शिवपुरी /
दीक्षित परिवार द्वारा हल्दूचौड़ के शिवपुरी के ऐतिहासिक नागेश्वर मन्दिर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा महापुराण ज्ञानयज्ञ के पांचवें दिन एक अभूतपूर्व आध्यात्मिक प्रवाह देखने को मिला। नैमिषारण्य की सिद्ध तपोभूमि से पधारे प्रख्यात कथाव्यास पंडित प्रभात त्रिपाठी के मुखारविन्द से प्रवाहित हो रही कथा के पांचवें दिन के वाचन से पूर्व, एक विशेष और महत्वपूर्ण आध्यात्मिक वार्ता आयोजित हुई इस विशेष बातचीत में नैमिषारण्य की महिमा और श्रीमद् भागवत के उन रहस्यों पर गहराई से चर्चा की गई, जो आम तौर पर जनमानस के सामने कौतूहल और गहन जिज्ञासा का विषय बने रहते हैं।
वार्ता के दौरान जब अध्यात्म और कलयुग के प्रभावों को लेकर प्रश्न किया गया, तो उन्होंने कहा कि नैमिषारण्य की भूमि को समस्त तीर्थों में शिरोमणि इसलिए माना जाता है क्योंकि वह सनातन धर्म की चेतना और तपस्या का मूल महाकेंद्र है। उन्होंने विस्तार से समझाते हुए कहा कि जब द्वापर युग का अंत हो रहा था और कलयुग का आगमन निश्चित था, तब संसार को इस युग के भीषण पापों और अंधकार से बचाने के लिए शौनकादि अठासी हजार ऋषि-मुनि अत्यंत चिंतित थे। ऋषियों की इस घोर व्याकुलता को दूर करने के लिए स्वयं परमपिता ब्रह्मा ने अपने मनोमय चक्र को प्रवाहित किया था और कहा था कि इस चक्र की नेमि जहां शांत होगी, वही भूमि तपस्या के लिए सर्वश्रेष्ठ होगी। वह चक्र जिस पावन वन में जाकर रुका, वही आज का सिद्ध क्षेत्र नैमिषारण्य है।
उन्होंने कहा कि नैमिषारण्य केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं बल्कि कलयुग के दुष्प्रभावों को रोकने का एक जागृत महाकेंद्र है। इसी परम पवित्र भूमि पर पूज्य सूत जी महाराज ने व्यासपीठ पर आसीन होकर शौनकादि अठासी हजार ऋषियों को पहली बार श्रीमद् भागवत महापुराण की अमर कथा श्रवण कराई थी। सूत जी ने ऋषियों के सामने यह स्पष्ट घोषणा की थी कि जब कलयुग में मनुष्य भौतिकता की अंधी दौड़ में भटककर हर तरफ से निराश और अशांत हो जाएगा, तब श्रीमद् भागवत ही साक्षात भगवान श्रीकृष्ण के वांग्मय स्वरूप में प्रकट होकर जीवों को मोक्ष का मार्ग दिखाएगी।
कथा के विस्तार पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि भागवत का पांचवां दिन जीव के अहंकार को नष्ट कर भगवान की शरणागति को प्राप्त करने का दिन है। जब मनुष्य संसार के सारे झूठे सहारों को छोड़कर ईश्वर की शरण में आता है, तभी उसके जीवन में वास्तविक आनंद का प्राकट्य होता है। मन्दिर परिसर में उपस्थित भारी जनसैलाब को संबोधित करते हुए कथाव्यास ने भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, माखन चोरी और गोवर्धन पूजा के आध्यात्मिक रहस्यों को परत-दर-परत खोला। उन्होंने बड़े ही मर्मस्पर्शी ढंग से समझाया कि गोवर्धन लीला वास्तव में प्रकृति के संरक्षण और इंद्र रूपी अहंकार के मर्दन का साक्षात संदेश है। जैसे ही कथा में भगवान का दिव्य प्रसंग आया, पूरा नागेश्वर मन्दिर परिसर साक्षात गोकुल धाम में बदल गया। श्रद्धालु भाव-विभोर होकर नृत्य करने लगे और समूचा वातावरण दिव्य रस से सराबोर हो गया।
विशेष वार्ता के अंतिम क्रम में उन्होंने कहा कि शिवपुरी की इस पावन धरा पर दीक्षित परिवार द्वारा कराया जा रहा यह अनुष्ठान पूरे क्षेत्र की सामूहिक चेतना को जगाने का एक महान आध्यात्मिक संकल्प है। भागवत कथा का निष्कपट भाव से श्रवण मात्र ही मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के बंधनों को काट देता है। इस विशेष और विचारणीय वार्ता के संपन्न होने के तुरंत बाद जब महाराज श्री पांचवें दिन की मुख्य कथा के लिए व्यासपीठ पर विराजमान हुए, तो पूरा मन्दिर परिसर श्रद्धालुओं के गगनभेदी जयकारों और आध्यात्मिक आनंद से गुंजायमान हो उठा।
विशेष वार्ता एवं रिपोर्ट: रमाकान्त पन्त
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