पापों के दलदल में फंसी सुंदरी, यमराज की लोहे की जंजीरें और नंदा पर्वत का अमर चमत्कार

ख़बर शेयर करें

सृष्टि के प्रथम प्रभात से ही अधिराज कैलाश और पावन मानसरोवर केवल बर्फ से ढकी चोटियों का विस्तार मात्र नहीं हैं, बल्कि यह अनंत सिद्धियों, दिव्य चमत्कारों और आध्यात्मिक ऊर्जा का महासमुद्र हैं। जहाँ कैलाश की धवल चोटियों पर स्वयं देवाधिदेव महादेव समाधिस्थ रहते हैं, वहीं उसी महाहिमालय की छत्रछाया में पल्लवित ‘मानसखंड’ का कण-कण तंत्र, मंत्र और साधना की जीवंत स्थली है। नंद पर्वत से लेकर काकगिरि तक फैला यह पुण्य क्षेत्र साक्षात् देवताओं की क्रीड़ास्थली माना गया है। इसी अलौकिक मानसखंड के दक्षिण भाग में स्थित है ‘नंदगिरि’, जहाँ जगन्माता भगवती नंदा देवी साक्षात् विराजमान हैं। मान्यता है कि इस पावन नंदा क्षेत्र के केवल दर्शन मात्र से प्राणी के जन्म-जन्मांतर के पातक भस्म हो जाते हैं और यहाँ की गई पूजा का फल अश्वमेध यज्ञ से भी हजार गुना अधिक फलदायी माना गया है।
स्कंद पुराण के मानसखंड में महर्षि वेदव्यास जी ऋषियों को एक ऐसा अत्यंत विस्तृत, रोमांचक और हृदयस्पर्शी आख्यान सुनाते हैं, जो पाप, पश्चाताप और भगवती नंदा की असीम अनुकंपा की अनूठी मिसाल है। सत्ययुग में महर्षि पुलस्त्य के कुलीन परिवार में मेनका नाम की अत्यंत रूपवती कन्या का जन्म हुआ, जिसकी सुंदरता मानो साक्षात् चंद्रकांति के समान थी। युवावस्था में उसके पिता ने अत्रि-गोत्र के विद्वान और सदाचारी ब्राह्मण संतन के साथ उसका विवाह कर दिया। दोनों का जीवन धर्म और आनंद के साथ बीत रहा था, किंतु नियति की रेखाएं बड़ी विचित्र थीं। एक दिन जब संतन मुनि सरयू नदी के तट पर वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते हुए स्नान कर रहे थे, तभी दैवयोग से जल के भीतर से एक विशाल जलजीव ने उन्हें खींच लिया और उनकी अकाल मृत्यु हो गई। पति की मृत्यु से व्याकुल गर्भवती मेनका सती होना चाहती थी, परंतु विद्वानों के मना करने पर उसने एक तेजस्वी बालक को जन्म दिया।
पतिहीन मेनका जब अपने बालक के साथ जीवन व्यतीत कर रही थी, तभी कल्पवृक्ष के समान कांति वाले एक छद्मवेषी भील (वनेचर) ने ब्रह्मचारी ब्राह्मण का रूप धरकर उसके घर में प्रवेश किया। मेनका ने उसे अतिथि मानकर आतिथ्य सत्कार किया, परंतु आधी रात के अंधकार में वह भील मेनका और उसके मासूम बालक का अपहरण कर सुदूर हिमालय की कंदराओं और नंदा पर्वत के तट पर ले आया। वहाँ रहकर वह भील प्रतिदिन सुबह जंगल जाता और शाम को प्रचुर मात्रा में खरा सोना लेकर लौटता। एक दिन विस्मित होकर जब मेनका ने उससे पूछा कि तुम इतना सोना कहाँ से लाते हो, तो भील ने हाथ जोड़कर सत्य से पर्दा उठाया।
तत्र नन्दा महादेवी जागर्ति भुवनेश्वरी।
पूजयामि महाभागां नन्दां पर्वतवासिनीम्॥
भील ने कहा कि यहाँ पास ही पुण्यरूप नंदगिरि पर्वत है, जहाँ संपूर्ण ब्रह्मांड की स्वामिनी भगवती नंदा साक्षात् जागृत रूप में निवास करती हैं। मैं प्रतिदिन गंध, पुष्प और अक्षत से उनकी पूजा करता हूँ और जगन्माता प्रसन्न होकर मुझे प्रतिदिन यह स्वर्ण राशि प्रदान करती हैं। भील की बात सुनते ही मेनका की चेतना जाग उठी। अपने पूर्व पापों का स्मरण कर वह पश्चाताप की अग्नि में जलने लगी। उसने नंदा सरोवर के शीतल जल में स्नान किया, व्रत रखा और नंदीकेश महादेव की पूजा करते हुए भगवती नंदा की शरण ली।
नारायणि महामाये हिमाद्रितनये शुभे।
पुंश्चल्या धर्महीनायाः पातकान् मे विनाशय॥
वह प्रतिदिन कातर स्वर में स्तुति करती हुई प्रार्थना करने लगी कि हे नारायणी, हे महामाये, हे हिमाचल की पुत्री, मैं धर्महीन और पापिन हूँ, कृपा करके मेरे जन्मों के समस्त पातक काट दीजिए। वर्षों तक नंदा देवी की अनन्य भक्ति में लीन रहने के बाद जब मेनका की मृत्यु हुई, तो उसके अतीत के पापों के कारण यमदूत आए और उसे लोहे की भारी जंजीरों में जकड़कर सीधे यमलोक ले गए। यमराज ने तर्क दिया कि दुराचार में फंसी आत्माओं का स्थान यमलोक में ही नियत है और सैकड़ों तीर्थ या तपस्या करने पर भी ऐसे पापों की शुद्धि नहीं होती।
परंतु जैसे ही भगवती नंदा यानी साक्षात् महामाया काली को अपनी भक्ता के यमलोक में जकड़े होने का पता चला, वे स्वयं विकराल, त्रिशूलधारिणी और तेजोमय रूप में यमराज की सभा में प्रकट हो गईं। भगवती काली ने यमराज से गरजते हुए कहा कि जिस क्षेत्र में स्वयं भगवान जनार्दन विष्णु पर्वतरूप में विद्यमान हैं, उस नंदा क्षेत्र में भक्तिपूर्वक किए गए पूजन से ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी तत्काल भस्म हो जाते हैं। इतना कहकर भगवती ने जैसे ही मेनका का स्पर्श किया, यमराज की वे लोहे की भारी जंजीरें तड़ातड़ टूटकर गिर गईं। मेनका का पापी शरीर विलीन हो गया और वह साक्षात् लक्ष्मी के समान दिव्य रूप धारण कर विमान पर सवार होकर स्वर्गलोक चली गई। कालांतर में वह भील भी महामाया की कृपा से शिवलोक को प्राप्त हुआ। स्कंद पुराण के अनुसार जो भी भक्त नंदा-महात्म्य के इस अमर प्रसंग को पढ़ता या सुनता है, उसे इस लोक में आयु, आरोग्य और ऐश्वर्य तथा अंत काल में परम मुक्ति की प्राप्ति होती है।
रिपोर्ट :@ रमाकान्त पन्त