अद्भुत रामायण का अनसुना रहस्य: जब श्रीराम ने हनुमान जी को दिया था ‘ब्रह्मज्ञान
रामायण के कई स्वरूप हमारे समाज में प्रचलित हैं, जिनमें महर्षि वाल्मीकि कृत ‘वाल्मीकि रामायण’ और गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस’ सबसे प्रमुख हैं। लेकिन महर्षि वाल्मीकि द्वारा ही रचित एक और अत्यंत दुर्लभ ग्रंथ है— ‘अद्भुत रामायण’। यह ग्रंथ अपने नाम के अनुरूप ही रहस्यों और चमत्कारों से भरा हुआ है। जहाँ मूल रामायण श्रीराम के मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप को दर्शाती है, वहीं अद्भुत रामायण माता सीता के ‘महाकाली’ स्वरूप और उनके द्वारा ‘सहस्रानन’ (हजार सिर वाले रावण) के वध पर केंद्रित है। लेकिन इसी ग्रंथ में परम रामभक्त हनुमान जी से जुड़ा एक ऐसा तात्विक और दार्शनिक रहस्य छिपा है, जिससे बहुत कम लोग परिचित हैं।
हनुमान जी: केवल सेवक नहीं, बल्कि परम ज्ञानी
हम सभी हनुमान जी को असीम बल के स्वामी, श्रीराम के परम सेवक और एक अजेय योद्धा के रूप में पूजते हैं। लेकिन ‘अद्भुत रामायण’ यह स्पष्ट करती है कि हनुमान जी केवल एक ‘दास’ नहीं थे, बल्कि वे ज्ञान की उस पराकाष्ठा पर बैठे एक ‘ब्रह्मवेत्ता’ (ब्रह्म को जानने वाले) थे, जिन्हें स्वयं भगवान ने ब्रह्मांड के सबसे गूढ़ रहस्यों का उपदेश दिया था।
रहस्य: श्रीराम और हनुमान जी का वह दुर्लभ दार्शनिक संवाद
अद्भुत रामायण के सर्ग 11 से 15 के बीच एक अत्यंत अलौकिक प्रसंग आता है। जब ऋष्यमूक पर्वत पर हनुमान जी की भगवान श्रीराम से पहली बार भेंट होती है, तो वे एक ब्राह्मण के वेश में श्रीराम से उनका परिचय पूछते हैं।
अन्य रामायणों में भगवान राम स्वयं को केवल दशरथ पुत्र और सीता की खोज में भटकते एक पति के रूप में ही प्रस्तुत करते हैं। परंतु, ‘अद्भुत रामायण’ में यहाँ एक दिव्य रहस्योद्घाटन होता है। श्रीराम साधारण मनुष्य की तरह नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के स्वामी के रूप में अपना वास्तविक परिचय देते हैं। वे हनुमान जी को बताते हैं कि वे ही परमेश्वर, अंतर्यामी, मायावी और साक्षात परब्रह्म हैं।
इसके बाद श्रीराम हनुमान जी को वह उपदेश देते हैं, जो वास्तव में अत्यंत रहस्यमयी है:
सांख्य और वेदांत का ज्ञान: श्रीराम हनुमान जी को प्रकृति और पुरुष (आत्मा) का भेद समझाते हैं।
भक्ति योग का रहस्य: वे बताते हैं कि निर्गुण ब्रह्म (निराकार ईश्वर) और सगुण साकार (उनके राम रूप) में कोई भेद नहीं है।
उपनिषदों का सार:श्रीराम उन्हें आत्मा की अमरता और माया के आवरण से मुक्त होने का सीधा मार्ग दिखाते हैं।
यह प्रसंग ठीक वैसा ही है, जैसा द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ का ज्ञान दिया था। अद्भुत रामायण यह रहस्य खोलती है कि त्रेता युग में वही सर्वोच्च ज्ञान श्रीराम ने एक एकांत पर्वत पर अपने सबसे प्रिय भक्त हनुमान को दिया था।
सहस्रमुख रावण युद्ध में हनुमान जी से जुड़ा एक और प्रसंग
अद्भुत रामायण में एक और चौंकाने वाली घटना का वर्णन है। जब लंका विजय के बाद यह पता चलता है कि रावण का एक बड़ा भाई ‘सहस्रानन’ (हजार सिरों वाला रावण) पुष्कर द्वीप में राज करता है, तो श्रीराम अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ उस पर आक्रमण करते हैं।
इस युद्ध में वह महादानव मात्र एक बाण चलाता है और उस बाण के प्रचंड वेग से हनुमान जी, सुग्रीव, विभीषण और लक्ष्मण सहित पूरी वानर सेना उड़कर सीधे अयोध्या जा गिरती है! रणभूमि में केवल अचेत श्रीराम और माता सीता रह जाते हैं। तब माता सीता ‘महाकाली’ का विकराल रूप धारण करके उस राक्षस का वध करती हैं। यह प्रसंग यह रहस्य उजागर करता है कि जहाँ हनुमान जी जैसे असीम बलशाली योद्धाओं का बाहुबल भी ठहर नहीं सका, वहाँ ब्रह्मांड की रक्षा स्वयं ‘आदि शक्ति’ (माता सीता) ने की थी।
अद्भुत रामायण का यह प्रसंग यह सिद्ध करता है कि हनुमान जी की श्रीराम के प्रति जो अगाध भक्ति थी, वह केवल भावुकता नहीं थी। वह भक्ति परम सत्य और ज्ञान की उस चरम सीमा पर आधारित थी, जहाँ हनुमान जी ने श्रीराम को अखिल ब्रह्मांड के नियंता के रूप में पूर्णतः आत्मसात कर लिया था। इसीलिए हनुमान जी की स्तुति में उन्हें ज्ञानिनामग्रगण्यम्’** (ज्ञानियों में सबसे आगे) कहा जाता है।
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