काशी की पवित्र नगरी में यूँ तो कण-कण में शिव का वास है, किंतु यहाँ गुरु बृहस्पति देव का एक अत्यंत प्राचीन और सिद्ध मंदिर भी स्थित है, जिसकी कथा श्रद्धा, तपस्या और ज्ञान की महिमा को दर्शाती है। यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि ज्योतिष, विद्या और विवेक से जुड़े साधकों के लिए भी विशेष महत्व रखता है।
तपस्या की भूमि: काशी
पौराणिक कथाओं के अनुसार, महर्षि अंगिरा के पुत्र अंगिरश (बृहस्पति) ने अपनी इंद्रियों को वश में कर भगवान शिव की घोर तपस्या का संकल्प लिया। उन्हें ज्ञात था कि अविमुक्त क्षेत्र काशी में की गई साधना कभी निष्फल नहीं जाती। इसी विश्वास के साथ वे काशी आए और दशाश्वमेध क्षेत्र के समीप एक शिवलिंग की स्थापना कर वर्षों तक निराहार रहकर कठोर तप में लीन रहे।
महादेव का प्रकट होना
बृहस्पति की तपस्या इतनी प्रखर थी कि उनके तेज से तीनों लोक आलोकित हो उठे। अंततः महादेव शिवलिंग से प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा। बृहस्पति ने विनम्र भाव से केवल ज्ञान का प्रकाश और शिव चरणों में प्रेम की कामना की। उनकी निस्वार्थ भावना से प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें देवताओं का गुरु नियुक्त किया और नवग्रहों में उन्हें सर्वोच्च स्थान प्रदान किया। उसी शिवलिंग को ‘बृहस्पतिश्वर महादेव’ के नाम से प्रतिष्ठित किया गया।
स्कंद पुराण में वर्णित दिव्य कथा
इस मंदिर का उल्लेख स्कंद पुराण के काशी खंड में मिलता है। कथा के अनुसार, अंगिरश के तप और शिव स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान विश्वनाथ यहीं प्रकट हुए। उन्होंने अंगिरश से वरदान मांगने को कहा। अंगिरश ने सम्पूर्ण ब्रह्मांड नहीं, बल्कि केवल काशी और काशी में भी स्वयं विश्वनाथ को ही माँगा। यह सुनकर महादेव ने 33 करोड़ देवताओं और 48 हजार ऋषियों का आह्वान कर इसी स्थान पर उनका पट्टाभिषेक कराया और ब्रह्मा को आदेश दिया कि सभी ग्रहों में बृहस्पति को प्रमुख माना जाए। इसके पश्चात महादेव उसी शिवलिंग में समाहित हो गए और तब से यह स्थान गुरु बृहस्पति देव का पावन धाम माना जाने लगा।
मंदिर की सटीक स्थिति
काशी में गुरु बृहस्पति देव के दो प्रसिद्ध मंदिर माने जाते हैं—
एक मंदिर डेढ़सी पुल और दशाश्वमेध घाट के मार्ग पर ऊँचाई पर स्थित है, जहाँ प्रत्येक गुरुवार भारी संख्या में भक्त दर्शन को आते हैं।
दूसरा और अधिक प्राचीन मंदिर संकठा गली में माँ संकठा मंदिर के पीछे तथा आत्म विशेश्वर मंदिर के ठीक सामने स्थित है। आत्म विशेश्वर वह स्थान है जहाँ बाबा विश्वनाथ की आत्मा निवास करती है ऐसी मान्यता है।
पूजा की विशेष परंपरा
यहाँ भगवान को पीला रंग अत्यंत प्रिय है। भक्त पीले फूल, पीले वस्त्र, चने की दाल, बेसन के लड्डू और पीला चंदन अर्पित करते हैं। विशेष रूप से गुरुवार के दिन यहाँ दर्शन करना अत्यंत शुभ माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र में गुरु दोष के निवारण और विद्या, विवेक तथा सौभाग्य की प्राप्ति के लिए इस मंदिर का विशेष महत्व बताया गया है।
ज्ञान और सौभाग्य का केंद्र
मान्यता है कि जो भी भक्त श्रद्धा से बृहस्पतिश्वर महादेव का दर्शन करता है, उसकी बुद्धि प्रखर होती है, जीवन के मार्ग प्रशस्त होते हैं और दुर्भाग्य का नाश होता है। विद्यार्थी, विद्वान, साधक और गृहस्थ सभी के लिए यह मंदिर आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुपम केंद्र है।
काशी की संकरी गलियों में स्थित यह छोटा सा मंदिर वास्तव में तप, ज्ञान और गुरु कृपा का विशाल प्रतीक है—जहाँ आज भी गुरु बृहस्पति देव की दिव्य उपस्थिति भक्तों को आलोकित करती है।
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