विशेष रिपोर्ट : रमाकान्त पन्त : जहाँ विवाह से पूर्व स्वयं महादेव ने की गणपति की वंदना :कुमाऊँ के गण पर्वत पर प्रकट हुआ शिव गणेश उपासना का दिव्य रहस्य

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ताकुला (अल्मोड़ा)।
कुमाऊँ की पुण्यभूमि में स्थित गण पर्वत केवल एक पर्वत नहीं, बल्कि वह दिव्य स्थल है जहाँ स्वयं जागेश्वरनाथ महादेव ने विवाह से पूर्व श्री गणेश जी का पूजन कर समस्त सृष्टि को यह संदेश दिया कि गणपति की वंदना के बिना कोई भी शुभ कार्य सिद्ध नहीं होता।
देवताओं में प्रथम पूज्य श्री गणेश जी की महिमा का उद्घोष स्वयं स्कन्द पुराण के मानस खण्ड के 68वें अध्याय में महर्षि वेदव्यास ने किया है। बिना गणेश वंदना के की गई पूजा, स्तुति अथवा मनोरथ  सब निष्फल माने गए हैं।

ऋषियों का प्रश्न और व्यास जी का दिव्य उद्घाटन

एक बार अनेक ऋषियों ने महर्षि वेदव्यास से जिज्ञासा प्रकट की

 “हे महामुने! ब्रह्मा सहित समस्त देवों से पूजित जागेश्वर को छोड़कर भगवान शिव ने गण पर्वत पर गणेश जी का पूजन क्यों किया? और विवाह जैसे महायज्ञ से पूर्व उन्होंने गणपति को सर्वप्रथम क्यों नमन किया?”ऋषियों की जिज्ञासा पर व्यास जी ने बताया कि सती के देहत्याग के पश्चात शिवजी दीर्घकाल तक समाधिस्थ रहे। उसी समय तारकासुर का अत्याचार त्रिलोक में फैल गया। देवताओं की प्रार्थना पर शिवजी ने पुनः विवाह हेतु स्वीकृति दी, क्योंकि देवी गिरिजा से उत्पन्न पुत्र ही तारकासुर का वध कर सकता था।

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विवाह से पूर्व विघ्ननाशक की आराधना

हिमालय की ओर प्रस्थान करते समय शिवजी के प्रमुख गण स्कन्द ने महादेव से कहा—

 “हे प्रभु! विवाह जैसे महान संस्कार से पूर्व विघ्नों के नाश हेतु गणपति पूजन आवश्यक है।” यह वचन शिवजी के हृदय को अत्यंत प्रिय लगा। तभी गण पर्वत पर महादेव ने स्वयं श्री गणेश का पूजन किया, जिससे यह सनातन सत्य स्थापित हुआ कि गणेश उपासना के बिना शिव उपासना भी पूर्ण नहीं होती।

आदि गणेश और पार्वतीनन्दन गणेश का रहस्य

व्यास जी ने बताया कि इस स्थल पर विश्वकर्मा द्वारा निर्मित आदि गणेश की प्रतिमा स्थित है। ये वही गणपति हैं जो सृष्टि के प्रत्येक कार्य के प्रारम्भ में पूज्य हैं। बाद में माता पार्वती के पुत्र के रूप में अवतरित पार्वतीनन्दन गणेश ने इस आदि स्वरूप को लोककल्याण हेतु प्रतिष्ठित किया। अर्थात आदि गणेश सृष्टि के मूल विघ्नहर्ता हैं पार्वतीनन्दन गणेश भक्तों के संकटमोचक दोनों का पूजन एक ही चेतना का विस्तार है।

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पूजन विधि और फलश्रुति

गण पर्वत पर गणेश पूजन का विधान दूर्वा अक्षत पुष्प गंध धूप–दीप से किया जाता है। यहाँ गणेश पूजन करने से समस्त विघ्नों का नाश, मनोरथ सिद्धि और कर्मों की शुद्धि होती है।
यहीं गणिकेश स्वरूप में महादेव और गिरिजा देवी का पूजन करने से सत्यलोक की प्राप्ति का वर्णन शास्त्रों में मिलता है।

कुमाऊँ का पवित्र गणनाथ धाम

कुमाऊँ अंचल के अल्मोड़ा जनपद के ताकुला क्षेत्र में स्थित गणनाथ मंदिर उसी गण पर्वत की दिव्य परम्परा का जीवंत प्रमाण है। सनातन काल से यह देवस्थान जनआस्था, श्रद्धा और साधना का केन्द्र रहा है।

सनातन संदेश

शिव ने स्वयं गणेश को पूजकर यह संदेश दिया कि“जीवन का कोई भी कार्य, चाहे वह विवाह हो, पूजा हो या साधना—
गणपति वंदना के बिना पूर्ण नहीं होता।”
यही कारण है कि आज भी हर शुभ कार्य में सबसे पहले
“ॐ गं गणपतये नमः”
का उच्चारण किया जाता है।

आदि गणेश (सुपारी स्वरूप) की वंदना मंत्र

(जिन्हें अनाकार/बीज स्वरूप में पूजा जाता है)
.सुपारी-स्थापना मंत्र (आदि गणेश आवाहन)

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ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे
कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्।
ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत
आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम्॥

भावार्थ –
हे गणों के अधिपति! आप बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, वेदस्वरूप और सभी देवों में प्रधान हैं। आप हमारे पूजन में पधारें और हमें शुभ बुद्धि प्रदान करें।

 सुपारी में गणेश प्रतिष्ठा मंत्र ॐ आदिगणपतये नमः
भावार्थ सृष्टि के आदि, विघ्नों के अधिपति श्री गणेश को नमन।

विघ्ननाशक बीज मंत्र (आदि गणेश हेतु)

ॐ गं गणपतये नमः
भावार्थ –
हे गणपति! मेरे जीवन से सभी विघ्नों का नाश करें।
पार्वतीनन्दन श्री गणेश की वंदना मंत्र
(सगुण, साकार, करुणामय स्वरूप)
ध्यान मंत्र
एकदन्तं महाकायं तप्तकाञ्चनसन्निभम्।
लम्बोदरं विशालाक्षं वन्देऽहं गणनायकम्॥
भावार्थ –
एकदंत, विशाल शरीर वाले, स्वर्ण के समान कांतिमान, लम्बोदर और विशाल नेत्रों वाले गणनायक को मैं नमन करता हूँ।

पार्वती पुत्र गणेश वंदना श्लोक
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
भावार्थ –
हे विशालकाय वक्रतुण्ड! आप मेरे सभी कार्यों को सदा निर्विघ्न करें।

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