पराशर संहिता का अनसुना रहस्य: क्या ‘बाल ब्रह्मचारी’ हनुमान जी का विवाह हुआ था,
जब भी हम संकटमोचन हनुमान जी का स्मरण करते हैं, तो हमारे मन में आजीवन ‘बाल ब्रह्मचारी’, श्रीराम के परम भक्त और असीम शक्तियों के स्वामी की छवि उभरती है। हनुमान जी का ब्रह्मचर्य इतना कठोर और पवित्र है कि भारतवर्ष में सदियों से इसी रूप में उनकी पूजा होती आ रही है। लेकिन, महर्षि पराशर द्वारा रचित **’पराशर संहिता’** में हनुमान जी के जीवन का एक ऐसा रहस्य छिपा है, जिसे सुनकर कोई भी विस्मित हो सकता है। यह ग्रंथ बताता है कि ज्ञान की प्राप्ति के लिए हनुमान जी को विवाह भी करना पड़ा था।
यह बात प्रथम दृष्टया हनुमान जी के ब्रह्मचर्य व्रत के विरुद्ध लग सकती है, परंतु इसके पीछे छिपी कथा और इसका दार्शनिक अर्थ अत्यंत अलौकिक है।
सूर्यदेव से शिक्षा और नव-व्याकरण का रहस्य
कथा के अनुसार, हनुमान जी ने भगवान सूर्य (सूर्यदेव) को अपना गुरु चुना था। सूर्यदेव अपने रथ पर सवार होकर निरंतर ब्रह्मांड का भ्रमण करते रहते थे और हनुमान जी उनके रथ के आगे-आगे उड़ते हुए उनसे शिक्षा ग्रहण करते थे।
सूर्यदेव ने हनुमान जी को कई वेदों और शास्त्रों का ज्ञान दिया। उन्हें कुल 9 प्रकार की विद्याओं (नव-व्याकरण) का अध्ययन करना था। हनुमान जी ने अपनी कुशाग्र बुद्धि से 5 विद्याओं में तो अत्यंत शीघ्र महारत हासिल कर ली, लेकिन जब शेष 4 विद्याओं को सीखने की बारी आई, तो सूर्यदेव रुक गए।
समस्या: ज्ञान प्राप्ति के लिए ‘गृहस्थ’ होना अनिवार्य
सूर्यदेव ने हनुमान जी को बताया कि ये शेष 4 विद्याएँ अत्यंत गूढ़ हैं और ब्रह्मांड के नियमों के अनुसार, इन विद्याओं का ज्ञान केवल उसी को दिया जा सकता है जो ‘गृहस्थ’ (विवाहित) हो। कोई भी ब्रह्मचारी इन विद्याओं को ग्रहण करने का अधिकारी नहीं है।
अब हनुमान जी के सामने एक बड़ा धर्मसंकट खड़ा हो गया। एक ओर उनका ‘आजीवन ब्रह्मचर्य’ का कठोर व्रत था और दूसरी ओर ज्ञान प्राप्ति की असीम पिपासा। ज्ञान के बिना उनका जीवन और उनकी सेवा दोनों अधूरी थीं।
समाधान: सूर्य पुत्री ‘सुवर्चला’ से विवाह
हनुमान जी की इस दुविधा को देखकर गुरु सूर्यदेव ने ही एक मार्ग निकाला। उन्होंने हनुमान जी से कहा कि वे उनकी पुत्री ‘सुवर्चला’ से विवाह कर लें। सुवर्चला कोई साधारण कन्या नहीं थीं। वे अयोनिजा थीं (अर्थात उनका जन्म किसी माता के गर्भ से नहीं, बल्कि सूर्यदेव के प्रचंड तेज से हुआ था)।
सूर्यदेव ने हनुमान जी को आश्वस्त किया कि सुवर्चला एक परम तपस्विनी हैं और विवाह के तुरंत बाद वे सदा के लिए घोर तपस्या में लीन हो जाएंगी। इस प्रकार विवाह के कर्मकांड पूर्ण होने पर हनुमान जी तकनीकी रूप से ‘गृहस्थ’ हो जाएंगे और वे बची हुई 4 विद्याएं सीख सकेंगे, लेकिन उनके ब्रह्मचर्य व्रत पर कोई भी आंच नहीं आएगी।
विवाह और ज्ञान की पूर्णता
गुरु की आज्ञा और ज्ञान प्राप्ति के परम उद्देश्य से, हनुमान जी ने ज्येष्ठ मास की दशमी तिथि को सुवर्चला के साथ विवाह किया। (दक्षिण भारत के तेलंगाना क्षेत्र में खम्मम जिले में आज भी हनुमान जी और सुवर्चला का एक प्राचीन मंदिर स्थित है, जहाँ दोनों की साथ में पूजा होती है)।
विवाह संपन्न होते ही देवी सुवर्चला अपनी तपस्या में लीन हो गईं। हनुमान जी ने सूर्यदेव से शेष चारों विद्याओं का ज्ञान प्राप्त किया और ‘नव-व्याकरण’ के पूर्ण ज्ञाता बन गए। इसके पश्चात वे पुनः श्रीराम की सेवा में लौट आए।
रहस्य का वास्तविक और दार्शनिक अर्थ
पराशर संहिता का यह रहस्य हमें यह सिखाता है कि हनुमान जी का ब्रह्मचर्य किसी ‘परिस्थिति’ का मोहताज नहीं था, बल्कि वह उनकी आत्मा की अवस्था थी। उन्होंने ज्ञानार्जन और ब्रह्मांडीय नियमों के पालन के लिए विवाह रूपी संस्कार को तो स्वीकार किया, परंतु सांसारिक मोह या भौतिक सुखों ने उन्हें क्षण भर के लिए भी स्पर्श नहीं किया। यह प्रसंग सिद्ध करता है कि हनुमान जी केवल ‘बल’ के नहीं, बल्कि ‘विद्या’ (ज्ञान) की पराकाष्ठा हैं, जिन्होंने पूर्णता प्राप्त करने के लिए संसार के हर नियम का सम्मान किया और फिर भी अपने मूल स्वरूप (ब्रह्मचर्य और रामभक्ति) को अक्षुण्ण रखा।
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