विंध्यवासिनी/मिर्जापुर। माँ विंध्यवासिनी की अलौकिक महिमा का गुणगान करते हुए उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी एवं वरिष्ठ समाज सेविका भावना पाण्डे ने कहा कि माँ विंध्यवासिनी सर्व सौभाग्य प्रदान करने वाली परम कल्याणी स्वरूपा देवी हैं। उनकी आराधना का फल अतुलनीय है और उनका दिव्य दरबार देश के परम जागृत शक्तिपीठों में सर्वोच्च स्थान रखता है।
भावना पाण्डे ने कहा कि जो श्रद्धालु निर्मल भाव, पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा के साथ माँ विंध्यवासिनी की उपासना करता है, वह माँ की कृपा से परम कल्याण का अधिकारी बनता है और दुर्लभ मोक्ष को प्राप्त करता है। उन्होंने बताया कि इस कलिकाल में माँ की आराधना प्रत्येक मानव के लिए अनिवार्य मानी गई है, क्योंकि यही साधना जीवन को सत्य, सेवा और सद्भाव की दिशा में अग्रसर करती है।
उन्होंने बताया कि विंध्याचल क्षेत्र में देवी तीन दिव्य रूपों में विराजमान हैं। यहाँ माँ विंध्यवासिनी, जिन्हें भक्तजन कौशिकी देवी के नाम से भी जानते हैं, दूसरा मातेश्वरी महाकाली और तीसरा अष्टभुजा देवी का भव्य मंदिर स्थित है। इस प्रकार एक ही क्षेत्र में देवी के तीन स्वरूपों के दर्शन का दुर्लभ सौभाग्य भक्तों को प्राप्त होता है।
भावना पाण्डे ने कहा कि अनेक पुराणों में विंध्य क्षेत्र का अत्यंत सुंदर और दिव्य वर्णन मिलता है। देश के प्रमुख 108 शक्तिपीठों में माँ विंध्यवासिनी का यह पवित्र धाम विशिष्ट स्थान रखता है। जगत के कल्याण हेतु विराजमान भगवान विंध्येश्वर महादेव का मंदिर भी इसी क्षेत्र में स्थित है। विंध्याचल की पहाड़ियों में कल-कल करती माँ गंगा की पावन धारा के सानिध्य में स्थित यह शक्तिपीठ स्वयं जगत माता की ओर से भक्तजनों को दिया गया दिव्य वरदान है। यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक वातावरण आगंतुकों को स्वतः ही अपनी ओर आकर्षित कर लेता है।
उन्होंने बताया कि त्रिकोण यंत्र पर स्थित देवी विंध्यवासिनी की पूजा तीन रूपों—महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती—के स्वरूप में की जाती है। विंध्य पर्वत की त्रिकोण यात्रा को समस्त मनोरथों को पूर्ण करने वाली यात्रा कहा गया है। यहाँ विराजमान माँ मधु और कैटभ नामक महादैत्यों का संहार करने वाली शक्ति स्वरूपा देवी के रूप में भी पूजित हैं। मान्यता है कि जो व्यक्ति इस पावन भूमि पर तपस्या करता है, उसे शीघ्र ही अपनी साधना का फल प्राप्त होता है। यही कारण है कि विभिन्न देवी-देवताओं के साधक और उपासक सर्वप्रथम माँ विंध्यवासिनी की ही साधना करते हैं।
भावना पाण्डे ने कहा कि माँ का यह दरबार आदि-अनादि काल से जागृत है और इस क्षेत्र का अस्तित्व शाश्वत माना गया है। माँ का स्मरण समस्त संकल्पों को सिद्धि प्रदान करता है। ब्रह्मा जी इनकी शक्ति से सृष्टि की रचना करते हैं, विष्णु जी पालन करते हैं और महादेव संहार का कार्य संपन्न करते हैं।
गंगा नदी के पावन तट पर स्थित माँ विंध्यवासिनी का यह प्राचीन मंदिर बस्ती के मध्य एक ऊँचे, सुनहरे स्थान पर स्थित है। मंदिर में माँ भगवती दिव्य और मनोहारी स्वरूप में विराजमान हैं। मंदिर के पश्चिम भाग में एक सुंदर प्रांगण है, जिसके समीप माँ की एक भव्य मूर्ति स्थापित है। पास ही दूसरे मंडप में खर्परेश्वर महादेव विराजमान हैं, जो इस धाम की आध्यात्मिक गरिमा को और अधिक बढ़ाते हैं।
उन्होंने कहा कि योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण की बहिन, कृष्णानुजा के रूप में पूजित इस देवी की जिस पर कृपा हो जाती है, वह सहज ही भगवान श्रीकृष्ण की कृपा का पात्र बन जाता है। इसी क्षेत्र में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित माता मंगला देवी का मंदिर भी स्थित है। साथ ही हनुमान मंदिर, शीतला मंदिर, सप्तसागर सहित अनेक महातीर्थ इस पावन भूमि को और भी पुण्यमय बनाते हैं।
लोक-मंगल की कामना के साथ किए माँ विंध्यवासिनी के दर्शन
उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी एवं वरिष्ठ समाज सेविका भावना पाण्डे ने माँ विंध्यवासिनी के दर्शन कर देश, समाज और समस्त मानवता के कल्याण की कामना की। उन्होंने कहा कि “माँ का आशीर्वाद केवल व्यक्तिगत सुख-समृद्धि के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज में शांति, सद्भाव, करुणा और सेवा भावना के प्रसार के लिए होना चाहिए।”
उन्होंने प्रार्थना की कि माँ विंध्यवासिनी सभी को सद्बुद्धि, सद्कर्म और सेवा के पथ पर अग्रसर करें, ताकि समाज से दुःख, अन्याय और पीड़ा का अंत हो तथा प्रेम, करुणा और मानवता का उजास हर दिशा में फैल सके।
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