बादलों के पार, हिमालय की गोद में देवभूमि का चमत्कारी धाम: ‘छठ की भगवती’ मां चिल्ठा देवी का भव्य मंदिर
बागेश्वर : देवभूमि उत्तराखंड का कण-कण ईश्वरीय कृपा और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत है। इसी देवभूमि के कुमाऊं क्षेत्र में, बागेश्वर जिले की मल्ला दानपुर घाटी में एक ऐसा अलौकिक और पवित्र धाम स्थित है, जहां प्रकृति स्वयं माता के चरणों में शीश नवाती है। हम बात कर रहे हैं कपकोट क्षेत्र के सुपी गांव की ऊंची सुरम्य पहाड़ियों पर समुद्र तल से लगभग 2500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित माँ चिल्ठा देवी (चिल्ठेशवरी देवी) मंदिर की।
कुमाऊं के प्रमुख शक्तिपीठों में गिने जाने वाले इस दरबार में माँ नंदा भगवती की पूजा ‘छठ की भगवती’ के रूप में की जाती है। शांत वातावरण और हिमालय की बर्फीली चोटियों के बीच बसा यह मंदिर आस्था और प्रकृति का सबसे अद्भुत संगम है।
पौराणिक महत्व और ‘छठ की भगवती’ की महिमा
स्थानीय मान्यताओं और पौराणिक कथाओं के अनुसार, माँ चिल्ठा देवी का सीधा संबंध उत्तराखंड की कुलदेवी माँ नंदा देवी से माना जाता है। कहा जाता है कि इसी पवित्र स्थान पर एक गुफा में माँ नंदा भगवती ने कठोर तपस्या की थी। आज भी उसी तपोबल और ईश्वरीय शक्ति से इस पूरे क्षेत्र की रक्षा होती है। कई श्रद्धालु इसे देवी सती के 52 शक्तिपीठों की ऊर्जा से भी जोड़कर देखते हैं। मान्यता है कि जो भी भक्त यहां सच्चे मन से आता है, मां उसकी हर मुराद पूरी करती हैं और मन के सारे नकारात्मक विचारों को नष्ट कर देती हैं। विशेषकर नवरात्रि के पावन पर्व पर यहां भक्तों का भारी सैलाब उमड़ता है।
दंत कथाओं में माँ का रौद्र रूप:
शुम्भ-निशुम्भ वध की अमर गाथा
कुमाऊं की समृद्ध दंत कथाओं और लोक मान्यताओं में इस पवित्र धाम का संबंध राक्षसों के संहार से भी गहरा जुड़ा हुआ है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब शुम्भ और निशुम्भ नामक महापराक्रमी दैत्यों ने स्वर्ग और पृथ्वी पर हाहाकार मचा दिया था और देवताओं को उनके लोक से खदेड़ दिया था, तब देवताओं ने हिमालय की इन्हीं कंदराओं में आकर आदिशक्ति की स्तुति की थी।
मान्यता है कि देवताओं की पुकार सुनकर माता ने अत्यंत रौद्र और शक्तिशाली रूप धारण किया था। इन्हीं दुर्गम और पवित्र पहाड़ियों की ऊर्जा से जुड़कर माँ भगवती ने शुम्भ-निशुम्भ और उनकी दानव सेना का अंत कर तीनों लोकों को भयमुक्त किया था। दानवों के वध के बाद माता का जो शांत और कल्याणकारी स्वरूप यहां स्थापित हुआ, वही आज माँ चिल्ठा देवी के रूप में पूजा जाता है। यह मंदिर बुराई पर अच्छाई की जीत और मातृशक्ति के उसी प्रचंड प्रताप का जीवंत प्रमाण है।
मंदिर परिसर और आसपास के छोटे मंदिर समूह (देव थान)
माँ चिल्ठा देवी का यह दरबार केवल एक एकाकी मंदिर नहीं है, बल्कि इसके आसपास कई छोटे-छोटे मंदिर और देव थान (देवताओं के स्थान) स्थित हैं, जो एक सम्पूर्ण आध्यात्मिक मण्डल का निर्माण करते हैं। जब भक्त मुख्य मंदिर की ओर बढ़ते हैं, तो उन्हें कई अन्य देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है जिनमें क्षेत्रपाल भैरव कलवान व दाणू देवता आदि है
भक्त विरेन्द्र कोरंगा की जुबानी: “बिना माँ के बुलावे के यहां आना संभव नहीं”
माँ चिल्ठा देवी के परम भक्त और आस्थावान विरेन्द्र कोरंगा माता की महिमा का बखान करते हुए भावविभोर हो जाते हैं। वे कहते हैं,
” माँ चिल्ठा देवी का यह दरबार कोई साधारण स्थान नहीं है। 8 किलोमीटर की खड़ी और दुर्गम चढ़ाई को पार करना केवल शारीरिक बल का काम नहीं है। जब तक माँ ‘छठ की भगवती’ का बुलावा न हो और हृदय में सच्ची भक्ति न हो, कोई इस डगर को पार नहीं कर सकता। माँ की शक्ति ही हमें ऊपर खींचती है। जब हम थकने लगते हैं, तो माँ का जयकारा, आसपास के छोटे देव थानों की ऊर्जा और पहाड़ों की ठंडी हवाएं हमें नई ऊर्जा से भर देती हैं। जो एक बार माँ के इस भव्य स्वरूप के दर्शन कर लेता है, उसका जीवन धन्य हो जाता है। मां अपने भक्तों को कभी खाली हाथ नहीं लौटातीं।”
प्रकृति का स्वर्ग: हिमालय की श्रृंखलाएं और बुरांश के जंगल
मंदिर तक का सफर किसी स्वर्ग की यात्रा से कम नहीं है। यात्रा के दौरान रास्ते में लाल-गुलाबी बुरांश (रोडोडेंड्रन) के घने जंगल और मखमली घास के सुंदर बुग्याल मन मोह लेते हैं। मंदिर प्रांगण में पहुंचते ही जो दृश्य आंखों के सामने आता है, वह जीवन भर के लिए स्मृति में छप जाता है। यहां से हिमालय की विशाल श्रृंखलाओं का 360 डिग्री का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। पिंडारी ग्लेशियर, पंचाचूली चोटी, नंदा देवी, नंदा कोट, शिखर मंदिर और दानपुर की मनमोहक घाटी के दर्शन एक साथ इस स्थान से किए जा सकते हैं।
कैसे पहुंचें माँ के दरबार?
माँ चिल्ठा देवी का मंदिर आस्था की कसौटी पर अपने भक्तों को परखता है। यहां पहुंचने का मार्ग इस प्रकार है:
सड़क यात्रा: सबसे पहले बागेश्वर शहर से सुपी गांव तक की 35 किलोमीटर की दूरी जीप या निजी वाहन से तय करनी होती है।
पैदल ट्रेक: सुपी गांव से मंदिर तक 8 किलोमीटर का एक रोमांचक और खड़ी चढ़ाई वाला ट्रेक शुरू होता है, जिसे पूरा करने में 4 से 6 घंटे का समय लगता है।
नजदीकी रेलवे स्टेशन: काठगोदाम (लगभग 180 किमी दूर)।
नजदीकी हवाई अड्डा: पंतनगर (लगभग 220 किमी दूर)। वहां से बागेश्वर के लिए आसानी से टैक्सी या बस मिल जाती है।
कुल मिलाकर माँ चिल्ठा देवी और उसके आसपास फैले छोटे मंदिरों का यह समूह मात्र पत्थरों का ढांचा नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत की जीवंत धड़कन है। अगर आप भी जीवन की भागदौड़ से दूर, असीम शांति और ईश्वरीय अनुभूति की तलाश में हैं, तो माँ ‘छठ की भगवती’ का यह धाम दोनों बाहें फैलाए आपका इंतजार कर रहा है।
माँ के 108 पावन नाम:
माँ चिल्ठा देवी, माँ चंडी, माँ चंडिका, माँ चामुंडा, माँ चंद्रघंटा, माँ चिन्मयी, माँ चैतन्यमयी, माँ चंद्रमुखी, माँ चित्रा, माँ चंद्रभागा, माँ चर्चिका, माँ चारुशीला, माँ चित्रिणी, माँ चंडमुंडविनाशिनी, माँ चक्रधारिणी, माँ चक्रेश्वरी, माँ चतुर्भुजा, माँ चंद्रलेखा, माँ चंद्रप्रभा, माँ चंद्रिका, माँ चंद्रकांति, माँ चंद्रमौली, माँ चंद्रवदना, माँ चंद्रावली, माँ चंद्रोदया, माँ चारुहासिनी, माँ चारुनेत्रा, माँ चारुरंगी, माँ चारुमति, माँ चारुरूपा, माँ चारुवासना, माँ चारुंगी, माँ चित्रलेखा, माँ चित्ररूपा, माँ चित्रमालिनी, माँ चित्रगंधा, माँ चित्रांगदा, माँ चित्रासना, माँ चिदानंदमयी, माँ चिद्रूपिणी, माँ चित्शक्ति, माँ चिन्मयानंदवर्धिनी, माँ चेतना, माँ चिंतामणि, माँ चतुरानना, माँ चतुर्वर्गफलप्रदा, माँ चतुर्वेदस्वरूपी, माँ चंडनायिका, माँ चंडरूपा, माँ चंडवती, माँ चंडेश्वरी, माँ चंडवेगवती, माँ चंडोदरा, माँ चंपकमालिनी, माँ चंपावती, माँ चक्रनायिका, माँ चक्रवाकिनी, माँ चक्रिणी, माँ चक्रवर्तिनी, माँ चंद्रमण्डलमध्यगा, माँ चंद्रसहोदरी, माँ चंद्रकला, माँ चंद्रनिभा, माँ चंद्रपुत्री, माँ चंद्रस्वरूपा, माँ चंद्रकिरणा, माँ चंद्रज्योति, माँ चंद्रबिम्बा, माँ चारुगंगी, माँ चारुचंद्रा, माँ चारुवादिनी, माँ चारुकेशी, माँ चित्रकला, माँ चित्रवर्णा, माँ चित्रमयी, माँ चित्रविचित्ररूपा, माँ चिदंबरा, माँ चिदग्निकुण्डसम्भूता, माँ चिंता, माँ चिंत्या, माँ चिंताहारिणी, माँ चूडामणि, माँ चूडाला, माँ चैत्यरूपा, माँ चैतन्यरूपा, माँ चकोरनेत्रा, माँ चकोराक्षी, माँ चंडिदासपूजिता, माँ चंडोग्ररूपा, माँ चंडपराक्रमा, माँ चंडमर्दिनी, माँ चंडमुंडहरा, माँ चंडविक्रमा, माँ चंडाहंकारनाशिनि, माँ चतुरा, माँ चतुष्पदा, माँ चतुःसागरसंयुता, माँ चक्रांगदधरा, माँ चक्रायुधा, माँ चक्रप्रिया, माँ चंद्रकिरीटिनी, माँ चंद्रचूड़ा, माँ चंद्रकोटिसमप्रभा, माँ चारुहासा, माँ चित्ररथा, माँ चराचरजगन्मयी, माँ चंडिकास्त्रधारिणी, माँ चक्रपाणि।
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