बाणासुर की माता ‘कोटवी’ का महा-रहस्य: अद्भूत गुफा मंदिर जहाँ गूंजती है ‘ भक्ति की झंकार
“शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे।**
**सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥”
देवभूमि उत्तराखंड के सीमांत जनपद पिथौरागढ़ की शांत वादियों और अभेद्य पहाड़ियों में कई ऐसे रहस्य और अलौकिक शक्तियां छिपी हैं, जिनका उल्लेख सीधे हमारी प्राचीन पुस्तकों और पुराणों में मिलता है। पिथौरागढ़ नगर के समीप स्थित घुंसेरा गांव की एक रहस्यमयी प्राकृतिक गुफा में विराजमान ‘माता कोटवी देवी’ का मंदिर केवल एक देवालय नहीं है, बल्कि यह वह जागृत शक्तिपीठ है पौराणिक कथाओं में माता कोटवी को परम प्रतापी असुर सम्राट बाणासुर की माता के रूप में पूजा जाता है।
रामायण से लेकर कृष्ण-युद्ध तक बाणासुर और माता कोटवी का प्रभाव
बाणासुर का प्रताप इतना विशाल था कि आनन्द रामायण और कम्बन रामायण जैसी प्राचीन पुस्तकों के सीता स्वयंवर प्रसंगों में भी इस हजार भुजाओं वाले असुर सम्राट का उल्लेख मिलता है। लेकिन इस अजेय योद्धा की सबसे बड़ी रक्षक स्वयं उसकी माता ‘कोटवी’ थीं। श्रीमद्भागवत और विष्णु पुराण के अनुसार, जब द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण और बाणासुर का भयंकर युद्ध हुआ, तो श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र से बाणासुर के प्राण बचाने के लिए माता कोटवी रणभूमि में साक्षात शिव-शक्ति के रूप में प्रकट हुई थीं। पिथौरागढ़ की इस गुफा में माता कोटवी का वही उग्र और परम रक्षक स्वरूप विराजमान माना जाता है।
कत्यूरी शैली की दुर्लभ पाषाण मूर्तियों से भरी इस रहस्यमयी ‘घुंसेरा गुफा’ को इसके अप्रतिम शिल्प के कारण ‘विश्वकर्मा की गुफा’ भी कहा जाता है।
आसपास के प्रमुख तीर्थ स्थल: एक आध्यात्मिक श्रृंखला
माता कोटवी के दर्शन के साथ-साथ इस क्षेत्र में कई अन्य प्राचीन और जाग्रत देवस्थान हैं, जो मानसखण्ड की महिमा को दर्शाते हैं:
असुरचुल मंदिर: घुंसेरा गांव के ठीक ऊपर पहाड़ी की चोटी पर स्थित यह मंदिर लोक देवता ‘असुर’ को समर्पित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसका सीधा संबंध बाणासुर के परिवार से है। यहाँ से हिमालय की चोटियों का विहंगम दृश्य दिखाई देता है।
मोस्टामानू मंदिर: पिथौरागढ़ नगर के समीप स्थित यह मंदिर वर्षा और न्याय के देवता मोस्टा को समर्पित है। यह क्षेत्र की कृषि और लोक-आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है।
माँ उल्का देवी मंदिर:पिथौरागढ़ नगर की रक्षक मानी जाने वाली माता उल्का देवी का मंदिर आस्था का प्रमुख केंद्र है। यह स्थान नगर के सुंदर दृश्यों के लिए भी जाना जाता है।
थल केदार: आध्यात्मिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण यह शिव मंदिर एक ऊंची चोटी पर स्थित है। स्कंद पुराण के मानसखण्ड में इसे केदारनाथ के समान ही फलदायी बताया गया है।
नकुलेश्वर मंदिर: खजुराहो शैली में निर्मित यह प्राचीन शिव मंदिर अपनी बेजोड़ मूर्तिकला के लिए प्रसिद्ध है और घुंसेरा के पुरातात्विक महत्व के समान ही प्राचीन है।
कैसे पहुँचें?
सड़क मार्ग: पिथौरागढ़ मुख्य नगर से घुंसेरा गांव मात्र 5-7 किमी दूर है। यहाँ के लिए स्थानीय टैक्सी आसानी से उपलब्ध हैं।
रेल मार्ग: निकटतम रेलवे स्टेशन टनकपुर (145 किमी) है, जहाँ से बस या टैक्सी ली जा सकती है।
“स्कंद पुराण के मानसखण्ड में सोर घाटी और असुरचूल महात्म्य के अंतर्गत आने वाले आसपास के तीर्थो के वर्णन में इस देवी का वर्णन आता है
मानसखण्ड के पन्नों में सोर घाटी शाल्मल पर्वत की ‘घुन्स्यारी देवी’ और श्यामा नदी का महात्म्य
स्कंद पुराण के मानसखण्ड का 131वां और 132वां अध्याय देवभूमि पिथौरागढ़ (सोर क्षेत्र) की आध्यात्मिक और भौगोलिक पहचान का सबसे बड़ा प्रामाणिक साक्ष्य है। इन दोनों अध्यायों के गूढ़ अध्ययन से ‘सातसिलिंग’, ‘घुन्स्यारी देवी’, ‘असुरचूड़’ और इस क्षेत्र की पावन नदियों का सदियों पुराना इतिहास एकदम जीवंत हो उठता है।
शाल्मल पर्वत, ‘सातसिलिंग’ और देवाल क्षेत्र की शक्ति (अध्याय 131)
मानसखण्ड के 131वें अध्याय (‘शाल्मल पर्वत’ माहात्म्य) में महर्षि व्यास जी मुनियों को ‘शाल्मलाद्रि’ (शाल्मल पर्वत) की महिमा बताते हैं। इस क्षेत्र में देवगणों द्वारा पूजित ‘शतलिङ्ग’ की उपासना का वर्णन है। ऐतिहासिक टिप्पणियों के अनुसार, पुराणों का यह ‘शतलिङ्ग’ ही वर्तमान ‘सतसिलिङ्ग’ (सातसिलिंग) तथा ‘सलमोड़ा’ ग्रामों का सन्धिस्थल है।
इसी ‘सलमोड़ा’ ग्राम में ‘देवाल’ नामक पवित्र स्थान है। श्लोकों में स्पष्ट वर्णित है कि इस देवाल क्षेत्र की ‘शक्ति’ की पूजा करने से दुःस्वप्न और दुनिमित्त (कष्ट) नष्ट हो जाते हैं। इस अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण रहस्य यह है कि पुराण में वर्णित यह जाग्रत ‘शक्ति’ ही लोक-परंपरा में ‘घुन्स्यारी देवी’ के नाम से विख्यात है। इसी देवाल क्षेत्र के दाहिनी ओर स्थित एक गुहा (गुफा) में ‘वाराही’ देवी का वास बताया गया है, जिनकी आराधना से विजय की प्राप्ति होती है।
असुरचूड़ की जलधारा और श्यामा नदी का महा-संगम (अध्याय 132)
अध्याय 132 (‘श्यामा माहात्म्य’) में शाल्मल पर्वत के आसपास के जल-तीर्थों का अत्यंत दिव्य वर्णन है। व्यास जी बताते हैं कि शाल्मल पर्वत से निकलकर ‘शारदा’ नदी आगे चलकर ‘श्यामा’ नदी में मिल जाती है, जहाँ स्नान करने से पुत्र प्राप्ति का फल मिलता है।
इस अध्याय में क्षेत्र के प्राचीन भूगोल का बेहद सटीक वर्णन मिलता है। इसमें ‘बासुरी’ संगम का जिक्र है, जो ‘असुरचूड़’ (असुरचूला पर्वत) से निकलकर ‘मठगाड़’ में आकर मिलती है। इसके बाद श्रद्धालु ‘स्नानजा’ संगम और ‘शमद’ सरोवर से होते हुए ‘बटक तीर्थ’ (बटकेश्वर) में स्नान कर शिवसायुज्य (शिवत्व) प्राप्त करते हैं।
अंततः इन सभी पावन धाराओं को अपने में समेटती हुई श्यामा नदी पावन ‘सरयू’ नदी में विलीन हो जाती है। सरयू और श्यामा के इस महासंगम में स्नान करने और इस माहात्म्य को सुनने मात्र से मनुष्य के इक्कीस कुलों का उद्धार हो जाता है और उसे परम विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।
स्कंद पुराण के ये दोनों अध्याय हमारे क्षेत्रीय इतिहास का वह दर्पण हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि घुन्स्यारी (घुंसेरा) गुफा की जाग्रत देवी, सातसिलिंग का शिवालय, असुरचूला (असुरचूड़) की पहाड़ियां और यहाँ की पावन नदियां केवल कुछ भौगोलिक स्थान मात्र नहीं हैं; बल्कि ये सदियों से ऋषियों और देवगणों द्वारा पूजित सिद्ध महातीर्थ हैं।
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