ज्योति चुफाल व हर्षिता रौतेला की कहानियां अन्तर्मन को भिगो गईं

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 रमोलिया हाउस में एक हफ्ते के लेखन कार्यशाला का समापन
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 लेखन हमें संवेदनशील बनाता है : अनिल कार्की
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हल्द्वानी। सरस मार्केट स्थित रमोलिया हाउस में पिछले एक हफ्ते से चल रही लेखन कार्यशाला का समापन सोमवार 16 मार्च को हो गया है। समापन समापन अवसर पर लेखन कार्यशाला के संदर्भदाता व चर्चित कवि-लेखक डॉ. अनिल कार्की ने प्रतिभागियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि भागदौड़ और आपाधापी के इस समय में स्वयं को समझने और व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम लेखन है। जो लिखता है, वह समय और परिस्थितियों से संवाद करता है। उन्होंने कहा कि लेखन हमें एक संवेदनशील और जिम्मेदार इंसान बनाए रखने में भी मदद करता है। बेहतर लिखने के लिए रचनाकर्मी को बेहतर पढ़ना भी चाहिए। जब तक आप अधिक पढ़ेंगे नहीं, तब तक आप बहुत अच्छा लिख भी नहीं सकते हैं, इसलिए बेहतर लिखने के लिए पढ़ना बहुत आवश्यक है।
कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों से अपने बचपन को पत्र लिखने को कहा गया था। लेखन कार्यशाला के समापन सत्र में दिनेश सिंह, आनन्द सिंह बसेड़ा, अंकित चौधरी, अजय नेगी, ऐश्वर्या और श्री द्वारा अपने बचपन को लिखे गए पत्रों में स्मृतियों की गंध, बीते दिनों की धूप और अधूरे सपनों की टीस एक साथ महसूस की जा सकती थी।
इसके बाद जिन प्रतिभागियों ने कार्यशाला के दौरान कहानी लेखन में रुचि दिखाई थी, उनमें ज्योति उपाध्याय चुफाल की आत्मकथात्मक रचना ‘मेरी कहानी’ और हर्षिता रौतेला ‘बुलबुल’ की प्रश्नाकुल कहानी ‘क्या मैं अकेली हूँ?’ ने भीतर तक सुनने की संवेदना को टटोल दिया। अजय नेगी, धीरज पड़ियार, मुकुल, आशा पांडे और प्रकाश पाण्डे की कहानियों ने भी उपस्थित श्रोताओं के मन पर हल्की-सी चुप्पी और भीतरी हलचल साथ-साथ छोड़ दी।

समापन सत्र में वरिष्ठ रंगकर्मी चारु तिवारी ने इस पहल को रचनात्मक चेतना की भूमि तैयार करने वाला प्रयास बताते हुए युवाओं से साहित्य और रंगमंच के साथ लंबे संवाद की अपेक्षा जताई। रंगकर्मी हरीश जोशी, घनश्याम भट्ट और हर्षवर्धन वर्मा ने भी अपने विचार रखते हुए प्रतिभागियों को मंच और लेखनी दोनों से जुड़े रहने की प्रेरणा दी।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार जगमोहन रौतेला ने कहा कि डॉ. अनिल कार्की जैसे सर्जनशील हस्ताक्षर के सान्निध्य में प्रशिक्षण मिलना प्रतिभागियों के लिए महज कार्यशाला नहीं, बल्कि सीखने और स्वयं को खोजने की प्रक्रिया है। इस अवसर पर अंत में कुमाउनी के सुप्रसिद्ध लोकगायक दीवान सिंह कनवाल के पिछले दिनों हुए निधन पर दो मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। लोक धुनों के इस अनमोल रचनाकार को स्मरण करते हुए सभागार एक क्षण के लिए सांस्कृतिक शून्य से रूबरू हुआ।
समापन पर आयोजक दिनेश सिंह और अंकित चौधरी ने आश्वस्त किया कि शीघ्र ही पुनः रचनात्मक लेखन कार्यशाला का आयोजन किया जाएगा, ताकि शब्दों से प्रेम करने वाले और अधिक युवा इस सृजन यात्रा के सहयात्री बन सकें। ***