शैल शक्ति बिन्दुखत्ता, नैनीताल
उत्तराखंड के साहित्यिक जगत में अपनी विशेष पहचान बनाने वाली वरिष्ठ साहित्यकार और “शैल-सूत्र” त्रैमासिक पत्रिका की संपादक श्रीमती आशा शैली जी से बातचीत, उनके जीवन, संघर्ष और साहित्यिक दृष्टि के विषय में।
जीवन और नाम की कहानी
शैली जी का जन्म 2 अगस्त 1942 को रावलपिंडी (अविभाजित भारत) में हुआ। बचपन में उन्हें ‘भोली’ कहा जाता था। विवाह के बाद पति मोहन लाल जी ने उनका नाम “आशा” रखा और उनके गोत्र “शिल्ली” से प्रेरित होकर नाम के साथ ‘शैली’ जोड़ दिया।
शैली जी कहती हैं:
“शैली का अर्थ है तरीका-प्रकार, विशिष्ट शैली। यह मेरा लेखन और व्यक्तित्व दोनों ही दर्शाता है।”
विवाह और हिमाचल की प्रेरणा
विवाह 1956 में मात्र 14 वर्ष की आयु में हुआ। पति की नौकरी के कारण हिमाचल के रामपुर-बुशहर में उनका प्रारंभिक गृहस्थ जीवन गुजरा।
“चारों ओर ऊँची-ऊँची पहाड़ियाँ, रात में बिखरी चाँदनी और नदी किनारे सर्पाकार सड़कें—यह सब मेरे लिए स्वप्नलोक से कम नहीं था।”
हिमाचल की प्राकृतिक छटा और सांस्कृतिक परिवेश ने उनके लेखन को गहराई और जीवन्तता दी।
लेखन की शुरुआत और प्रथम पुस्तक का संघर्ष
शैली जी की पहली पुस्तक “काँटों का नीड़” 1992 में प्रकाशित हुई।
“मैंने अपनी बेटी की प्रेरणा से पुस्तक प्रकाशित की, लेकिन प्रकाशन का अनुभव बेहद कष्टदायक रहा। दस पुस्तकें हाथ में आईं, और उनका रंग-रूप देखकर हताशा भी हुई। फिर भी, लेखन का उत्साह कभी नहीं कम हुआ।”
दूसरी पुस्तक “एक और द्रौपदी” ने उन्हें साहित्यिक पहचान दिलाई।
संपादित और प्रकाशित कृतियाँ
शैली जी के नाम 40 से अधिक पुस्तकें हैं, जिनमें कविताएँ, कहानियाँ, उपन्यास, लोककथाएँ, बाल साहित्य और अनुवाद कार्य शामिल हैं।
मुख्य कृतियाँ:
काँटों का नीड़ (काव्य संग्रह)
एक और द्रौपदी (काव्य संग्रह)
शजर-ए-तन्हा (उर्दू गजल संग्रह)
सागर से पर्वत तक (ओड़िया से हिन्दी अनुवाद)
दादी कहो कहानी (लोककथा संग्रह)
पीर पर्वत (गीत संग्रह)
छाया देवदार (उपन्यास)
बच्चों सुनो व अन्य साहित्य
वर्तमान में उनका पूरा ध्यान “दोहा सहस्राधिक” पर केंद्रित है, जिसे वे गहन परिश्रम और सावधानी से तैयार कर रही हैं।
मार्गदर्शक और गुरू परंपरा
शैली जी के लेखन जीवन में अनेक गुरू रहे।
डॉ. महाराज कृष्ण जैन – कहानी लेखन
साहिर सयालकोटी – उर्दू ग़ज़ल
प्रो. मेहर गेरा – काव्य मार्गदर्शन
डॉ. राष्ट्रबंधु – बाल साहित्य
“गुरू परंपरा का पालन किए बिना रचना सुडौल नहीं बन सकती। विधा का गहन ज्ञान और अनुशासन आवश्यक है।”
लेखन प्रक्रिया और साहित्यिक दृष्टि
शैली जी के अनुसार:
कविता: भावनाओं का स्वाभाविक विस्फोट
कहानी: पात्र की प्रामाणिकता और तथ्यों का पालन
“मानव संवेदनशील प्राणी है। जब कुछ हमें झकझोर दे और हम उसे व्यक्त न कर सकें, तो लेखन का सुकून तब तक नहीं मिलता जब तक हम उसे नहीं लिख लेते।”
उनका दृष्टिकोण समाज की वास्तविक समस्याओं और व्यक्तिगत अनुभवों से प्रेरित है।
अनुवाद और समाज सेवा
शैली जी के साहित्य का अनुवाद कई भाषाओं में हुआ: अंग्रेज़ी, उर्दू, गुजराती, डोगरी और मलयालम। स्वयं उन्होंने उड़िया साहित्य का काव्यानुवाद किया।
“अनुवाद किसी भी लेखक के लिए बड़ी उपलब्धि है। इससे साहित्य की सीमा व्यापक होती है।”
“आरती प्रकाशन” के माध्यम से उन्होंने नये लेखकों के लिए किफायती और समाजसेवी प्रकाशन व्यवस्था बनाई।
सम्मान और पुरस्कार
शैली जी साहित्य क्षेत्र में 36 से अधिक सम्मानों से सम्मानित हैं, जिनमें प्रमुख हैं:
अ० भा० दलित साहित्य अकादमी द्वारा अम्बेडकर फैलोशिप (1992)
हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा महादेवी वर्मा सम्मान (2006)
उत्तराखंड राज्य पुरस्कार – तीलू रौतेली (2016)
हिमाचल गौरव सम्मान (2015)
भारतीय भाषा रत्न (2011)
“असली उपलब्धि वह है जो बिना जुगाड़ के मिल जाए। यही असली आश्चर्य है।”
जीवन दर्शन और संदेश
शैली जी का संदेश नई पीढ़ी के लिए स्पष्ट है:
गुरू परंपरा और विधा का ज्ञान आवश्यक है
साहित्य समाज सेवा है, केवल व्यक्तिगत अभिव्यक्ति नहीं
धैर्य और आत्मविश्वास नारी लेखकों के लिए आवश्यक
लेखन का अभ्यास तब तक जारी रहना चाहिए जब तक शरीर और मन साथ दें
“मेरे पति और बेटी के प्रस्थान के बाद मेरी लेखनी ही मेरा परिवार है। यही मेरा संसार है।”
शैली जी का जीवन और लेखन दर्शाता है कि साहित्य केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि अनुभव, संवेदना और समाज की गहराई का प्रतिबिंब है। उनके संघर्ष, मार्गदर्शन और शैल शक्ति आज भी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
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