लालकुआं की धरती का वह विस्मृत रहस्य: जब यहीं रचा गया था उत्तर भारत का पहला ‘अष्टयाम यज्ञ’ और गूँजी थी एक सिद्ध संत की अलौकिक भविष्यवाणी…
यादों के झरोखों से: गुरु-कृपा और एक अलौकिक यात्रा
(संस्मरण: जीवन सिंह खत्री)
अतीत के पन्नों पर जब भी मेरी नज़र ठहरती है, तो पिताजी (स्व० श्री बची सिंह खत्री जी) के जीवन से जुड़ी वे अलौकिक स्मृतियाँ जीवंत हो उठती हैं। यह संस्मरण केवल एक कथा नहीं है, बल्कि उस ईश्वरीय विधान का साक्ष्य है जहाँ एक संत अपने भक्त की डोर स्वयं दूसरे संत के हाथों में सौंप देता है।
लालकुआं की कुटिया और फलाहारी महाराज का सान्निध्य
बात सन् 1953-54 की है। पिताजी का स्थानांतरण राम गढ़ ब्लॉक से राजकीय प्राथमिक विद्यालय, हल्दूचौड़ में हुआ था। उन दिनों लालकुआं में श्री फलाहारी महाराज जी की एक कुटिया हुआ करती थी। महाराज जी की वेशभूषा अत्यंत सादी थी—सिर पर लंबी जटाएँ और तन पर मात्र एक लंगोट। वे साक्षात वैराग्य की प्रतिमूर्ति और हनुमान जी के अनन्य भक्त थे। उन्होंने लगभग 60 वर्षों तक इसी कठोर तपस्या में अपना जीवन व्यतीत किया। पिताजी उनके दर्शन हेतु नियमित रूप से कुटिया में जाया करते थे। उनके निस्वार्थ सेवा-भाव को देखकर महाराज जी ने उन्हें अपनी कुटिया का रसोइया बना लिया, जो पिताजी के लिए किसी ईश्वरीय प्रसाद से कम न था।
उत्तर भारत का ऐतिहासिक अष्टयाम यज्ञ
सन् 1955-56 में फलाहारी महाराज जी की कुटिया में एक भव्य ‘अष्टयाम यज्ञ’ का आयोजन हुआ। माना जाता है कि उस समय उत्तर भारत में यह अपनी तरह का पहला अष्टयाम यज्ञ था। इस महायज्ञ में बद्रीनाथ, केदारनाथ, प्रयाग और दक्षिण भारत तक के प्रसिद्ध साधु-संतों का समागम हुआ। आठों पहर पाठ, पूजा, कीर्तन और सत्संग की अमृत वर्षा होती रही। इस पुनीत अनुष्ठान में पिताजी को भण्डारे की संपूर्ण व्यवस्था (रसोइया) का दायित्व सौंपा गया। इसी यज्ञ के दौरान एक और परम सिद्ध संत, स्व० श्री परमानंद जी महाराज का भी पदार्पण हुआ था।
महाराज जी का निर्वाण और एक दिव्य भविष्यवाणी
समय का चक्र घूमता रहा और सन् 1958 आ गया। एक दिन फलाहारी महाराज जी ने पिताजी से अत्यंत सहज भाव से कहा, “मास्टर! अब मेरा शरीर काफी जीर्ण हो गया है। हम भी अब जाते हैं। तू अपना ट्रांसफर पहाड़ को करवा ले।” अपने गुरु के मुख से महाप्रयाण की बात सुनकर पिताजी का हृदय व्याकुल हो उठा। उन्होंने अश्रुपूरित नेत्रों से पूछा, “महाराज जी, आपके जाने के बाद मेरा क्या होगा?”
तब महाराज जी ने उन्हें सांत्वना देते हुए एक ऐसी भविष्यवाणी की, जो आगे चलकर अक्षरशः सत्य सिद्ध हुई। उन्होंने कहा, “तू चिंता मत कर, तुझे साधुओं का (दिव्य परिवार) मिलेंगा। जो साधु तुझे पहली बार दिखे, बस उसके चरण पकड़ लेना, वही तुझे अपने साथ ले जाएँगे।” उसी वर्ष (1958) महाराज जी ने अपने नश्वर शरीर का त्याग कर परमधाम की यात्रा की और सरयू नदी के पावन तट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया।
भविष्यवाणी का सत्य होना और गुरु परमानंद जी से भेंट
फलाहारी महाराज जी की कृपा और उनके वचनों का प्रभाव ऐसा था कि उनके निर्वाण के कुछ समय बाद ही पिताजी का स्थानांतरण रामगढ़ ब्लॉक (शीतला), मुक्तेश्वर में हो गया।
एक दिन पिताजी अपने विद्यालय में उपस्थित थे। अचानक उनकी दृष्टि विद्यालय के पास से गुजर रहे एक संत पर पड़ी। वे कोई और नहीं, बल्कि वही पूज्य गुरु श्री परमानंद जी महाराज थे, जिनके दर्शन पिताजी ने अष्टयाम यज्ञ में किए थे। संत को देखते ही पिताजी के कानों में फलाहारी महाराज जी के अंतिम शब्द गूंज उठे जो साधु पहली बार दिखे, उसके चरण पकड़ लेना।” पिताजी बिना एक क्षण गंवाए दौड़कर उनके पास पहुँचे और भावविभोर होकर उनके चरणों में गिर पड़े। गुरु परमानंद जी ने उन्हें उठाते हुए स्नेहपूर्वक डांटा और पूछा, “प्रणाम का अर्थ क्या होता है?” पिताजी ने उनसे अपने घर चलने का बहुत आग्रह किया, परंतु महाराज जी ने यह कहकर विनम्रतापूर्वक मना कर दिया कि “फिर कभी आएँगे।” जाते-जाते उन्होंने पिताजी को आशीर्वाद स्वरूप ‘संदेश’ नामक एक पत्रिका भेंट की।
सन् 1958 की वे घटनाएँ महज़ एक इत्तेफाक नहीं थीं। वह एक गुरु द्वारा अपने प्रिय शिष्य को दूसरे समर्थ गुरु के हाथों सौंपने की एक दिव्य और अलौकिक लीला थी, जिसकी सुखद स्मृतियाँ आज भी हमारे परिवार की सबसे बड़ी आध्यात्मिक विरासत हैं।
अष्टयाम यज्ञ: चौबीस घंटे चलने वाला भक्ति और समर्पण का महाअनुष्ठान
सनातन धर्म में ‘अष्टयाम यज्ञ’ विशुद्ध भक्ति, आत्मिक शुद्धि और आध्यात्मिक ऊर्जा का एक अनुपम प्रतीक है। ‘अष्ट’ यानी आठ और ‘याम’ यानी प्रहर—अर्थात दिन-रात के पूरे २४ घंटे अनवरत चलने वाले इस महाअनुष्ठान में भगवान की आराधना और अखंड कीर्तन का विधान है।
इस दिव्य यज्ञ का मुख्य उद्देश्य केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज और परिवेश में सुख, शांति, समृद्धि तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने का एक सशक्त माध्यम है। विशेष रूप से वैष्णव परंपरा में, इस अनुष्ठान के दौरान भगवान (मुख्यतः राधा-कृष्ण) की अष्टयाम सेवा की जाती है। इस सेवा में आठ विशिष्ट चरण शामिल होते हैं: मंगला, श्रृंगार, ग्वाल, राजभोग, उत्थापन, भोग, संध्या-आरती और शयन।
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