अवंतिका से बद्री-केदार तक का वो अदृश्य सूत्र: सात समंदर पार से आए श्रद्धालुओं और एक दिव्य पुस्तक की रहस्यमयी अद्भुत गाथा

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अवंतिका से बद्री-केदार तक का वो अदृश्य सूत्र: सात समंदर पार से आए श्रद्धालुओं और एक दिव्य पुस्तक की रहस्यमयी अद्भुत गाथा
हरिद्वार की ठंडी हवाओं में गंगा की लहरों का संगीत गूंज रहा था। तारीख थी 19 जून। भूपतवाला स्थित जैन मंदिर के पास अचानक एक अजीब सी हलचल बढ़ गई। वहां 47 ऐसे लोग खड़े थे, जिनके चेहरों पर विदेशी धूप का रंग था, लेकिन आंखों में एक प्राचीन सनातनी चमक थी। ब्रिटेन, फ्रांस और मॉरीशस से आए इन तीर्थयात्रियों के इस जत्थे में बच्चे भी थे और बुजुर्ग भी। रवि, विमल, प्रकाश, शिवम, चित्रा और हिमांशी जैसे कई लोग इस दल में शामिल थे। वे सब इतनी दूर से आखिर क्यों आए थे? क्या यह सिर्फ एक आम धार्मिक यात्रा थी, या इसके पीछे कोई गहरी आध्यात्मिक पुकार छिपी थी?
रहस्य की पहली परत तब खुली, जब विदाई के समय उनके हाथों में एक विशेष और पवित्र ग्रंथ सौंपा गया—’आदि शक्ति माँ अवंतिका’। इस पुस्तक को छूते ही विदेशी मेहमानों के चेहरों पर एक अनूठा विस्मय तैर गया। यह कोई साधारण विदाई उपहार नहीं था। इस पुस्तक का पावन अध्याय ठीक कुछ दिन पहले, यानी 30 मई को लालकुआँ के पावन अवंतिका मंदिर में खुला था, जहां सेंचुरी मिल के सीईओ अजय गुप्ता और उपाध्यक्ष नरेश चन्द्रा की मौजूदगी में इसका भव्य विमोचन हुआ था। लेकिन लालकुआँ के एक मंदिर से निकली माँ अवंतिका की यह महिमा, इन सात समंदर पार से आए यात्रियों के जरिए चार धाम की दुर्गम चोटियों तक कैसे पहुंचने वाली थी? यही वह अदृश्य सूत्र था, जो इस पूरी यात्रा को अलौकिक बना रहा था।
तभी मंत्रोच्चार की गूंज के बीच पूर्व राज्य मंत्री और नैनीताल पर्यटन एवं परिवहन विकास सहकारी संघ लिमिटेड के अध्यक्ष ने इस दल को चार धाम के लिए रवाना किया। उनके साथ अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद के जिला अध्यक्ष जगदीश लाल पाहवा, दिवाकर गुप्ता और स्वामिनी वेद आत्मानंद सरस्वती भी थे। जब उन्होंने इस दल को हरी झंडी दिखाई, तो ओवरसीज हॉलीडे टूर्स इंडिया के संचालक शंकर जोशी के प्रयासों को सराहा, जो देश-विदेश में सनातन की अलख जगा रहे हैं। लेकिन असली रहस्य और सनातनी गौरव की बात तब सामने आई, जब स्वामिनी वेद आत्मानंद सरस्वती ने मॉरीशस से आईं रिया सुभाष (शुभ यात्रा होलीडेज) की तरफ देखा।
स्वामिनी जी ने भावुक होकर कहा कि ये विदेशी मेहमान सिर्फ पर्यटक नहीं हैं। ये तो उस सनातन धर्म के सच्चे ध्वजवाहक हैं, जिन्होंने कंबोडिया, थाईलैंड, श्रीलंका और मॉरीशस जैसी सुदूर दिशाओं में सदियों से हमारी संस्कृति को जीवित रखा है। आज आदि शक्ति माँ अवंतिका की कृपा और उनकी पुस्तक का आशीर्वाद ही इन्हें खींचकर देवभूमि के इस महामार्ग पर लाया है।
विदाई के उस भावुक क्षण में जब कमल पंत, संजय वर्मा और होटल ब्रिंजल के स्टाफ ने पलक-पावड़े बिछाकर इन यात्रियों का स्वागत-सत्कार किया, तो कइयों की आंखों से आंसू छलक पड़े। वैदिक मंत्रों के प्रभाव और ‘आदि शक्ति माँ अवंतिका’ पुस्तक को अपने सीने से लगाए, यह 47 सनातनी आत्माएं बद्री-केदार और गंगोत्री-यमुनोत्री की उन रहस्यमयी वादियों की ओर बढ़ गईं, जहां साक्षात ईश्वर का वास है। यात्रा शुरू हो चुकी थी, एक ऐसी खोज की, जिसका माध्यम यह दिव्य पुस्तक बनने जा रही थी।