लालकुआँ: भक्ति, श्रद्धा और एक अकल्पनीय रहस्य का साक्षी बना लालकुआँ नगर। यहाँ आयोजित भव्य श्री श्याम निशान यात्रा मात्र एक धार्मिक आयोजन नहीं रही, बल्कि यह साक्षात ईश्वरीय शक्तियों के मिलन और एक अद्भुत चमत्कार का प्रमाण बन गई। अवंतिका देवी मंदिर के पावन प्रांगण से शुरू हुई इस यात्रा में आस्था का ऐसा सैलाब उमड़ा कि पूरा वातावरण “जय श्री श्याम” के गगनभेदी उद्घोषों से कंपायमान हो उठा। आगे-आगे मातृशक्तियों का समूह और पीछे झूमते-गाते भक्त—दृश्य अलौकिक था।
किंतु, यात्रा के प्रस्थान के क्षण में एक ऐसी रहस्यमयी घटना घटी जिसने वहां मौजूद श्रद्धालुओं को स्तब्ध कर दिया।
जब बाबा श्याम के सुसज्जित, भव्य रथ को मंदिर से नगर भ्रमण के लिए बाहर निकालने की तैयारी हुई, तो एक अदृश्य शक्ति ने मानो रथ के पहियों को थाम लिया। जो रथ फूलों सा हल्का प्रतीत हो रहा था, वह अचानक पर्वत सा भारी हो गया। भक्तों का सामूहिक बाहुबल, यात्रा संयोजक रानू मित्तल के अथक प्रयास, और उपस्थित गणमान्य समाजसेवियों आचार्य पं० चन्द्रशेखर जोशी, हेमवती नन्दन दुर्गापाल, वरुण पाठक, विनोद पाण्डे, धीरज पाण्डे, ममता चौहान, रितुल शर्मा और अमन अग्रवाल की पूरी ताकत भी रथ को मंदिर के मुख्य द्वार से एक इंच बाहर न निकाल सकी।
विस्मयकारी दृश्य तो तब उपस्थित हुआ जब एक बार रथ थोड़ा आगे बढ़ा, और फिर किसी अज्ञात प्रेरणा से पुनः मंदिर परिसर की ओर लौट आया। भक्तों की साँसें थम गईं। यह स्पष्ट हो चुका था कि यह कोई मानवीय अवरोध नहीं, बल्कि कोई दैवीय लीला है। वहां उपस्थित हर व्यक्ति को यह अहसास हुआ कि शायद बाबा श्याम, माँ अवंतिका के पावन धाम को छोड़कर जाना ही नहीं चाहते। मानवीय प्रयास जब बौने साबित हो गए, तब सभी के द्वारा दैवीय शरण ली गई।
वातावरण में एक गहरा रहस्य छाया हुआ था। अंततः, आचार्य पं० चन्द्रशेखर जोशी ने स्थिति की अलौकिकता को समझते हुए माँ अवंतिका के चरणों में करबद्ध प्रार्थना की। यह निर्णय लिया गया कि बाबा को माँ के दर्शन कराए बिना नहीं ले जाया जाएगा। रथ को वापस मोड़ा गया और मंदिर परिसर में माँ अवंतिका की परिक्रमा करवाई गई।
यह क्षण दो महाशक्तियों के मिलन का साक्षी था। मानो बाबा श्याम, मैय्या अवंतिका से विदा ले रहे हों और मैय्या उन्हें अपनी मूक सहमति प्रदान कर रही हों।
और फिर, वह चमत्कार हुआ जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। परिक्रमा पूर्ण होते ही और माँ अवंतिका के दर्शन के पश्चात, वही रथ जो बेहद प्रयास के बाद भी नहीं निकल पा रहा था आंगन की परिक्रमा कर, दूसरे गेट की ओर बढ़ते ही आश्चर्यजनक रूप से सहज और गतिशील हो गया। वह बिना किसी बाधा के मंदिर परिसर से बाहर निकल आया। आखिर भक्तों के आगे भगवान को मानना पड़ा
इस साक्षात चमत्कार को अपनी आँखों से देख भक्तों चेहरे अचम्भित हो गए। पूरा परिसर “जय श्री श्याम” और “जय माँ अवंतिका” के गगनभेदी जयकारों से गूंज उठा। इस अविश्वसनीय और रहस्यमयी घटना ने पूरे लालकुआँ नगर को एक ऐसे भक्तिरस में डुबो दिया, जिसकी स्मृतियाँ श्रद्धालुओं के हृदयों में सदैव जीवंत रहेंगी।
लेटैस्ट न्यूज़ अपडेट पाने हेतु -
👉 वॉट्स्ऐप पर हमारे समाचार ग्रुप से जुड़ें
