स्मृतियों में शेष: बिन्दुखत्ता के संघर्षों की गवाह और ममता की मूरत, 93 वर्षीय आनंदी जोशी का गोलोक गमन

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स्मृतियों में शेष: बिन्दुखत्ता के संघर्षों की गवाह और ममता की मूरत, 93 वर्षीय आनंदी जोशी का गोलोक गमन

बिन्दुखत्ता के इतिहास के पन्नों में आज एक बेहद दुखद अध्याय जुड़ गया है। बिन्दुखत्ता की शुरुआती बसासत की गवाह रहीं, संघर्षों की तपिश में कुंदन बनकर चमकने वालीं राजीव नगर निवासीनी 93 वर्षीय वयोवृद्ध मातृशक्ति आनंदी जोशी जी का आज निधन हो गया है। उनका जाना केवल एक जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक पूरे युग, एक आदर्श और पहाड़ की उस अदम्य जिजीविषा का अवसान है, जिसने बंजर को भी अपने पसीने से सींचकर आबाद किया था।
संघर्ष, सेवा और समर्पण की अद्भुत गाथा
मूल रूप से बागेश्वर जनपद के गरुड़ की रहने वाली आनंदी जी बसासत के शुरुआती और सबसे कठिन दौर में ही बिन्दुखत्ता आ गई थीं। उनका जीवन किसी महाकाव्य से कम नहीं था, जिसमें संघर्षों की अद्भुत गाथा के साथ-साथ मानवीय गुणों की बेमिसाल सुगंध रची-बसी थी।
पहाड़ की माटी और अपनी संस्कृति से उनका अथाह प्रेम उनके हर विचार और कार्य में झलकता था। वे केवल अपने परिवार के लिए नहीं जीती थीं, बल्कि पड़ोस और समाज के सुख-दुख में हमेशा एक मजबूत स्तंभ की तरह खड़ी रहती थीं। उनका जीवन अत्यधिक अनुशासित, मर्यादित और कर्तव्यनिष्ठ था। बिन्दुखत्ता को बसते हुए देखना और उसके हर संघर्ष में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना, उन्हें एक साधारण महिला से एक आदर्श मार्गदर्शक बनाता था।
संस्कारों का वटवृक्ष: एक भरा-पूरा परिवार
आनंदी जी अपने पीछे एक ऐसा भरा-पूरा परिवार छोड़ गई हैं, जो उनके दिए गए उच्च आदर्शों और संस्कारों की मजबूत नींव पर खड़ा है। वे अपने पीछे तीन पुत्रों— भुवन चन्द्र जोशी, जगदीश चन्द्र जोशी, और दिनेश चन्द्र जोशी— सहित चार पुत्रियों और नाती-पोतों का एक विशाल परिवार छोड़ गई हैं।
मां की कोख और उनके आंचल की छांव ने परिवार को जो संस्कार दिए, वह आज भी उनमें जीवित हैं। उनके सबसे बड़े पुत्र भुवन चन्द्र जोशी जी ने अपनी माता से ही प्रेरणा लेकर जीवन में कड़ा संघर्ष किया है और वे भी एक अत्यंत संघर्षशील व्यक्तित्व के धनी माने जाते हैं। शेष दोनों पुत्र जगदीश जी व दिनेश जी तथा समूचा परिवार आज भी माता आनंदी जी के संस्कारों की उसी छत्रछाया से सुशोभित और पल्लवित है। उनके द्वारा रोपा गया संस्कारों का यह वटवृक्ष आज पूरे समाज को शीतलता प्रदान कर रहा है।
कर्तव्य पथ पर अंतिम सांस तक, चारों ओर शोक की लहर
आनंदी जोशी जी उन विरली आत्माओं में से थीं जो भारतीय दर्शन के उस परम सत्य को भली-भांति जानती थीं कि शरीर नश्वर है और आत्मा अमर। इसी आध्यात्मिक समझ ने उनके हृदय में लोक कल्याण और परोपकार की भावना को कूट-कूट कर भर दिया था। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी निष्ठा के साथ किया।
उनके निधन का समाचार फैलते ही पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई है। तमाम राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संगठनों से जुड़े लोगों का उनके आवास पर आना और शोक संवेदनाएं व्यक्त करने का क्रम लगातार जारी है। हर आंख नम है और हर जुबान पर बस उसी मां की ममतामयी स्मृतियां हैं।
अंतिम विदाई:माता आनंदी जोशी जी का अंतिम संस्कार कल (सोमवार) को रानीबाग स्थित चित्रशिला घाट पर पूरे हिंदू रीति-रिवाजों के साथ किया जाएगा। प्रातः 8 बजे अन्तिम यात्रा उनके आवास से निकलेगी
शरीर पंचतत्व में विलीन हो जाएगा, लेकिन बिन्दुखत्ता की आबोहवा में उनका संघर्ष, उनकी ममता और उनके आदर्श हमेशा एक प्रेरणा बनकर अमर रहेंगे। विनम्र श्रद्धांजलि!

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