शिवालय के गुप्त द्वार: पुराणों में वर्णित धरा के रहस्यमयी खण्ड और उनका अलौकिक सत्य
सृष्टि के रहस्यों को जानने की जिज्ञासा सदैव से मानव मन में रही है। इसी क्रम में, जब राजा जनमेजय ने महर्षियों से पृथ्वी के विस्तृत चरित्र और उसके खण्डों के विषय में पूछा, तो एक अत्यंत रहस्यमय और अलौकिक ज्ञान संसार के सामने आया। मुनियों के अनुसार, इस पृथ्वी पर ऐसे विशेष क्षेत्र हैं जहाँ देवाधिदेव शिव साक्षात विराजमान हैं। इस पावन भूगोल की शुरुआत पृथ्वी के प्रमुख पर्वत हिमालय से होती है, जिसे भगवान शिव का मस्तक माना गया है और जो सुन्दर पुष्पों के समान शुभ्र हिम-कणों से सुशोभित है। यह वही पवित्र स्थल है जहाँ दक्ष पुत्री माता पार्वती ने अवतार लिया और शिव के साथ उनका विवाह संपन्न हुआ। मुनियों ने इस हिमालय को चार भागों में विभक्त किया है, जहाँ से इस रहस्यमयी श्रृंखला की शुरुआत होती है।
महर्षि व्यास द्वारा क्रमानुसार जिन आठ रहस्यमयी खण्डों का वर्णन किया गया है, वे इस प्रकार हैं:
१. मानस खण्ड
२. कैलास खण्ड
३. केदार खण्ड
४. पाताल खण्ड
५. काशी खण्ड
६. रेवा खण्ड
७. ब्रह्मोत्तर खण्ड
८. नागर खण्ड
व्यास देव द्वारा वर्णित इस दिव्य श्रृंखला का पहला पड़ाव मानस खण्ड है। स्वयं ब्रह्मा द्वारा निर्मित यह खण्ड शिवलिंगों से परिपूर्ण है। इसके अंतर्गत आने वाला मानसरोवर अनेक तीर्थों से युक्त है, जिसका स्मरण, दर्शन तथा ध्यान करने मात्र से सभी प्राणी पापरहित हो जाते हैं। इसकी महिमा इतनी गहन है कि यहाँ प्राण त्यागने वाले श्वान यानी कुत्ते आदि जीव भी सीधे परमधाम वैकुण्ठ लोक को प्राप्त करते हैं।
मानस खण्ड के ठीक बाद कैलाश खण्ड का रहस्य खुलता है। यह वह सुरम्य और अलौकिक स्थान है जो नन्दी, स्कन्द और रिरि आदि शिव-गणों द्वारा पूजित है। रुद्रकन्याओं से घिरे इस खण्ड में ऐसी दिव्य ऊर्जा व्याप्त है कि यहाँ तपस्या करने वाले मुनि साक्षात मृत्यु अर्थात यम पर भी विजय प्राप्त कर लेते हैं।
इसके अनन्तर विस्तृत और लोक-पूजित केदार खण्ड का विस्तार आता है। यहाँ देवाधिदेव महादेव केदार नाम से साक्षात विराजमान हैं और निरंतर माता पार्वती द्वारा सेवित हैं। इस खण्ड का महात्म्य ऐसा है कि इसके दर्शन मात्र से पाण्डवों ने अपने कुल, गुरु और सगे-संबंधियों के वध से उत्पन्न हुए घोर महापाप से सदा के लिए मुक्ति पाई थी।
धरती के ऊपर के इन खण्डों के बाद नीचे की ओर पाताल खण्ड का गुप्त रहस्य प्रकट होता है। यह खण्ड श्रेष्ठ नागों और नागकन्याओं द्वारा सुसेवित है तथा अत्यंत आश्चर्यकारी शिवलिंगों से युक्त है, जो पाताल की गहराइयों में शिव तत्व को स्थापित करते हैं।
तदनन्तर ब्रह्मांड के सबसे पवित्र केंद्रों में से एक, काशी खण्ड का वर्णन आता है। यहाँ स्वयं विश्वेश्वर महादेव का ज्योतिर्मय लिंग विराजमान है। इस स्थान का प्रताप इतना अद्वितीय है कि यहाँ प्राण त्यागने वाले सामान्य कीड़े-मकोड़े और पक्षी भी सीधे शिवलोक की परम यात्रा पर निकल जाते हैं।
इसके बाद रेवा खण्ड अपनी अलौकिक छटा बिखेरता है, जो नर्मदा नदी की विभिन्न धाराओं से सम्पृक्त होकर अत्यंत सुंदर प्रतीत होता है। इस खण्ड का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि यहाँ का हर एक पाषाण यानी पत्थर स्वयं शिव-लिंग का स्वरूप है, जिन्हें देवतागण नार्मदेश्वर के नाम से पूजते हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड में किसी दूसरे स्थान की शिला इनके समान पूजनीय नहीं मानी गई।
रेवा खण्ड के आगे यह यात्रा शुभ ब्रह्मोत्तर खण्ड में प्रवेश करती है। यह वह पावन क्षेत्र है जहाँ गोकर्णेश की दिव्य कथाओं, शिवलिंगों की स्थापना के विधान और अनन्य शिवभक्तों के महात्म्य का विस्तार से प्रतिपादन किया गया है।
इस रहस्यमयी यात्रा के अंत में नागर खण्ड आता है, जिसकी उपासना करने वाले सभी साधक अंततः शिव-लोक को प्राप्त करते हैं। इसी खण्ड के अंतर्गत उज्जयिनी नगरी की अलौकिक महिमा, अनेक शिवलिंगों का दिव्य आख्यान और आकाशीय पिण्डों के रहस्यों का विस्तार से वर्णन मिलता है।
यद्यपि कथा की शुरुआत में ऋषियों ने पृथ्वी के नौ खण्डों के विषय में प्रश्न किया था, परंतु इस विशेष आख्यान की समाप्ति तक मुख्य कथा में इन्हीं आठ खण्डों का क्रमानुसार अद्भुत नाम-निर्देश मिलता है, जो जीव को सीधे मोक्ष की ओर ले जाते हैं।
यदि हम व्यापक पौराणिक दृष्टिकोण से देखें, तो इस विशिष्ट वर्णन के साथ-साथ प्रचलित स्कन्दपुराण के वृहद स्वरूप में समूची पृथ्वी और उसके आध्यात्मिक विस्तार को सात मुख्य खण्डों में विभाजित किया गया है। इसके अनुसार ये सात महाखण्ड क्रमशः इस प्रकार हैं: १. माहेश्वर खण्ड, २. वैष्णव खण्ड, ३. काशी खण्ड, ४. ब्राह्म खण्ड, ५. अवन्ती खण्ड, ६. नागर खण्ड और ७. प्रभास खण्ड।
चाहे हम इन सात महाखण्डों की बात करें या व्यास देव द्वारा बताए गए शिवलिंगों से युक्त उन आठ रहस्यमयी खण्डों की, यह अलौकिक आख्यान मानव मात्र के लिए परम कल्याणकारी है। जो भी व्यक्ति इस दिव्य ज्ञान को पूरी सावधानी, श्रद्धा और एकाग्रता के साथ सुनता या समझता है, वह दिव्य विमान में आरूढ़ होकर, समस्त बंधनों से मुक्त होता हुआ अपने इक्कीस कुलों का उद्धार कर देता है और चिरकाल तक देवाधिदेव के परमधाम शिवलोक में आनंदपूर्वक निवास करता है।
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