मानसरोवर का वह अलौकिक रहस्य जिसने काल के विधान को भी बदल दिया
देवाधिदेव महादेव के पावन निवास कैलाश की धवल चोटियों के आंचल में स्थित मानसरोवर केवल एक जलराशि नहीं, बल्कि साक्षात चेतना का अमृत कुंड है। इसके शांत, नीले और रहस्यमयी जल में तरंगित होती हुई आध्यात्मिक ऊर्जा समस्त सृष्टि के पापों का क्षालन करने की सामर्थ्य रखती है। यह वह परम पावन धाम है जहां पहुंचकर जीवात्मा संसार के बंधनों से मुक्त होकर परमात्मा के असीम आनंद में विलीन हो जाती है। कैलाश मानसरोवर की इसी अलौकिक महिमा को समेटे हुए एक परम प्रामाणिक और विस्मयकारी इतिहास हमारे सनातन धर्म के अत्यंत श्रद्धेय ग्रंथ श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत मानसखण्ड के चौदहवें अध्याय में मिलता है, जिसे चाण्डालाख्यान के नाम से जाना जाता है।
शौनादि ऋषियों की पावन सभा में व्यास जी के परम शिष्य सूत जी महाराज इस दिव्य कथा को उद्घाटित करते हैं। ऋषि सभा के सम्मुख खड़े होकर श्रद्धावनत भाव से कहते हैं—
अत्र ते कथयिष्यामि इतिहासं पुरातनम्।
मुक्तिदं स्थिरचित्तानां पापानां नाशाकारकम्॥
अर्थात, हे मुनियों! मैं तुम्हें एक ऐसा प्राचीन इतिहास सुनाता हूँ जो स्थिर चित्त वाले मनुष्यों को मुक्ति प्रदान करने वाला और समस्त घोर पापों का तत्क्षण नाश करने वाला है।
ऋषि अपनी वाणी को प्रवाह देते हुए कहते हैं कि समय के उस झिलमिलाते मुहाने पर, जब सत्ययुग अपनी विदा ले रहा था और त्रेतायुग अपनी पहली किरणों के साथ अंगड़ाई ले रहा था, सुंदर मगध देश की धरती पर एक ऐसे बालक का जन्म हुआ जिसकी नियति में केवल घना अंधकार लिखा था। वह जन्म से ही दृष्टिहीन था और उसका जन्म एक अत्यंत निर्धन चांडाल परिवार में हुआ था। संसार की दृष्टि में वह केवल एक लाचार, अभागा और तिरस्कृत जीव था, जिसे पिछले जन्मों के क्रूर प्रारब्ध का बोझ ढोना पड़ रहा था। माता-पिता ने जब तक सांस ली, उसे असीम स्नेह से पाला, किंतु जब वह मात्र पांच वर्ष का हुआ, तो काल के क्रूर हाथों ने उसके माता-पिता को छीन लिया। बंधु-बांधवों ने भी उस असहाय बालक को अकेला छोड़ दिया। अब उसका जीवन केवल गलियों में भीख मांगने, दूसरों की जूठन और यहां तक कि कुत्तों के छोड़े हुए अन्न के दानों पर निर्भर हो चुका था।
परंतु विधाता के खेल भी बड़े निराले होते हैं। एक दिन उस नगर से एक भव्य दृश्य गुजरा। राजा, रानियां, विद्वान ब्राह्मण, पराक्रमी क्षत्रिय और समाज के सभी वर्गों के लोग अपने वाहनों और सैनिकों के साथ एक पावन तीर्थ भद्रवट की यात्रा पर निकल पड़े थे। भेरी, मृदंग और दुन्दुभियों की गूंज से आकाश गुंजायमान था। उस अंधे चांडाल बालक के कानों में जब वह मधुर ध्वनि पड़ी, तो भोजन और वस्त्र की आस में वह भी उस जनसमूह के पीछे-पीछे चल पड़ा। वह यह नहीं जानता था कि यह यात्रा केवल उसके शरीर की भूख मिटाने के लिए नहीं, बल्कि उसकी आत्मा की सदियों पुरानी प्यास बुझाने के लिए थी।
भद्रवट तीर्थ पहुंचकर जब वह जन-समुदाय के बीच भटक रहा था, तब उसके कानों में वहां उपस्थित तपस्वी ऋषियों के मुख से प्रवाहित हो रही ज्ञान-गंगा की कुछ बूंदें पड़ीं। ऋषिगण परम पवित्र मानस-क्षेत्र यानी मानसरोवर की अद्भुत महिमा का गुणगान कर रहे थे। उस अंधकारमय जीवन में मानस शब्द की ध्वनि एक अलौकिक प्रकाश बनकर उतरी। यद्यपि वह अज्ञानी था, पर उस पावन नाम का सम्मोहन ऐसा था कि उसने अपने हृदय की गहराइयों में मानस नाम को संजो लिया। वह उठते-बैठते, चलते-फिरते अनजाने में ही उस पवित्र नाम का स्मरण करने लगा और इसी अवस्था में वापस मगध लौट आया।
समय का चक्र घूमता रहा। वृद्धावस्था और असाध्य रोगों ने उसके शरीर को जकड़ लिया। उसका शरीर कीड़ों और कुष्ठ रोग से क्षत-विक्षत हो गया। जब उसकी अंतिम घड़ियां आईं, तो वातावरण में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया। अचानक वहां एक ऐसा रहस्यमयी दृश्य उपस्थित हुआ जिसने ब्रह्मांड के नियमों को चुनौती दे दी। एक ओर से भयानक पाश, शूल और मुदगर धारण किए हुए यमराज के दूत उसके पापी प्राणों को खींचने आए, तो दूसरी ओर से साक्षात ब्रह्मलोक से आए ज्योतिर्मय देवदूत एक दिव्य विमान लेकर प्रकट हो गए।
यमराज के दूत अचंभित हो गए। उन्होंने क्रोध और विस्मय से भरकर देवदूतों को रोका और प्रतिवाद करते हुए कहा—
त्यजन्तु ऋषिशार्दूलाः पापात्मानं नराधमम्।
धर्मच्च वर्जितं पापं चाण्डलाधमसंज्ञकम्॥
अर्थात, हे ऋषियों में श्रेष्ठ देवदूतों! आप इस महापापी, अधर्मी और दुराचारी नराधम चाण्डाल को छोड़ दें। इसने अपने पूरे जीवन में न तो कभी कोई तपस्या की है, न कोई यज्ञ-कर्म किया है, न कभी ब्राह्मणों को भोजन आदि से संतुष्ट किया है और न ही किसी पवित्र तीर्थ में इसके प्राण छूटे हैं। इसका पूरा जीवन पाप की गाद में बीता है। फिर इस पर यह असीम कृपा कैसी? यह रहस्य क्या है?
तब वहां उपस्थित ऋषियों और देवदूतों ने यमदूतों के भ्रम का निवारण करते हुए उस जीव के अदृश्य इतिहास की परतें खोलीं। ऋषियों ने कहा कि हे यमदूतों! सुनो, इसने पूर्व जन्म में एक बड़ा पुण्य अर्जित किया था। यह अपने पूर्व जन्म में कोंकण देश का एक अत्यंत विद्वान ब्राह्मण था, जिसका नाम वेदनिधि था। वह समस्त वेदों का ज्ञाता था, परंतु संगति के दोष और वासना के वशीभूत होकर वह अपने मार्ग से भटक गया। उसने मदिरापान, मांसभक्षण और मर्यादाओं का उल्लंघन किया। अपनी धर्मपत्नी और बच्चों को त्यागकर वह वारांगनाओं के साथ वन में विलास करने चला गया। उसने अपने सारे पुण्य गंवा दिए थे।
किंतु, उसी घोर अंधकार के बीच एक दिन अप्रत्याशित रूप से भद्रवट तीर्थ में इसके कानों में मानसरोवर की महिमा और मानस नाम पड़ा था। उस क्षण, उसके अंतर्मन में श्रद्धा जागृत हुई थी और उसने उस दिव्य नाम को अपने हृदय में धारण कर लिया था। यद्यपि बाद में वह पुनः कुसंगति में पड़ गया और दुखों को भोगते हुए मरा, जिसके फलस्वरूप इस जन्म में उसे अंधा चांडाल बनना पड़ा, परंतु परमात्मा और उनके परम पावन धाम के नाम की महिमा कभी निष्फल नहीं होती। मा, न, स—इन तीन अक्षरों में वह अलौकिक शक्ति है जो करोड़ों जन्मों के महापापों को पल भर में भस्म कर देती है। इस जीव ने भद्रवट में और अपने जीवन के अंतिम क्षणों में भी उस दिव्य नाम का स्मरण किया था।
ऋषि पुनः यमदूतों को समझाते हुए कहते हैं—
मानससोच्चारणात्सद्यः कुलकोटिसमन्विताः।
व्रजन्ति ब्रह्मभुवनं मानवा देवसेवितम्॥
अर्थात, मानव द्वारा मानस नाम का उच्चारण करने मात्र से ही मनुष्य अपने करोड़ों कुलों सहित देवताओं द्वारा सेवित परम पावन ब्रह्मलोक को प्राप्त कर लेता है। जब पशुघाती और अवांछनीय लोगों के संपर्क में रहने वाले भी केवल मानसरोवर का स्मरण करने मात्र से यमलोक का दर्शन नहीं करते, तो फिर श्रद्धापूर्वक स्मरण करने वालों का तो कहना ही क्या है!
देवदूतों और ऋषियों की यह मर्मस्पर्शी और सत्य वाणी सुनकर यमदूतों का संशय दूर हो गया। वे शांत भाव से यमलोक की ओर लौट गए। उधर, वह दृष्टिहीन चांडाल समस्त दैहिक कष्टों से मुक्त होकर एक परम सुंदर, दिव्य रूप धारण कर चुका था। ऋषियों की वंदना और देवताओं की पुष्पवर्षा के बीच, वह अलौकिक विमान उस पुण्यात्मा को लेकर सीधे परमधाम, ब्रह्मलोक की ओर उड़ चला। पीछे छूट गई थी केवल वह पावन कथा, जो आज भी संसार को यह सीख देती है कि चाहे अंधकार कितना भी घना हो, कैलाश मानसरोवर की महिमा और ईश्वर के नाम का एक छोटा सा दीपक भी महापापी के लिए भी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के मानसखण्ड का यह चौदहवां अध्याय संपन्न होता है।
लेखक @ रमाकान्त पन्त@
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