ब्रह्मास्त्र की अधिष्ठात्री और शक्तियों का महा-रहस्य: दतिया का वो जाग्रत दरबार, जहाँ आज भी थर्राते हैं झूठी सौगंध खाने वाले!

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[विशेष आध्यात्मिक रिपोर्ट | दतिया, मध्य प्रदेश]

मध्य प्रदेश के हृदय में बसा ‘दतिया’ महज एक शहर नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की सर्वोपरि शक्तियों का एक ऐसा रहस्यमयी और जाग्रत केंद्र है, जिसकी जड़ें सीधे द्वापर युग और महाभारत के महायुद्ध से जुड़ी हैं। यह वह पावन धाम है, जहाँ ब्रह्मास्त्र विद्या की अधिष्ठात्री देवी माई पीताम्बरा (बगलामुखी) साक्षात विराजमान हैं। राजसत्ता, विजय और शत्रुओं के स्तम्भन की देवी माँ पीताम्बरा के इस दरबार में जो आता है, वह कभी खाली हाथ नहीं लौटता।

आइए, सत्य साधक श्री विजेन्द्र पाण्डेय गुरुजी के वचनों और आध्यात्मिक मान्यताओं के आधार पर, इस अलौकिक शक्तिपीठ के उन अनसुने रहस्यों को जानते हैं, जो इसे पूरे विश्व में अद्वितीय बनाते हैं।

महाभारत काल का रहस्य और ‘दंतवक्र’ का इतिहास

दतिया शहर का इतिहास रहस्यों की चादर ओढ़े हुए है। इसका नाम और अस्तित्व महाभारत काल की स्मृतियों को अपने आंचल में समेटे हुए है।

 दंतवक्र नगरी:पौराणिक आख्यानों के अनुसार, दतिया का प्राचीन नाम महाभारत कालीन राजा ‘दंतवक्र’ के नाम पर पड़ा था। दंतवक्र राजा शिशुपाल का परम मित्र था।

 भगवान श्रीकृष्ण की आराध्या:माँ बगलामुखी भगवान श्रीकृष्ण की भी आराध्या रही हैं। महाभारत के युद्ध में धर्म की रक्षा और शत्रुओं के नाश के लिए स्वयं श्रीकृष्ण ने माँ की स्तुति की थी, इसी कारण इन्हें केशवस्तुता’ (केशव द्वारा वंदित) भी कहा जाता है।

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वनखंडेश्वर महादेव: जहाँ झूठी कसम खाना है मृत्यु के समान!

पीताम्बरा पीठ परिसर में ही स्थित  वनखंडेश्वर महादेव मंदिर’ इस धाम के सबसे बड़े रहस्यों में से एक है।

 अश्वत्थामा की तपोस्थली: यह भगवान शिव का अत्यंत प्राचीन मंदिर है। मान्यता है कि यह स्थान महाभारत के अमर योद्धा अश्वत्थामा की तपोस्थली रहा है। उन्होंने यहाँ भगवान शिव की घोर आराधना की थी।

 झूठी सौगंध का खौफ: आज भी दतिया और आसपास के क्षेत्रों में यह अटूट मान्यता है कि इस देव दरबार में कोई भी व्यक्ति झूठी कसम खाने का दुस्साहस नहीं कर सकता। वनखंडेश्वर महादेव के समक्ष ली गई झूठी सौगंध महा-अनर्थ और विनाश का कारण बनती है। यहाँ न्याय तंत्र और अदालतों से बाहर भी लोग इस दरबार में आकर सच उगल देते हैं।

एक सघन वन से जाग्रत शक्तिपीठ बनने की कहानी

दश महाविद्याओं में पंचम शक्ति ‘बगलामुखी’ के इस पीताम्बरा स्वरूप की स्थापना का इतिहास भी अद्भुत है।

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 राष्ट्रगुरु का संकल्प: वर्ष 1920 में महान सिद्ध संत और लोक-कल्याणकारी युगपुरुष **पूज्यपाद राष्ट्रगुरु अनन्त श्री स्वामी जी महाराज (स्वामीजी महाराज) ने इस पीठ की नींव रखी थी।

 हिंसक पशुओं का शांत निवास: शुरुआती दौर में यह क्षेत्र एक अत्यंत सघन और भयानक वन था। लेकिन स्वामीजी महाराज के तपोबल और माँ की ऊर्जा का ऐसा चमत्कार था कि दिन के समय भी भयानक हिंसक वन्य जीव आश्रम में आते थे और महाराज के सानिध्य में शांत भाव से घंटों बैठे रहते थे।

 अलौकिक वातावरण: हरे-भरे वृक्षों, पक्षियों के कलरव और फूलों पर मंडराते भंवरों की गूंज के बीच, सघन जंगल से शुरू हुई यह साधना स्थली आज विश्व का एक ऐसा महातीर्थ बन चुकी है, जहाँ के कण-कण में राष्ट्रगुरु स्वामी जी महाराज की यादें महकती हैं।

चमत्कार: जब माँ के यज्ञ ने रोक दिया था चीन का युद्ध!

दतिया पीताम्बरा पीठ के रहस्य केवल पौराणिक नहीं, बल्कि आधुनिक इतिहास में भी दर्ज हैं।

 वर्ष 1962 का युद्ध: जब भारत पर चीन ने हमला किया था और देश गहरे संकट में था, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के आग्रह पर स्वामीजी महाराज ने इसी पीठ में राष्ट्र रक्षा के लिए 51 कुंडीय ‘राष्ट्र रक्षा यज्ञ’ (बगलामुखी महायज्ञ) का आयोजन किया था। यज्ञ की पूर्णाहुति के दिन ही चमत्कारिक रूप से चीन ने एकतरफा युद्धविराम की घोषणा कर दी थी। आज भी वह यज्ञशाला यहाँ मौजूद है।

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देश-दुनिया की अटूट आस्था का केंद्र

ग्वालियर से कुछ किलोमीटर की दूरी पर और उत्तर प्रदेश (झाँसी) की सीमा से मात्र 15 किलोमीटर दूर स्थित दतिया का यह दरबार आज वैश्विक आस्था का महासागर है। यहाँ का प्राचीन किला भी दतिया की ऐतिहासिकता की गवाही देता है।

माँ पीताम्बरा के इस दरबार में प्रवासी उत्तराखण्डवासियों (देहरादून, हल्द्वानी) के अलावा दिल्ली, लखनऊ, मुंबई जैसे महानगरों और विदेशों से भी भक्त निरंतर आते हैं। राजनेता हों या आम इंसान, न्याय और विजय की चाह में हर कोई माँ की चौखट पर नतमस्तक होता है। सत्य साधक श्री विजेन्द्र पाण्डेय गुरुजी के शब्दों में, *”माई की महिमा अपरम्पार है, यहाँ भक्त जो मांगता है, वह उसे कई गुना होकर मिलता है।”*

(मूल स्रोत: रमाकांत पंत की रिपोर्ट)

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