यादों की धुंध में आज भी चमकती है उस ब्रह्मलीन संत की दिव्य वाणी

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लालकुआँ/ बिन्दुखत्ता महात्मा परमानन्द जी अब ब्रह्मलीन (शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं) हैं, और उनके विचार आज भी उनके अनुयायियों का मार्गदर्शन कर रहे हैं।

​आध्यात्मिक चेतना का प्रकाश स्तंभ:

बिन्दुखत्ता का हंस प्रेम योग आश्रम और ब्रह्मलीन महात्मा परमानन्द जी के अनमोल विचार
​उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में स्थित बिन्दुखत्ता का हंस प्रेम योग आश्रम दशकों से आध्यात्मिक जगत में एक विशेष स्थान रखता है। यह आश्रम केवल ईंट-पत्थरों से बना ढांचा नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिक छटा का वह अलौकिक केंद्र है जहाँ से सत्संग की अनवरत गंगा बहती है। मानव उत्थान सेवा समिति के कुमाऊं प्रभारी रहे महान विद्वान और आत्मज्ञानी संत ब्रह्मलीन महात्मा श्री परमानन्द जी महाराज के सानिध्य में इस क्षेत्र ने जो आध्यात्मिक ऊंचाइयां छुईं, उसका प्रभाव आज भी यहाँ के कण-कण में महसूस किया जा सकता है।
​यद्यपि महात्मा परमानन्द जी आज भौतिक रूप में हमारे बीच उपस्थित नहीं हैं और ब्रह्मलीन हो चुके हैं, लेकिन उनके द्वारा दिए गए अमृतमय उपदेश और कर्मयोग की निष्ठा आज भी जन-समुदाय का मार्गदर्शन कर रही है। उनके प्रवचनों के मुख्य अंश मानव जीवन की दिशा तय करने वाले हैं:

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​1. अस्तित्व शरीर का नहीं, बल्कि आत्मा का है

​ब्रह्मलीन महात्मा जी का सबसे प्रबल संदेश यही था कि मनुष्य का वास्तविक अस्तित्व यह नश्वर शरीर नहीं, बल्कि उसके भीतर निवास करने वाली आत्मा है। उन्होंने सदैव इस बात पर जोर दिया कि शरीर के समाप्त हो जाने पर भी आत्मा जीवित रहती है। आत्मा अनंत और शाश्वत है, जिसे शास्त्रों में ‘आदि पुरुष’ भी कहा गया है। हर मनुष्य अचेतन रूप से अपने भीतर छिपी इस अनंत आत्मा को जानने के लिए बेचैन है, और यही मनुष्य की अंतिम नियति और यात्रा का लक्ष्य है।

​2. सत्य की खोज: बाहर नहीं, भीतर झांकें

​महात्मा जी अक्सर लोगों की इस अज्ञानता पर प्रहार करते थे कि वे ईश्वर और सत्य को बाहरी दुनिया में खोजते हैं। उनका स्पष्ट मानना था:
​”हे मानव! सत्य को कहाँ ढूंढ़ने जा रहा है? मंदिर, मस्जिद क्यों भटक रहा है? जंगलों और पहाड़ों की ऊंचाइयों या समुद्र की गहराइयों में किसे ढूंढ़ रहा है? जिसे तू जानना चाहता है, वह तेरे भीतर ही बोल रहा है।” उनके अनुसार, सुशुप्त आत्मा को जाग्रत करना ही सच्चा ‘धर्म’ है, और इसी से चेतना में मूल क्रांति आती है।

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​3. धर्म और चेतना का गहरा संबंध

​ब्रह्मलीन परमानन्द जी ने बताया कि चेतना के बिना कोई भी कर्म संभव नहीं है। इसलिए जिसका चित्त धार्मिक नहीं है, उसका कोई भी कर्म धार्मिक नहीं हो सकता। उन्होंने समाज को यह आईना भी दिखाया कि आज मनुष्य अपने स्वयं के दुखों से उतना पीड़ित नहीं है, जितना वह दूसरों के सुख से दुखी है। जब मनुष्य का ‘अहंभाव’ (Ego) सदा के लिए मिट जाता है, तभी वह धर्म और आत्मा के वास्तविक अर्थ को प्राप्त कर पाता है।

​4. शरीर ही मंदिर है और कर्म ही पूजा

​उनके द्वारा दी गई शरीर और आत्मा की व्याख्या अत्यंत गूढ़ और सुंदर थी। उन्होंने बताया:
​शरीर: यह तुम्हारा गृह (मंदिर) है।
​आत्मा: इस शरीर में विराजमान आत्मा स्वयं ‘शिव’ रूप है।
​बुद्धि: तुम्हारी बुद्धि ‘भगवती पार्वती’ है।
​प्राण: प्राण-गण तुम्हारे सेवक हैं।
​इन्द्रियां और मन: शरीर, इन्द्रियों और मन से होने वाले सभी कार्य पूजा की विविध सामग्रियां हैं।
​उनका कहना था कि निद्रा ही समाधि की स्थिति है, और हमारा चलना-फिरना ईश्वर की परिक्रमा है। जब मनुष्य इस भाव से जीवन जीता है, तो उसका हर कार्य ईश्वर की पूजा बन जाता है।
​कुल मिलाकर
​ब्रह्मलीन महात्मा परमानन्द जी महाराज ने अपने जीवन काल में जिस ‘प्रेम’ को सत्य का परम आधार बताया, वह आज भी हंस प्रेम योग आश्रम की नींव है। उनका मानना था कि प्रेम से ही भक्ति का दीप प्रज्वलित होता है और जब यह प्रेम जागृत होता है, तो प्राणी की आंखों में परमात्मा की झलक दिखाई देती है। भले ही वे आज स्थूल रूप में नहीं हैं, परंतु उनके द्वारा जगाई गई ज्ञान और चेतना की यह लौ उनके भक्तों और हंस प्रेम योग आश्रम के माध्यम से सदैव प्रज्वलित रहेगी।