतीर्थ: इसके ऊपर वाराहतीर्थ है, जहाँ स्नान से उत्तम गति मिलती है। तत्पश्चात शेषा नदी के संगम पर स्थित ‘चन्द्रशेषा’ तीर्थ आता है, जहाँ स्नान करने वाला व्यक्ति चन्द्रलोक को प्राप्त होता है।
  • कुशावर्त, बालीतीर्थ एवं बौद्धतीर्थ: इसके ऊपर ‘कुशावर्त’ तीर्थ है, जहाँ कुशा से पितरों का श्राद्ध करने पर देवलोक की प्राप्ति होती है। इसके ऊपर बालीतीर्थ में ‘जलबालीश्वर’ महादेव का वास है। नदी पार करने पर ‘बौद्धतीर्थ’ आता है, जहाँ डुबकी लगाने से साक्षात विष्णुलोक मिलता है।
  • शैल पर्वत एवं गुप्त सरस्वती: आगे ‘शैल’ पर्वत से निकलने वाली ‘गुप्त सरस्वती’ का सरयू में पावन मिलन होता है, जहाँ ‘शाङ्करी’ देवी की आराधना से महेन्द्रभवन प्राप्त होता है। सरयू और रामगंगा के मध्य स्थित शैल-स्थल पर शैलजा देवी और भैरवेश महादेव विराजमान हैं।
  • भागीरथी, दण्डतीर्थ एवं ब्रह्मतीर्थ (101 कुलों का उद्धार): भागीरथी संगम में स्नान से शिवलोक तथा दण्डतीर्थ से देवसदन की प्राप्ति होती है। इसके पश्चात परम पावन ‘ब्रह्मतीर्थ’ आता है, जहाँ पिंडदान करने से पितरों की 101 पीढ़ियों का एक साथ उद्धार हो जाता है:

    ब्रह्मतीर्थाख्यं तीर्थमस्ति सुशोभनम्। पिण्डदानेन मनुजः कुलमेकोत्तरं शतम्। सन्तर्प्य नृपशार्दूल प्रयाति परमां गतिम्॥

  • रामतीर्थ, जामदग्न्य एवं क्षेत्रपाल: इसके उपरांत सर्वपापनाशक ‘रामतीर्थ’ और ‘जामदग्न्यतीर्थ’ में स्नान कर क्षेत्रपाल का पूजन करते हुए रामेश्वर महादेव के सम्मुख पहुँचा जाता है।
  • निर्गमन मार्ग (रामगंगा के उपतीर्थ): यात्रा की पूर्णता हेतु रामगंगा के जल में स्थित ‘रुद्रतीर्थ’ में स्नान किया जाता है। इसके दाहिने किनारे ‘बहुलेश्वर’, रामगंगा में ‘नन्दिकेश सर’ तथा गुप्तकौशिकी के संगम पर ‘सूर्यतीर्थ’ स्थित है। फिर रामगंगा के पार यक्षतीर्थ, विश्वकर्मातीर्थ और असुर पर्वत से निकलने वाली यक्षवती नदी के सरयू संगम पर स्थित ‘पाताल-शिला’ की पूजा के साथ यह परिक्रमा संपन्न होती है।
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शनि-प्रदोष का दुर्लभ महायोग और रघुवीर द्वारा निवेदित महास्तुति

तपस्वी विप्र ने राजा वेदसह को निर्देश दिया कि वह शनिवार के दिन पड़ने वाली कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी (शनि-प्रदोष) के दुर्लभ अवसर पर रामेश्वर महादेव का अभिषेक करे, क्योंकि इस दिन की गई पूजा समस्त पातकों का तत्काल विनाश कर देती है:

मन्दवारप्रदोषादिदुर्लभमस्तत्र मण्डले। रामेश्वरस्य देवस्य पूजनं मन्दसंज्ञके। सुदुर्लभतरं तत्र प्रदोषः सत्यमेव हि॥

द्वादशाक्षरी विद्या से प्रभु का आवाहन कर, षडंग रुद्राष्टाध्यायी से अभिषेक और पंचामृत स्नान कराने के उपरांत छत्तीस अक्षरों के गोपनीय मंत्र से गंध-पुष्प अर्पित कर भगवान श्रीराम द्वारा रचित इस स्तुति का पाठ करने का विधान बताया गया:

नमो नमस्कारणकारणाय रघुपवीरेण निवेदिताय। हराय देवाय वृषध्वजाय रामेश्वरायाखिललोकसाक्षिणे॥ भस्माङ्गरागाय कलाधराय जटाधरायाखिलपावनाय। महिम्नपूर्णाय महाप्रभाय देवीकलत्राय नमो नमस्ते॥

अभिशाप का महा-अंत: अप्सराओं की वंदना और अमर शिवलोक की प्राप्ति

तपस्वी के वचनों को शिरोधार्य कर राजा वेदसह का मुखमंडल खिल उठा। वह तत्काल सरयू और पूर्वी रामगंगा के पावन संगम स्थल पर पहुँचा। उसने विधि-विधान से संगम में स्नान किया, उपतीर्थों में पितरों का तर्पण किया और रामेश्वर लिंग का षोडशोपचार पूजन संपन्न किया।

पूजा की पूर्णाहुति होते ही वर्षों से कालरात्रि बनकर पीछे लगी ब्रह्महत्या की वह भयानक काली छाया सदा के लिए भस्म हो गई। देवलोक से पुष्पवृष्टि हुई और राजा वेदसह अप्सराओं द्वारा स्तुति प्राप्त करते हुए सदेह दिव्य शिवलोक को प्रस्थान कर गया:

इति तद्द्विजवचनमाकर्ण्य क्षितिपतिर्विकसितवदनो जगाम क्षेत्रमुद्ध्यम्। मदनमथनमौलिं प्रपूज्य विधिवत् शिवपदमवाप स्तूयमानोऽप्सरोभिः॥

देवर्षि नारद ने पितामह भीष्म को बताया कि इस अद्भुत आख्यान को सुनकर महर्षि गौतम को भी यह अटूट विश्वास हो गया था कि मनुष्य-लोक में यदि बिना किसी हठयोग के मात्र शिव-कृपा से मुक्ति का कोई साक्षात द्वार है, तो वह उत्तराखण्ड के पिथौरागढ़ में स्थित यही पावन रामेश्वर धाम है। हिमालय की गोद में कल-कल बहती सरयू और रामगंगा आज भी अपने गर्भ में त्रेतायुग के इन पावन रहस्यों और मुक्ति के अमर विश्वास को संजोए अविरल प्रवाहित हो रही हैं।

@ रमाकान्त पन्त @

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