कुचौली/बागेश्वर। देवभूमि उत्तराखण्ड की पावन धरती सदियों से ऋषि-मुनियों की तपस्थली रही है। इसी कड़ी में जनपद मुख्यालय बागेश्वर से लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित कुचौली गांव महर्षि कुशण्डी ऋषि की तपोभूमि के रूप में प्रसिद्ध है। मान्यता है कि यज्ञ-हवन और अग्निहोत्र के महान ज्ञाता महर्षि कुशण्डी ने इसी पवित्र स्थल पर वर्षों तक कठोर तपस्या की और प्रतिदिन लोककल्याण के लिए हवन यज्ञ किया करते थे।
स्थानीय परंपराओं के अनुसार ऋषि की तपस्या के कारण ही इस स्थान का प्राचीन नाम “कशौली” पड़ा, जो समय के साथ अपभ्रंश होकर आज “कुचौली” के नाम से जाना जाता है। यहां स्थित प्राचीन यज्ञ कुण्ड उस गौरवशाली आध्यात्मिक परंपरा का जीवंत प्रतीक माना जाता है।
वर्षों पूर्व पहाड़ियों के दरकने से यह प्राचीन हवन कुण्ड मलबे में दब गया था और धीरे-धीरे गुमनामी में खो गया। गांव से बड़े पैमाने पर पलायन होने के कारण भी इस ऐतिहासिक धरोहर की ओर लंबे समय तक किसी का ध्यान नहीं गया।
हाल ही के वर्षों में दिल्ली प्रवासी एवं स्थानीय निवासी तथा प्रसिद्ध शक्तिपीठ माँ भद्रकाली मंदिर समिति के आचार्य योगेश पंत गांव पहुंचे। उन्होंने ग्रामीणों के सहयोग से इस प्राचीन स्थल की पुनः खोज का संकल्प लिया। निशानदेही के आधार पर मलबा हटाने और खुदाई का कार्य आरम्भ किया गया। कुछ ही समय में जमीन के भीतर दबा भव्य पौराणिक हवन कुण्ड सामने आ गया।
कुण्ड के मिलते ही ग्रामीणों और श्रद्धालुओं में उत्साह की लहर दौड़ पड़ी। सभी ने मिलकर इसकी सफाई की और विधिवत पूजा-अर्चना कर इस प्राचीन धरोहर का पुनः सम्मान किया। इस खोज से न केवल महर्षि कुशण्डी की तपस्या का ऐतिहासिक प्रमाण उजागर हुआ है, बल्कि क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन और तीर्थाटन की संभावनाएं भी प्रबल हुई हैं।
स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि इस पवित्र तपोभूमि का संरक्षण और प्रचार-प्रसार किया जाए तो कुचौली गांव पुनः आध्यात्मिक चेतना का केंद्र बन सकता है और पलायन से सूने पड़े इस क्षेत्र में फिर से रौनक लौट सकती है।
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