देवभूमि के सुंदर गांव की वह बेटी, जिसकी कला के मुरीद हुए देश के बड़े-बड़े दिग्गज

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शैलशक्ति समाचार, गौलापार।
देवभूमि उत्तराखंड की वादियों में बसा एक सुन्दर गांव ‘जगतपुर’ (गौलापार) आज देश भर के कला प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। वजह है—एक साधारण से घर के आंगन से शुरू हुआ वह कलात्मक सम्मोहन, जिसने न केवल कुमाऊंनी धरोहर की पहचान बदल दी, बल्कि देश के बड़े-बड़े दिग्गजों के अध्ययन कक्ष की दीवारों तक अपनी पहुंच बना ली है।

यह गाथा है पूजा कार्की (पत्नी धीरज कार्की) की, जिनकी उंगलियों के स्पर्श से जब साधारण मिट्टी, लकड़ी और वस्त्रपट छूते हैं, तो मानों देवभूमि की सदियों पुरानी संस्कृति जीवंत हो उठती है।
भारतीय संस्कृति में कला की महिमा और ऐपण विधा का पावन महत्व
भारतीय सनातन परंपरा में कला को सत्य, कल्याण और सुंदरता का दिव्य रूप माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है:
“सत्यं शिवं च सौन्दर्यं कलायां सम्प्रतिष्ठितम्।
लोकानुरंजनं तस्याः संस्कृतिः परमं धनम्॥”
(अर्थात्: कला में सत्य, कल्याण और सुंदरता का वास होता है। लोक-मन को आनंदित करने वाली यह सांस्कृतिक कला ही हमारी धरोहर और सबसे बड़ा धन है।)
उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में ‘ऐपण’ शब्द संस्कृत के ‘अर्पण’ से बना है। यह केवल एक सजावटी चित्रकारी नहीं, बल्कि देव-आशीर्वाद और शुभता का प्रतीक है। गेरू की लाल मिट्टी पर भीगे चावलों के घोल (बिस्वार) से उकेरी जाने वाली ये रेखाएं, लक्ष्मी चरण, कमल पुष्प और धार्मिक प्रतीक घर-आंगन में सकारात्मक ऊर्जा भर देते हैं। दीपावली पर लक्ष्मी चौकी, बसंत पंचमी पर सरस्वती चौकी और मांगलिक अवसरों पर ऐपण बनाने की यह परंपरा सदियों से मां से बेटियों को मिलने वाली एक पावन विरासत रही है।
दैनिक उपयोग की साधारण वस्तुओं में प्राण फूंकती उंगलियां
पूजा कार्की की सबसे बड़ी खासियत यह है कि उन्होंने ऐपण कला को घर की देहरियों से निकालकर दैनिक जीवन की सजावटी वस्तुओं पर बहुत ही सादगी और सुंदरता से उकेरा है:

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अलौकिक करवा चौथ एवं पूजा थाली: लाल गेरू पृष्ठभूमि पर बनी थाली के केंद्र में ‘ॐ’ और श्री गणेश की भव्य आकृति है। साथ में बने जल पात्र और छननी पर सुनहरे व सफेद रंगों की बारीक जालदार कारीगरी मांगलिक अवसरों की शोभा बढ़ा देती है।
मिट्टी के गमलों पर प्रकृति और कला का संगम: साधारण मिट्टी के गमलों पर उन्होंने बिस्वार शैली में मां लक्ष्मी के चरण-चिह्न, कमल दल और सुंदर ज्यामितीय रेखाएं उकेरी हैं।

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माननीयों के लिए विशेष हस्तनिर्मित नामपट्ट: उनकी कला की ख्याति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए तैयार नामपट्ट (जैसे माननीय न्यायाधीश आलोक मेहरा) में गणेश जी की छवि और रंग-बिरंगी बिंदु-कारीगरी का सुंदर संगम देखने को मिलता है।
कांच में जड़ा ‘ॐ’ चौखटा और पारंपरिक चौकियां: लाल वस्त्रपट पर सफेद रेखांकन और छोटे-छोटे शीशों से बना ‘ॐ’ का चौखटा पूरे कमरे को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है। साथ ही शंख, घंटी, सूर्यदेव और स्वास्तिक से सजी पीली-लाल चौकियां कुमाऊंनी परंपरा के साक्षात दर्शन कराती हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञ भरत पाण्डे की ओर से प्रशस्ति शब्द
प्रसिद्ध पर्यावरण विशेषज्ञ भरत पाण्डे ने पूजा कार्की की सराहना करते हुए कहा:
“पूजा कार्की का यह प्रयास केवल कला नहीं, बल्कि प्रकृति और संस्कृति का सुंदर मिलन है। जब कोई कलाकार प्राकृतिक रंगों और मिट्टी के पात्रों पर अपनी लोक कला को उकेरता है, तो वह भावी पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम करता है। गमलों से लेकर पारंपरिक चौकियों तक उन्होंने जिस सादगी से ऐपण को जीवंत किया है, वह देवभूमि उत्तराखंड के लिए गौरव की बात है।”
देश भर में बढ़ती मांग और आत्मनिर्भरता की मिसाल
उत्तराखंड के आंगन तक सीमित रहने वाली यह ऐपण कला आज पूजा कार्की के हुनर से राष्ट्रीय पहचान बना रही है। दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों से उनके बनाए ऐपण थाली और चौकियों की भारी मांग आ रही है।
पूजा कार्की का यह सफर दिखाता है कि यदि मन में निष्ठा हो, तो गांव की माटी से उकेरी गई कला पूरे देश का दिल जीत सकती है। उनका यह कार्य क्षेत्र की अन्य महिलाओं के लिए स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता का एक नया मार्ग खोल रहा है।

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कलाकृतियों की प्राप्ति एवं संपर्क सूत्र

​यदि आप भी पूजा कार्की द्वारा निर्मित पारंपरिक कुमाऊंनी ऐपण कलाकृतियां, हस्तनिर्मित पूजा थाली, चौकियां, सजावटी बर्तन, नामपट्ट या अन्य कलात्मक सामग्रियां मंगवाना चाहते हैं अथवा अपनी पसंद अनुसार तैयार करवाना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए नंबर पर संपर्क कर सकते हैं:

​संपर्क सूत्र: +91 98978 43030

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