बागेश्वर
देवभूमि उत्तराखण्ड से पलायन रोकने और पहाड़ों में फिर से जीवन की लौ जलाने का जो सपना वर्षों से देखा जा रहा है, उसे साकार करने की दिशा में पहाड़ के लाल योगेश पन्त निरंतर कर्मयोगी की तरह जुटे हुए हैं। माँ भद्रकाली मन्दिर के आचार्य एवं माँ के अनन्य उपासक योगेश पन्त अपने पैत्रिक गाँव कुचौली (जिला बागेश्वर) में फिर से रौनक लौटाने के लिए प्रेरणास्पद प्रयास कर रहे हैं।
योगेश पन्त, माँ भद्रकाली के परम भक्त एवं श्रद्धेय स्वर्गीय श्री पूरन चन्द्र पन्त के सुपुत्र हैं। उन्हें अपने पैत्रिक गाँव से अगाध प्रेम है। वर्षों तक विरानी झेल चुके कुचौली गाँव में अब उनके प्रयासों से नई उम्मीद की किरण दिखाई देने लगी है। जिस गाँव में कभी केवल दो परिवार और कुल तीन लोग रह गए थे, वहाँ आज फिर से चहल-पहल लौटने की संभावनाएँ प्रबल हो गई हैं।
पलायन रोकने की मुहिम
योगेश पन्त का मुख्य उद्देश्य स्पष्ट है—
उत्तराखण्ड से पलायन रोकना, स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजित करना और देवभूमि को आध्यात्मिक पर्यटन के एक सशक्त तीर्थ के रूप में विकसित करना।
इसी उद्देश्य के तहत उन्होंने वर्ष 2015 से उत्तराखण्ड में व्यवसाय प्रारम्भ कर लगभग 100 लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया है।
गाँव के लिए संघर्ष और निर्माण
कुचौली गाँव, जो प्राचीन काल से महर्षि कुशण्डी ऋषि की तपोभूमि रहा है, वर्षों तक मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहा। योगेश पन्त ने सरकार से निरंतर संघर्ष कर गाँव में बिजली और सड़क जैसी आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अब वे स्वयं अपने पैत्रिक घर का भव्य जीर्णोद्धार करा रहे हैं और अन्य प्रवासियों को भी गाँव लौटने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
प्रेरणा का प्रतिफल
उनकी प्रेरणा रंग ला रही है। उनके इस अभियान में उनकी धर्मपत्नी श्रीमती ज्योति पन्त का भरपूर सहयोग मिल रहा है। परिणामस्वरूप श्री तरुण पन्त एवं श्री हेम पन्त के घरों का जीर्णोद्धार कार्य प्रगति पर है। श्री पंकज पन्त एवं श्री भुवन पन्त द्वारा दो नए घरों का निर्माण शीघ्र प्रारम्भ होने जा रहा है। यह सब संकेत दे रहा है कि जो लोग कभी मजबूरी में पहाड़ छोड़ गए थे, वे अब अपनी जड़ों की ओर लौटने का मन बना चुके हैं।
महर्षि कुशण्डी ऋषि की तपोभूमि
कुचौली गाँव का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व अत्यंत प्राचीन है। मान्यता है कि यह भूमि महर्षि कुशण्डी ऋषि की तपोस्थली रही है। पुराणों में वर्णित है कि महर्षि कुशण्डी ने इसी क्षेत्र में कठोर तपस्या कर दिव्य ज्ञान प्राप्त किया और लोककल्याण के लिए साधना की। उनकी तपस्या से यह क्षेत्र आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत माना जाता है।
आज योगेश पन्त उसी तपोभूमि को पुनः जागृत करने का संकल्प लेकर चल रहे हैं, ताकि कुचौली केवल एक गाँव नहीं बल्कि आध्यात्मिक चेतना और ग्रामीण पुनर्जागरण का प्रतीक बन सके।
उम्मीद की नई सुबह
योगेश पन्त का यह प्रयास केवल व्यक्तिगत निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे उत्तराखण्ड के लिए एक मॉडल बन सकता है। अगर इसी तरह हर प्रवासी अपने गाँव से भावनात्मक रिश्ता जोड़ ले, तो पहाड़ों में फिर से जीवन, संस्कृति और समृद्धि लौट सकती है।
निस्संदेह, पहाड़ के लाल योगेश पन्त का यह संकल्प कुचौली गाँव ही नहीं, बल्कि समूचे अंचल के लिए नई सुबह का संदेश लेकर आया है।
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