पहाड़ी हाईवे का वो रहस्य: जब ‘पाषाण देवी’ ने सपने में आकर रोका था मौत का तांडव
पिथौरागढ़-टनकपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर सफर करते हुए जब कोई जिला मुख्यालय से करीब 11 से 14 किलोमीटर की दूरी पर बढ़ता है, तो वादियों की ठंडी हवाओं के बीच आस्था और रहस्य का एक अनूठा संगम देखने को मिलता है। यह पावन दरबार है गुरना माता का, जिन्हें स्थानीय लोग और इतिहास ‘पाषाण देवी’ के नाम से जानते हैं। यह सिर्फ एक मंदिर नहीं है, बल्कि इस दुर्गम पहाड़ी रास्ते की जीवन रेखा और पावन आदि कैलाश यात्रा पर जाने वाले सनातन यात्रियों के लिए अगाध आस्था का एक प्रमुख केंद्र भी है। हर वर्ष आदि कैलाश की कठिन यात्रा पर निकलने वाले श्रद्धालु इस मंदिर में रुककर माता का आशीर्वाद लेते हैं और अपनी सुरक्षित यात्रा की कामना करते हैं।
इस मंदिर का इतिहास रोंगटे खड़े कर देने वाले हादसों और एक चमत्कारी स्वप्न से जुड़ा है। बात साल 1950 की है, जब पिथौरागढ़ क्षेत्र को बाहरी दुनिया से जोड़ने के लिए इस पहाड़ी मार्ग पर यातायात की शुरुआत हुई थी। रास्ता नया और बेहद खतरनाक होने के कारण यह मार्ग हादसों का गढ़ बन गया था, जिसने मुसाफिरों के दिलों में खौफ पैदा कर दिया था। उस दौर में, इस सड़क के ठीक नीचे पाषाण देवी का एक बेहद छोटा रूप स्थापित था। तभी साल 1952 के आस-पास मंदिर के मुख्य पुजारी को एक रात साक्षात माता ने सपने में दर्शन दिए और कहा कि मुझे इस खाई के नीचे से निकालकर सड़क के किनारे स्थापित करो ताकि मैं यहाँ बैठकर अपने भक्तों को आशीष दे सकूँ और इस मार्ग को सुरक्षित कर सकूँ। पुजारी ने बिना देर किए ग्रामीणों की मदद से माता की स्थापना ठीक राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे कर दी, जिसके बाद मार्ग पर होने वाले खौफनाक हादसों का सिलसिला हमेशा के लिए थम गया।
गुरना गाँव के पास होने के कारण गुरना माता के रूप में प्रसिद्ध यह देवालय स्थानीय 11 गाँवों की कुलदेवी ‘इग्यार देवी’ और ‘माता वैष्णवी’ को समर्पित है, जिन्हें महादेव शिव की अर्धांगिनी माता पार्वती का ही स्वरूप माना जाता है। कुमाऊं में इस दरबार की मान्यता जम्मू-कश्मीर की विख्यात वैष्णो देवी के समान ही है, जहाँ सच्चे दिल से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है और महिलाओं को अखंड सौभाग्य व भक्तों को आरोग्य मिलता है। सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार पास के बांस गांव के भट्ट जाति के पुरोहित यहाँ विधिवत पाठ-पूजा संपन्न कराते हैं और पांडे जाति के पंडित मंदिर की समस्त व्यवस्थाओं का संचालन करते हैं। मंदिर के पास स्थित ठंडे पानी के प्राकृतिक चश्मे के जल को भक्त प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। इसके साथ ही यहाँ के होटलों में मिलने वाले लजीज आलू के गुटके और पहाड़ी रायते का स्वाद आज भी हर यात्री की जुबान पर जिंदा है।
इस प्रकार गुरना माता का यह दरबार और आदि कैलाश की यह राह सिर्फ एक भौगोलिक रास्ता नहीं, बल्कि आस्था, अनुशासन और दैवीय कृपा का एक जीवंत प्रवाह है।
श्री ललित प्रसाद पंत (प्रांत अध्यक्ष, सक्षम उत्तराखंड)
”माँ गुरना का आशीर्वाद ही हमारी इस दुर्गम आदि कैलाश यात्रा का सबसे बड़ा संबल और सुरक्षा कवच है।
उनकी कृपा की छांव में प्रशासनिक नियमों का पालन करते हुए इस सफर को पूर्ण करना ही हमारी सच्ची भक्ति है।”
श्री भावेश पंत, गौरव जोशी, राजेन्द्र प्रसाद पंत और पीयूष पंत
”जगत जननी के पावन दरबार में शीश नवाकर ही आदि कैलाश के अलौकिक और दिव्य दर्शनों का मार्ग प्रशस्त होता है।
माँ की महिमा और उनके प्रति हमारा अटूट विश्वास ही हमें हिमालय के इन कठिन रास्तों पर भी अदम्य साहस प्रदान करता है।”
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