नागराजाओं की तपोभूमि और रहस्यों से भरी कमस्यार घाटी: देवभूमि में 13-14 मई को सजेगा माँ भद्रकाली के दो प्राचीन मंदिरों का अद्भूत दरबार, निकलेगी भव्य रथ यात्रा
बागेश्वर: देवभूमि उत्तराखंड का कण-कण ईश्वरीय चमत्कारों, ऋषियों की तपस्या और नागराजाओं के अनसुलझे रहस्यों से भरा हुआ है। जनपद बागेश्वर की कमस्यार घाटी का भद्रकाली क्षेत्र आध्यात्म जगत में प्राचीन काल से ही एक अद्भूत स्थान रहा है। यहाँ माँ भद्रकाली की महिमा दो अलग-अलग अत्यंत प्राचीन और पौराणिक मंदिरों में रची-बसी है। आगामी 13 और 14 मई 2026 को जगत माता भद्रकाली के इन दोनों पावन स्वरूपों का भव्य जन्मोत्सव और जयंती महापर्व मनाया जा रहा है।
दो अलग-अलग मंदिर: एक शक्ति पीठ, दूसरा रहस्यमयी ‘ मंदिर
इस घाटी में माँ भद्रकाली के दो प्रमुख और प्राचीन मंदिर हैं। पहला मंदिर कमस्यार घाटी की तलहटी में ‘भद्रकाली गाँव’ में स्थित सिद्ध ‘शक्ति पीठ’ है, जिसके नीचे से कल-कल करती भद्रा नदी बहती है। वहीं, दूसरा मंदिर इससे लगभग पाँच किलोमीटर ऊपर सुरम्य पहाड़ी पर स्थित माँ का ‘ मंदिर’ (सिमाली) में है। कुचौली मार्ग पर स्थित यह मूल स्थान आज भी गुमनामी के साये में है। मान्यता है कि इसी दुर्गम चोटी से पवित्र भद्रा नदी का उद्गम हुआ था। इस मंदिर के भीतर एक विशाल पत्थर प्राकृतिक गुफा का आकार लिए हुए है, जिसके नीचे तीन पावन पिण्डियों की पूजा होती है। माँ के अनन्य भक्त बताते हैं कि पूर्णमासी की रात्रि को आज भी इस मूल मंदिर (सिमाली) से माँ का रहस्यमयी डोला नीचे स्थित भद्रकाली शक्ति पीठ तक जाता है।
सनी उडियार, हवनतोली और भद्रा नदी का प्राकट्य
इस पावन क्षेत्र का इतिहास महर्षि शांडिल्य, कुशंडी ऋषि और पंतजली मुनि की घोर तपस्या से जुड़ा है। प्राचीन समय में ‘सनी उडियार’ (छोटी गुफा) शांडिल्य ऋषि की तपस्या का मुख्य केंद्र था। पास ही स्थित ‘हवनतोली’ वह ऐतिहासिक स्थान है जहाँ महाप्रतापी नागों ने ऋषियों के साथ मिलकर माँ भद्रकाली को समर्पित एक विराट महायज्ञ किया था। नागराज मूलनारायण की अध्यक्षता और फेनिल नाग की उपस्थिति में हुए इस यज्ञ में ऋषियों के आवाहन से ही पवित्र ‘भद्रा’ नदी प्रकट हुई थी। स्कंद पुराण के अनुसार, इस नदी में स्नान करने वाला ब्रह्म लोक का भागी बनता है।
गोपीवन का रहस्य और नागराजाओं की तपोभूमि
पुराणों में वर्णित ‘गोपीवन’ भी इसी क्षेत्र में है। यज्ञ के पश्चात नाग समुदाय ने कामधेनु की सेवा की और वरदान में गायों के कुल प्राप्त किए। नाग कन्याओं (गोपियों) ने यहाँ गायें चराते हुए एक दिन शांडिल्य ऋषि की गुफा खोजी, जहाँ माँ भद्रकाली की कृपा से उन्हें एक ज्योर्तिमय लिंग के दर्शन हुए, जिसे आज ‘गोपीश्वर महादेव’ के नाम से जाना जाता है। यह समूची नागभूमि खर नाग, गोपालक नाग, त्रैलोक्य नाग और मूलनारायण जैसे अनगिनत नाग देवताओं का वास स्थान है। कहा तो यह भी जाता है कि वानरराज सुग्रीव ने हनुमान जी के साथ श्रीराम की सहायता और अपना राज्य वापस पाने के लिए इन्हीं क्षेत्रों में मूलनारायणी देवी की तपस्या की थी।
13 और 14 मई को ऐतिहासिक आयोजन
रहस्यों और अलौकिक शक्तियों से भरी इस भूमि पर आगामी 13 और 14 मई को महामाई का विराट उत्सव होने जा रहा है:
13 मई (जन्मोत्सव व रथ यात्रा): प्रातः 7:00 बजे से गणेश व जगदम्बा पूजन होगा। दोपहर 3:00 बजे ढोल-दमाऊ की गूंज के साथ माँ की ऐतिहासिक रथ यात्रा ‘ माँ भद्रकाली मंदिर (सिमाली)’ से प्रस्थान कर ‘शक्ति पीठ (भद्रकाली गाँव)’ तक जाएगी। रात्रि में रथ यात्रा वापस सिमाली लौटेगी, जहाँ भव्य जागरण होगा।
14 मई (जयंती महापर्व): माँ भद्रकाली मंदिर, सिमाली में प्रातः काल माँ की पूजा व सुंदरकांड होगा। दोपहर में उसी प्राचीन परंपरा का स्मरण करते हुए विराट हवन और भव्य भंडारे का आयोजन किया जाएगा। शाम को भजन और प्रसाद वितरण होगा।
जहाँ एक ओर 13 और 14 मई को यह भव्य आयोजन होने जा रहा है, वहीं यह भी सच है कि नागराजाओं और ऋषियों के इतने गहरे इतिहास को समेटे यह ‘ माँ भद्रकाली मंदिर’ और ‘सनी उडियार’ आज भी उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं। यदि तीर्थाटन के नक्शे पर इन्हें उकेरा जाए, तो यह क्षेत्र आस्था और रोमांच का विश्वस्तरीय केंद्र बन सकता है।
**🌹जय माँ भद्रकाली🌹**
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