किस नन्हे फनकार के सम्मोहन में बंध गया पूरा लालकुआँ? जब रामलीला के समापन पर आधी रात नहीं, भोर होते ही खुद आयोजक पहुँचे उस ‘रुद्रावतार’ के द्वार!

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लालकुआँ। शारदीय नवरात्र की रातों में जब मंच पर रोशनी की किरणें बिखरीं, तो किसी ने नहीं सोचा था कि मंच पर उतरने वाला एक नन्हा सा बालक हजारों दर्शकों की धड़कन बन जाएगा। मंचन आगे बढ़ता रहा, संवाद गूंजते रहे, लेकिन दर्शकों की निगाहें और तालियां सिर्फ एक नन्हे स्वरूप पर ठहर गईं। जिसने भी देखा, वह देखता ही रह गया—वही चपलता, वही तेज और वही बाल सुलभ अठखेलियां। मंच पर पर्दे गिर गए, उत्सव संपन्न हुआ, लेकिन रहस्य यह बना रहा कि आखिर इस नन्हे कलाकार के अभिनय का मुरीद होकर खुद रामलीला के वरिष्ठ पदाधिकारी किसके द्वार पर सम्मान का थाल लेकर पहुँचे हैं?

यह कौतूहल तब शांत हुआ जब श्री आदर्श रामलीला कमेटी के पदाधिकारी नगर के प्रतिष्ठित शिक्षाविद् शौरभ पंत एवं हिमानी पंत के आवास पर जा पहुंचे। कमेटी के पदाधिकारियों ने उनके सुपुत्र, बाल कलाकार तुषार पंत को उनके जीवंत और अद्वितीय अभिनय के लिए उनके घर जाकर विशेष रूप से सम्मानित किया।

मंच पर जीवंत हुआ पवनपुत्र का बाल स्वरूप

श्री आदर्श रामलीला कमेटी के तत्वावधान में आयोजित इस वर्ष के भव्य मंचन में तुषार पंत ने ‘बाल हनुमान’ की भूमिका निभाई थी। तुषार ने जिस सहजता, ऊर्जा और भक्ति-भाव से बाल हनुमान के चरित्र को मंच पर उतारा, उसने न केवल दर्शकों को भावविभोर किया, बल्कि पूरी रामलीला का सबसे बड़ा आकर्षण केंद्र भी बन गया।

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गदा संभालने का अंदाज हो, सूर्यदेव की ओर छलांग लगाने की बाल लीला हो या फिर वानर सेना के बीच चंचल भाव-भंगिमाएं—तुषार के हर हाव-भाव में दर्शक साक्षात पवनपुत्र की बाल छवि की अनुभूति कर रहे थे। बाल कलाकार के इस असाधारण अभिनय की सर्वत्र प्रशंसा हुई और समिति ने निर्णय लिया कि इस विलक्षण प्रतिभा को सीधे उनके घर जाकर सम्मानित किया जाए।

पदाधिकारियों ने तुषार को स्मृति-चिह्न, अंगवस्त्र एवं आशीर्वाद भेंट करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। इस अवसर पर समिति के सदस्यों ने कहा कि हमारी सनातन संस्कृति और रामलीला जैसी पावन परंपराओं को अगली पीढ़ी जिस समर्पण से आगे बढ़ा रही है, तुषार उसका अद्भुत उदाहरण हैं। वहीं, शिक्षाविद् शौरभ पंत व हिमानी पंत ने रामलीला कमेटी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह सम्मान उनके पुत्र के लिए जीवनपर्यंत प्रेरणा का स्रोत रहेगा।

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प्रभु श्री राम की लीला में ‘बाल हनुमान’ का आध्यात्मिक एवं नाटकीय महत्व

रामकथा में यूं तो संकटमोचन हनुमान जी का पराक्रम लंका दहन से लेकर संजीवनी बूटी लाने तक चरम पर दिखाई देता है, परंतु बाल हनुमान का प्रसंग इस महागाथा की वह पावन नींव है जहां से एक दिव्य लीला का सूत्रपात होता है:

  • असीम शक्ति और बाल सुलभ सरलता का संगम: बाल हनुमान का स्वरूप यह सिखाता है कि जहां परम बल और ज्ञान हो, वहां अहंकार नहीं बल्कि बालवत निश्छलता होनी चाहिए। सूर्य को मीठा फल समझकर निगलने की उनकी बाल लीला दर्शाती है कि उनके भीतर जन्मजात वह तेज था, जो ब्रह्मांड के सबसे बड़े संतापों को हरने में सक्षम था।
  • देवताओं के आशीर्वाद का पुंज: बाल हनुमान की लीलाओं के दौरान ही देवराज इंद्र, पवनदेव और ब्रह्मा जी सहित समस्त देवताओं ने उन्हें अजेयता, अमृत्व और अद्वितीय पराक्रम के वरदान दिए थे। यही वह प्रसंग है जो भविष्य में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के काज संवारने वाले ‘अतुलितबलधामं’ को तैयार करता है।
  • भक्ति और समर्पण की पूर्वपीठिका: शास्त्रों में मान्यता है कि बालपन में महर्षियों के आश्रम में नटखट लीलाएं करते हुए हनुमान जी को अपनी शक्तियों को विस्मृत रहने का जो श्राप मिला, वह वस्तुतः प्रभु श्री राम के चरणों में उनके परम दास और अनन्य भक्त बनने की पूर्व-योजना थी। जब शक्ति का अभिमान शून्य होता है, तभी संपूर्ण समर्पण जन्म लेता है।
  • मंचन में रस और आनंद का संचार: रामलीला के गंभीर, मर्यादा और संघर्ष से भरे कथानक के बीच बाल हनुमान का आगमन दर्शकों के मन में वात्सल्य और हास्य रस का संचार करता है। यह प्रसंग बच्चों से लेकर वृद्धों तक के चेहरों पर सहज मुस्कान बिखेर देता है।
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लालकुआँ के मंच पर तुषार पंत ने बाल हनुमान के इसी पावन, प्रेरक और ऊर्जावान स्वरूप को जीवंत कर यह सिद्ध कर दिया कि यदि अभिनय में निष्ठा और श्रद्धा हो, तो मंच केवल काष्ठ का ढांचा नहीं रहता, बल्कि साक्षात त्रेतायुग की पावन भूमि बन जाता है।

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