“बिंदुखत्ता की हुंकार: राजस्व गांव के अधिकार को लेकर ऐतिहासिक जनजागरण, सत्ता को स्पष्ट चेतावनी”

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लालकुआँ/बिंदुखत्ता।
राजस्व गांव का दर्जा दिए जाने की लंबे समय से लंबित मांग को लेकर बिंदुखत्ता की धरती पर उमड़ा जनसमूह इस बार केवल भीड़ नहीं, बल्कि संगठित जनशक्ति का विराट प्रदर्शन साबित हुआ। हजारों स्त्री-पुरुष, युवा और बुजुर्ग जब एक स्वर में अपने अधिकार की बात करते नजर आए तो स्पष्ट हो गया कि यह आंदोलन अब भावनात्मक अपील से आगे बढ़कर निर्णायक जनअधिकार संघर्ष का रूप ले चुका है। पूरे क्षेत्र में जोश, अनुशासन और प्रतिबद्धता का अद्भुत संगम देखने को मिला।
सभा को संबोधित करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि बिंदुखत्ता की पीड़ा कोई नई नहीं है। दशकों से यहां के लोग प्रशासनिक असमंजस और भूमि संबंधी जटिलताओं से जूझ रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “अब यह आवाज केवल बिंदुखत्ता तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे प्रदेश में गूंज रही है। सरकार को समझना चाहिए कि जनता की धैर्य की भी एक सीमा होती है। यदि जनभावनाओं की अनदेखी जारी रही तो यह मुद्दा और व्यापक जनसमर्थन हासिल करेगा।” उन्होंने आश्वासन दिया कि कांग्रेस इस संघर्ष में जनता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रहेगी।
नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने अपने संबोधन में कहा कि राजस्व गांव का दर्जा केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि मूलभूत अधिकारों से जुड़ा विषय है। उन्होंने चेतावनी भरे स्वर में कहा, “यदि सरकार शीघ्र ठोस निर्णय नहीं लेती तो यह आंदोलन गांव-गांव और घर-घर तक पहुंचेगा। जनता अब प्रतीक्षा की स्थिति में नहीं है, बल्कि निर्णय चाहती है।”
वरिष्ठ कांग्रेसी नेता हरेंद्र बोरा ने कहा कि बिंदुखत्ता के निवासियों ने वर्षों तक उम्मीद और संयम बनाए रखा, लेकिन उनकी समस्याएं जस की तस बनी रहीं। उन्होंने जोर देकर कहा, “सरकार को अब औपचारिकताओं में समय न गंवाकर राजस्व गांव की अधिसूचना तुरंत जारी करनी चाहिए। यह केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के सम्मान और स्वाभिमान का प्रश्न है।”
वरिष्ठ नेता हेमवती नन्दन दुर्गापाल ने कहा कि राजस्व गांव का दर्जा मिलने से भूमि, पट्टा, आवास और आधारभूत सुविधाओं से जुड़ी अनिश्चितताएं समाप्त होंगी। उन्होंने कहा, “सामाजिक न्याय का अर्थ केवल भाषण नहीं, बल्कि ठोस निर्णय है। बिंदुखत्ता को उसका अधिकार दिलाना हमारी नैतिक और राजनीतिक जिम्मेदारी है। हम इस जनआंदोलन को अंजाम तक पहुंचाकर ही दम लेंगे।”
कांग्रेस नेता नितिन पंत ने संघर्ष को अंतिम चरण में बताते हुए कहा, “अब पीछे हटने का प्रश्न ही नहीं उठता। यह आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक शासन स्तर पर स्पष्ट और सकारात्मक आदेश जारी नहीं हो जाता।”
प्रमोद कालोनी ने कहा कि सरकार का दायित्व है कि वह जनभावनाओं का सम्मान करे। उन्होंने कहा कि जब हजारों लोग शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांग रख रहे हैं तो उसे टालना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।
महिला शक्ति की प्रभावी उपस्थिति का उल्लेख करते हुए संध्या डालाकोटी ने कहा, “बिंदुखत्ता की महिलाएं इस संघर्ष की अग्रिम पंक्ति में हैं। हम अपने बच्चों के भविष्य और सुरक्षित अधिकारों के लिए पूरी ताकत से खड़ी हैं।”
संघर्ष समिति से जुड़े उमेश भट्ट ने इसे अधिकार की निर्णायक लड़ाई बताते हुए कहा कि यह आंदोलन किसी दल विशेष का नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र का है। “जब तक राजस्व गांव का दर्जा नहीं मिलता, यह संघर्ष थमेगा नहीं,” उन्होंने कहा।
बलवंत सिंह बिष्ट ने एकता पर बल देते हुए कहा कि आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत क्षेत्रवासियों की सामूहिक प्रतिबद्धता है। “हमारी एकजुटता ही हमारी जीत का आधार बनेगी,” उन्होंने विश्वास जताया।
बसंत पांडे ने कहा कि जनजागरण अभियान को और तेज किया जाएगा ताकि प्रदेश स्तर पर भी इस मांग को प्रभावी ढंग से उठाया जा सके।
बीना जोशी ने इसे सम्मान और भविष्य की लड़ाई बताते हुए कहा कि आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए यह संघर्ष अनिवार्य है।
सभा में उमेश कबड़वाल, शेखर जोशी, सरस्वती एरी, तुलसी बिष्ट, कैलाश दुमका, मोहन कुड़ाई, पुष्कर दानू और हरीश बिसोती सहित अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी रही। सभी ने एक स्वर में राजस्व गांव की मांग को न्यायोचित बताते हुए आंदोलन को मजबूती प्रदान करने का संकल्प दोहराया।
अंत में राजस्व गांव संघर्ष समिति के संयोजक कुंदन सिंह मेहता ने सभी नेताओं और क्षेत्रवासियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि बिंदुखत्ता की यह एकजुटता ही आंदोलन की असली पूंजी है। उन्होंने विश्वास जताया कि जनता का यह अनुशासित और शांतिपूर्ण प्रदर्शन निश्चित रूप से सकारात्मक परिणाम की ओर ले जाएगा।
इतिहास रचती इस विराट रैली ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि बिंदुखत्ता अब प्रतीक्षा नहीं, बल्कि निर्णायक समाधान चाहता है। जनशक्ति की यह गूंज सत्ता के गलियारों तक पहुंच चुकी है—अब निगाहें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं।

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