“वाणी से संस्कृति का दीप: 800 से अधिक कथाओं से सनातन चेतना को जीवंत करने वाले डॉ. पंकज मिश्रा ‘मयंक’”

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श्रीमद् भागवत एवं पुराणों के मर्मज्ञ डा० पंकज मिश्रा ‘मयंक’ :
रामकथा, भागवत और सेवा के माध्यम से सनातन चेतना के प्रखर संवाहक

800 से अधिक कथाओं का दुर्लभ कीर्तिमान, भक्ति–ज्ञान–राष्ट्रप्रेम का अद्भुत संगम

विशेष रिपोर्ट : रमाकान्त पन्त

आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जगत में अपनी ओजस्वी वाणी, शास्त्रसम्मत विवेचन और करुणामयी दृष्टि से विशेष स्थान बना चुके प्रसिद्ध कथा वाचक डा० पंकज मिश्रा ‘मयंक’ आज केवल रामकथा के नहीं, बल्कि श्रीमद् भागवत, महापुराणों और सनातन दर्शन के सिद्ध ज्ञाता के रूप में देशभर में श्रद्धा और सम्मान के साथ स्मरण किए जाते हैं। अब तक 800 से अधिक कथाओं का सफल व भावपूर्ण वाचन कर उन्होंने एक नया आध्यात्मिक कीर्तिमान स्थापित किया है।

देश के लगभग सभी हिंदी भाषी राज्यों में उनकी कथाओं ने जनमानस को भक्ति, ज्ञान और नैतिक मूल्यों से जोड़ा है। उनकी शैली की विशेषता यह है कि वे गूढ़ शास्त्रीय विषयों को भी सरल, रसपूर्ण और हृदयस्पर्शी भाषा में प्रस्तुत करते हैं, जिससे सामान्य श्रोता भी आध्यात्मिक भाव से सहज रूप में जुड़ जाता है।

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हरदोई क्षेत्र में जन्मे डा० पंकज मिश्रा का जीवन आरंभ से ही संस्कारों की सुदृढ़ नींव पर खड़ा रहा है। माता श्रीमती कान्ता मिश्रा और पिता श्री सुरेश चन्द्र मिश्रा से प्राप्त संस्कार, अनुशासन और शिक्षा ने उनके व्यक्तित्व को गहराई प्रदान की। काशी (बनारस) से पीएचडी की उपाधि प्राप्त कर उन्होंने वेद–पुराण, रामचरितमानस, श्रीमद् भागवत और अन्य धर्मग्रंथों का गंभीर अध्ययन किया। यह शास्त्रीय दृष्टि उनकी कथाओं में स्पष्ट झलकती है, जहाँ कथा केवल श्रवण नहीं, बल्कि आत्मबोध का माध्यम बन जाती है।

दो भाई और दो बहनों के बीच दूसरे क्रम में जन्मे डा० मिश्रा के पिता भारतीय सेना से सेवानिवृत्त होकर राष्ट्रसेवा का आदर्श प्रस्तुत कर चुके हैं। इसी कारण डा० पंकज मिश्रा के जीवन में राष्ट्रप्रेम सर्वोपरि है—उनकी कथाओं में भी देश, संस्कृति और सामाजिक कर्तव्यों की प्रेरणा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

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महज 11 वर्ष की आयु में कथा वाचन आरंभ करने वाले डा० पंकज मिश्रा ने निरंतर साधना, अध्ययन और अनुभव के बल पर 56 वर्ष की आयु तक 800 से अधिक कथाओं का अनुपम कीर्तिमान स्थापित किया। वे श्रीमद् भागवत पुराण, विष्णु पुराण, शिव पुराण सहित अन्य ग्रंथों के भी प्रामाणिक ज्ञाता हैं और कथा के माध्यम से कर्म, भक्ति और ज्ञान—तीनों का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करते हैं।

वे गौ-प्रेमी हैं और दीन-दुखियों की सेवा को जीवन का अभिन्न अंग मानते हैं। परोपकार, करुणा और सामाजिक दायित्व की भावना उनके हृदय में कूट-कूट कर भरी है। व्यक्तिगत जीवन में वे दो पुत्रों और एक पुत्री के पिता हैं। उनकी धर्मपरायण पत्नी का निरंतर सहयोग और प्रेरणा उनके कथावाचक जीवन की बड़ी शक्ति है। पति-पत्नी का परस्पर समर्पण और विश्वास उनके आध्यात्मिक कार्य को और अधिक गति प्रदान करता है।

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उत्तराखण्ड की देवभूमि से डा० पंकज मिश्रा का विशेष आत्मीय लगाव है। यहाँ की आध्यात्मिक परंपराएँ, देवस्थल और श्रद्धालुओं की भक्ति उन्हें विशेष रूप से आकर्षित करती है। उत्तराखण्ड की धरती को वे तप, त्याग और भक्ति की भूमि मानते हैं, जहाँ कथा वाचन उन्हें आत्मिक संतोष प्रदान करता है।

निस्संदेह, डा० पंकज मिश्रा ‘मयंक’ आज के युग में ऐसे विरले कथावाचक हैं, जिनके व्यक्तित्व में शास्त्रीय ज्ञान, सरलता, सेवा-भाव, भक्ति और राष्ट्रप्रेम का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। उनकी वाणी से प्रवाहित रामकथा और भागवत कथा न केवल श्रद्धालुओं को भाव-विभोर करती है, बल्कि उन्हें एक श्रेष्ठ, संस्कारित और धर्ममय जीवन की दिशा भी प्रदान करती है।

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