जागेश्वर (दारुकावन) की अनसुनी कथा: शिवलिंग प्राकट्य और अनंत ज्योति स्तंभ का गूढ़ रहस्य
जागेश्वर दारुकावन का दिव्य रहस्य: मानसखण्ड में वर्णित पृथु–धरा संवाद से प्रकट हुई कुमाऊँ की पावन उत्पत्ति कथा
सृष्टि का स्पंदन: जब पृथ्वी ने धारण किया ‘स्थावर’ रूप और जागेश्वर बना दारुकावन का दिव्य केंद्र
कुमाऊँ की हिमालयी वादियों में स्थित दारुकावन, जिसे आज जागेश्वर के रूप में जाना जाता है, केवल एक तीर्थ नहीं बल्कि मानसखण्ड में वर्णित उस गूढ़ ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक माना जाता है, जहाँ सृष्टि, धरा और धर्म के बीच दिव्य संवाद का स्वरूप प्रकट होता है।
इसी पृष्ठभूमि में स्कन्द पुराण के मानसखण्ड में वर्णित राजा पृथु, पृथ्वी (धरा) और श्री हरि विष्णु के मध्य हुआ दिव्य संवाद एक अद्भुत आध्यात्मिक आधार बनकर उभरता है, जो कुमाऊँ की इस भूमि को ‘स्थावर चेतना’ का केंद्र सिद्ध करता है।
सृष्टि का स्पंदन: धरा की व्यथा और ‘स्थावर’ का गूढ़ रहस्य
प्रजा की हाहाकार और धरा का नवनिर्माण
प्राचीन काल में, जब धरती पर अन्न और आजीविका का घोर अभाव हो गया, तब त्राहि-त्राहि करती प्रजा अपने परम प्रतापी राजा पृथु की शरण में गई। भूख से व्याकुल प्रजा की करुण पुकार सुनकर राजा पृथु का वक्ष क्रोध से धधक उठा। उन्होंने पृथ्वी से जीवनदायिनी संपदा निकालने के लिए अपना दिव्य धनुष उठा लिया।
राजा के भयंकर क्रोध को देखकर पृथ्वी भयभीत हो गई और एक गाय का रूप धारण कर प्राण बचाने हेतु तीनों लोकों में भागने लगी, किन्तु उसे कहीं अभयदान नहीं मिला। विवश होकर वह राजा पृथु के समक्ष उपस्थित हुई।
धरा का दोहन: राजा पृथु ने अपने बाणों से विशाल पर्वतों को उखाड़ फेंका और ऊबड़-खाबड़ पृथ्वी को एक समतल थाली के समान चौरस कर दिया ताकि मानव वहां घर और नगर बसा सकें।
अन्न की उत्पत्ति: तत्पश्चात, उन्होंने स्वायम्भुव मनु को बछड़ा बनाकर अपने ही हाथों से पृथ्वी रूपी गाय का दोहन किया, जिससे अनेक प्रकार के अन्न और बीज उत्पन्न हुए और सृष्टि का पालन-पोषण सम्भव हो सका।
धरा की कातर पुकार और श्री हरि की स्तुति
यद्यपि पृथ्वी रहने योग्य हो गई थी, किन्तु वह स्वयं पर्वतों के भारी बोझ और दुष्ट दानवों के अत्याचारों से अत्यंत पीड़ित थी। अपनी व्यथा से परवश होकर, अश्रुपूर्ण नेत्रों के साथ वह लोकपितामह ब्रह्मा जी की शरण में गई। ब्रह्मा जी उस दुखी धरा को लेकर भगवान शिव और श्री हरि विष्णु के पास पहुँचे।
विष्णु जी को समक्ष पाकर पृथ्वी ने कातर स्वर में उनकी भावपूर्ण स्तुति की:
उसने भगवान के वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि अवतारों का स्मरण किया।
उसने निवेदन किया, “हे जगतपालक! मैं दानवों के अत्याचारों और पर्वतों के असह्य बोझ से दब गई हूँ। यदि आपने मेरी रक्षा नहीं की, तो मैं रसातल के पवित्र जल में डूब जाउंगी।”
श्री हरि का अभय वरदान और मंगलमय भविष्य की उद्घोषणा
पृथ्वी की करुण पुकार सुनकर श्री हरि विष्णु का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने धरा को सांत्वना देते हुए उसके भविष्य में होने वाली मंगलकारी घटनाओं और अपने अवतारों का रहस्य उजागर किया:
पाप के बोझ का अंत: विष्णु जी ने वचन दिया कि जब-जब पृथ्वी पर दानवों का भार बढ़ेगा, वे अवतार लेंगे। अत्यंत पराक्रमी राजा बलि का मानभंग करने हेतु वे वामन रूप धारण कर अपने चरणों से पृथ्वी को अंकित करेंगे, जिससे वह पाप-भार से मुक्त हो जाएगी।
शिव का पुनीत अवतरण:सत्ययुग के आरम्भ में, सती के वियोग से दुखी महादेव पृथ्वी पर आएँगे। वे सुन्दर ‘दारुवन’ (टंकणपर्वत) पर कठोर तपस्या करेंगे। वहां भगवान शंकर का पुनीत लिंग स्थापित होगा, जिसके स्मरण मात्र से दुष्टों और पापियों के सारे पाप नष्ट हो जाएँगे। यह लिंग जागेश्वर के नाम से जगत में प्रसिद्ध होगा जागेश्वर का महात्म्य पुराणों में बड़ा विराट है बारहाल पृथ्वी की वेदना को दूर करने के लिए भगवान शिव जागेश्वर के रूप में प्रकट हुए
गंगा का आगमन: सूर्यवंश में परम प्रतापी राजा भगीरथ का जन्म होगा, जो शिव की जटाओं से मोक्षदायिनी गंगा को पृथ्वी पर उतारेंगे। गंगा के स्पर्श से पृथ्वी ‘श्वेतद्वीप’ के समान अत्यंत पवित्र और वन्दनीय हो जाएगी।
पर्वतों का देवत्व और ‘स्थावर’ का गूढ़ रहस्य
भगवान विष्णु ने पृथ्वी के सबसे बड़े भ्रम को दूर करते हुए सृष्टि का एक अत्यंत गोपनीय रहस्य बताया:
पर्वत भार नहीं, देव-अंश हैं:श्री हरि ने कहा कि जिन विशाल पर्वतों को पृथ्वी अपना बोझ समझ रही है, वे वास्तव में कोई भार नहीं हैं। हिमकणों से ढका सुप्रसिद्ध हिमालय स्वयं साक्षात् भगवान शिव का ही रूप है। इसी प्रकार श्रेष्ठ मुनियों से सेवित विन्ध्य-पर्वत ब्रह्मा, विष्णु और शिव के अंशों से उत्पन्न हुआ है।
स्थावर (अचल) रूप का रहस्य: जब पृथ्वी ने आश्चर्यचकित होकर पूछा कि देवतागण ‘स्थावर’ (पर्वत/अचल) रूप क्यों धारण करते हैं और इसमें क्या सुख है? तब विष्णु जी ने इस गूढ़ रहस्य से पर्दा उठाया:
स्थावर योनि में शीत, ताप, सुख-दुःख और सांसारिक मोह-माया का कोई भय नहीं होता।
यह रूप परम स्थिरता, वैराग्य और असीम सहनशीलता का प्रतीक है।
अपनी इसी असीम सहनशीलता के कारण स्थावर-रूप को शिव आदि देवताओं द्वारा पूजा जाता है और मानवों का कल्याण करने के लिए ही भगवान स्वयं पर्वतों के रूप में पृथ्वी पर विराजते हैं।
धरा का श्वासन और कथा का माहात्म्य
इस गूढ़ परम-ज्ञान और देवताओं से मिले अभयदान को पाकर धरा (पृथ्वी) का सारा संताप मिट गया। उसका मुखमंडल प्रसन्नता से खिल उठा और वह पूर्ण-मनोरथ होकर, ब्रह्मा जी की परिक्रमा कर अपने सुंदर लोक को लौट गई। उसे अब अपना असह्य भार अत्यंत हल्का और ईश्वरीय वरदान प्रतीत होने लगा। रहस्यमयी बातें बताकर भगवान विष्णु वहीं अंतर्ध्यान हो गए और शिव जी कैलाश की ओर प्रस्थान कर गए।
फलश्रुति (कथा का श्रवण-फल):
महर्षि वेदव्यास जी कहते हैं कि जो भी मनुष्य राजा पृथु के इस पराक्रम, पृथ्वी के पावन चरित्र, और भगवान विष्णु के पाप-नाशक आख्यान को सुनता है, वह जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त होकर दिव्य अप्सराओं से सुसज्जित वैकुण्ठ-लोक को प्राप्त करता है और देवताओं के समान आनंद का भागी बनता है।
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